नीलमणि तब ग्रेजुएशन के द्वितीय वर्ष में थी. पढ़ाई में तो तेज थी ही, सुन्दरता में भी किसी रूपसी राजकुमारी से कम नहीं लगती थी. गोरी रंगत, लम्बे रेशमी बाल, ऊंचा कद, छरहरा बदन और सबसे खूबसूरत थीं उसकी आंखें. उसकी नीली-हरी आंखों के कारण ही मां-बाप ने उसका नाम नीलमणि रखा था. विजय सिंह और उनकी पत्नी शारदा की इकलौती संतान थी नीलमणि. पूरे लाड-प्यार में पली बच्ची. गांव में विजय सिंह के पास काफी खेतीबाड़ी थी. बड़ा नाम-सम्मान भी था. चाहते तो ठाठ से गांव वाली हवेली में रहते, मगर बीए की डिग्री प्राप्त विजय सिंह को जब इलाहाबाद की एक इन्शोरेंस कम्पनी से नौकरी का ऑफर आया तो गांव वाली जमीनें और हवेली छोटे भाई के हवाले कर पत्नी सहित इलाहाबाद चले आये. यहां उन्होंने चार कमरों का बड़ा मकान ले लिया. दोनों पति-पत्नी आराम से रहने लगे. पैसे की तंगी कभी रही नहीं, मगर एक कमी थी जो दूर नहीं हो रही थी. उनके घर का आंगन बच्चे की किलकारी के बिना सूना-सूना सा था.

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