भाग 1

भयंकर सूखे के बाद भयानक बाढ़ से प्रदेश अभीअभी निबटा था. सरकारी बाबुओं की चांदी हो गई थी. जीभर कर डुबकी लगाई थी राहत कार्य की गंगा में. चारों ओर खुशहाली छाई थी. अगली विपदा के इंतजार में सभी पलकपांवड़े बिछाए बैठे थे. मगर जमाने से किसी की खुशी देखी नहीं जाती.

कुछ दिलजलों ने नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में सरकार के खिलाफ पीआईएल दाखिल कर दी. सूखा और बाढ़ तो प्रकृति की मेहरबानी है. इस में सरकार की भला क्या दखंलदाजी? मगर आजकल तो सभी को लाइमलाइट में आने का शौक चर्राया है. अगर मुद्दा पर्यावरण, ग्लोबल वार्मिंग और ग्रीनहाउस इफैक्ट जैसे आम आदमी की समझ में न आने वाले विषयों का हो तो हाथोंहाथ लपक लिया जाता है. आम आदमी भी यह सोच कर खुश हो जाता है कि मसला भले समझ में न आए मगर सारी कशमकश उस की भलाई के लिए हो रही है.

सरकार पर बेतुका आरोप मढ़ा गया कि उस ने वृक्षों की अंधाधुंध कटान नहीं रोकी, इस के कारण सूखा पड़ गया. चलो भाई, थोड़ी देर के लिए तुम्हारी बात मान लेते हैं. मगर इस का उलटा राग तो न आलापो. बता रहे हैं कि वृक्ष न रहने से बाढ़ आ गई. बच्चा भी बता देगा कि सूखा और बाढ़ बिलकुल विपरीत धाराओं के उत्सव हैं. एक में पानी का अकाल तो दूसरे में पानी का रूप विकराल. दोनों में सिर्फ 2 चीजें कौमन हैं. पहला यह कि दोनों में प्रकृति की मरजी है और दोनों में कमाई अंधाधुंध होती है. पंडों पुजारियों की यज्ञहवन से जो कमाई होती है वह तो आज की सरकार और पार्टी के चेलेचपाटे अच्छी तरह समझते हैं.

वकीलों की धुआंधार बहस के बाद ट्रिब्यूनल को विश्वास हो गया कि सूखा और बाढ़ दोनों का कारण वृक्षों का अंधाधुंध कटान ही है. यही नहीं, उसे यह भी गलतफहमी हो गई कि वृक्षों को उपजाने और उन्हें नष्ट होने से बचाने की जिम्मेदारी प्रकृति की नहीं, बल्कि सरकार की है. इसलिए उस ने फटाफट सरकार को नोटिस जारी कर दिया. उस ने यह देखा ही नहीं कि मंत्रों का पाठ तो कराया ही नहीं गया था.

मगर, वह सरकार ही क्या जो ऐसी नोटिसों से हिल जाए. फाइलों के पहाड़ पलटे गए. आंकड़ों की बोरियां ट्रिब्यूनल के सामने उलट दी गईं. देख लो कितने लाख, कितने करोड़ वृक्ष हम ने लगाए हैं. अगर आज यह पृथ्वी बची है तो हमारे ही प्रयासों से बची है. हम ने युद्धस्तर पर वृक्षारोपण के अभियान न चलाए होते तो यह धरती अब तक गैसचैंबर बन चुकी होती.

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अदालतों को क्या चाहिए? सुबूत. सारे सुबूत चीखचीख कर कह रहे थे कि सरकारी प्रयासों में कोई कमी नहीं है. फंड जारी होने से ले कर खर्च होने तक सारा हिसाब चाकचौबंद. मगर वह वकील ही क्या जो दूसरों से ज्यादा न चीखे, असली सुबूत को फर्जी और फर्जी को असली न साबित कर दे. वही हुआ. सारे आंकड़े धरे रह गए और यह साबित हो गया कि वृक्षारोपण तो हुआ है मगर धरती की गोद में नहीं, बल्कि फाइलों की छाती में हुआ है.

मगर वह सरकार ही क्या जो हार मान ले और ऊपर की अदालत में अपील न करे. एक के बाद एक निचलीऊपरी अदालतों की सीढि़यां बनाई ही इसलिए गई हैं कि सांपसीढ़ी का खेल चलता रहे. न्याय की देवी तो अंधी होती है, भूलचूक होना लाजिमी है. अगर एक ही अदालत का फैसला मानना बाध्यकारी होता तो अन्याय होने की प्रतिशतता बढ़ जाती. अदालतों की पूरी शृंखला है. अगर एक से गलती हो जाए तो दूसरे से न्याय मिल ही जाएगा.

तो सरकार ने पहले से भी बड़ा वाला वकील किया और पहुंच गई ऊपर की अदालत में जहां न्याय होने की संभावना ज्यादा होती है.

बड़ी अदालत ने बड़ेबड़े वकीलों की दलीलें सुनीं. सारी की सारी अकाट्य. ऐसे में न्याय होना मुश्किल हो गया मगर होना जरूरी था. अदालत ने बीच का रास्ता निकाला. बना दिया एक कमीशन जो जांच कर के बताएगा कि वृक्ष लगे या नहीं.

आमतौर पर कमीशन वाले कमीशन नहीं खाते, मगर ऐसे हालात में कमी जरूर दिखा देते हैं. सरकार चौकन्नी थी. कमीशन की जांच से पहले खुद की जांच कराने का फैसला किया ताकि जो कमी रह गई हो, उसे पूरा कर दिया जाए. परंपरा के अनुसार, सरकार ने मुख्य सचिव को, मुख्य सचिव ने सचिव को, सचिव ने संयुक्त सचिव और संयुक्त सचिव ने उपसचिव को जांच के निर्देश दिए.

उपसचिव को भी नीचे वालों को निर्देश देने के पूरे अधिकार हैं. लेकिन मसला गंभीर था, इसलिए उपसचिव महोदय वास्तव में जांच के लिए निकल लिए. अमूमन ऐसी जांचों में भी एक प्रक्रिया होती है जिस के पूरी होते ही तड़ाक से सबकुछ ठीकठाक होने की रिपोर्ट लगा दी जाती है. मगर यहां तो जांच की भी जांच करने कमीशन आ रहा था. सो, न चाहते हुए भी उपसचिव महोदय को गोपनीय रिपोर्ट लगानी पड़ी कि सारा वृक्षारोपण कागजी हुआ है.

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सरकार वृक्षारोपण अभियान की सफलता का डंका जम कर पीट चुकी थी. वह सर्वाधिक वृक्ष लगाने वाले अपने मुंहलगों को ‘वृक्षश्री’ और ‘वृक्षमित्र’ जैसे सम्मानों से अलंकृत कर चुकी थी. इस अभियान को कागजी मानना उगले हुए को निगलने के समान होता.

क्रमश:

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