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भयंकर सूखे के बाद भयानक बाढ़ से प्रदेश अभीअभी निबटा था. सरकारी बाबुओं की चांदी हो गई थी. जीभर कर डुबकी लगाई थी राहत कार्य की गंगा में. चारों ओर खुशहाली छाई थी. अगली विपदा के इंतजार में सभी पलकपांवड़े बिछाए बैठे थे. मगर जमाने से किसी की खुशी देखी नहीं जाती.

कुछ दिलजलों ने नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में सरकार के खिलाफ पीआईएल दाखिल कर दी. सूखा और बाढ़ तो प्रकृति की मेहरबानी है. इस में सरकार की भला क्या दखंलदाजी? मगर आजकल तो सभी को लाइमलाइट में आने का शौक चर्राया है. अगर मुद्दा पर्यावरण, ग्लोबल वार्मिंग और ग्रीनहाउस इफैक्ट जैसे आम आदमी की समझ में न आने वाले विषयों का हो तो हाथोंहाथ लपक लिया जाता है. आम आदमी भी यह सोच कर खुश हो जाता है कि मसला भले समझ में न आए मगर सारी कशमकश उस की भलाई के लिए हो रही है.

सरकार पर बेतुका आरोप मढ़ा गया कि उस ने वृक्षों की अंधाधुंध कटान नहीं रोकी, इस के कारण सूखा पड़ गया. चलो भाई, थोड़ी देर के लिए तुम्हारी बात मान लेते हैं. मगर इस का उलटा राग तो न आलापो. बता रहे हैं कि वृक्ष न रहने से बाढ़ आ गई. बच्चा भी बता देगा कि सूखा और बाढ़ बिलकुल विपरीत धाराओं के उत्सव हैं. एक में पानी का अकाल तो दूसरे में पानी का रूप विकराल. दोनों में सिर्फ 2 चीजें कौमन हैं. पहला यह कि दोनों में प्रकृति की मरजी है और दोनों में कमाई अंधाधुंध होती है. पंडों पुजारियों की यज्ञहवन से जो कमाई होती है वह तो आज की सरकार और पार्टी के चेलेचपाटे अच्छी तरह समझते हैं.

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