धारावाहिक कहानी: फरिश्ता

धारावाहिक कहानी: फरिश्ता

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भाग – 3

अचानक दरवाजे पर हुई दस्तक ने पूनम को चौंका दिया. अनजानी आशा से उसकी छाती धाड़-धाड़ बजने लगी. उसके हर्ष की सीमा न रही जब उसने दरवाजे पर डौक्टर सूर्यकांत को खड़ा पाया. हल्के नीले रंग की शर्ट और काली पैंट में वह सचमुच एक फरिश्ते के समान लग रहा था.

‘क्या मैं अन्दर आ जाऊं…?’ उसने मजाकिया लहज़े में पूछा.

‘जी… आइये न…’  पूनम खुशी से कंपकपाते स्वर में बोली और उसने आगे बढ़कर उसका बैग थाम लिया.

‘अब कैसे हैं तुम्हारे बाबा..?’

‘जी, पहले से बहुत अच्छे हैं… आइये…’ वह उसे लेकर भीतर वाले कमरे की ओर बढ़ गयी.

‘नमस्ते डौक्टर साहब…’ मास्टर जी ने उसे देखा तो खुशी से हाथ जोड़े उठने की कोशिश करने लगे.

‘अरे-अरे… आप लेटे रहिए… अब तो आप काफी अच्छे लग रहे हैं. ऐसे ही समय से दवाएं वगैरह लेते रहिए… देखिएगा महीने भर में आप दौड़ने लगेंगे….’ वह स्टूल खींचकर उनके पलंग के पास बैठ गया. उसने बैग खोल कर अपना आला निकाला और उन्हें चेक करने लगा.

‘बेटा, जा दौड़कर चाय बना ला डौक्टर साहब के लिए…’ बूढ़े ने पूनम से कहा.

‘जी…’ पूनम जल्दी से रसोई की तरफ चली गयी.

ताकत का इंजेक्शन देने के बाद डौक्टर सूर्यकांत मास्टर जी से बतियाने लगा.

‘आगे दवाएं वैसे ही लेते रहिएगा… मैं बीच-बीच में आता रहूंगा…’ उसने मास्टर जी से कहा.

‘डौक्टर साहब, मैं आपके एहसान का बदला कभी नहीं…’ मास्टर जी की आवाज लड़खड़ा गयी. आंखों में आंसू भरे वह उसके पैरों की तरफ झुक गये.

‘अरे-अरे… ये क्या कर रहे हैं? आप तो मुझे शमिन्दा कर रहे हैं मास्टर जी… मैंने तो सिर्फ अपना फर्ज़ निभाया है…..’ उसने उन्हें पकड़कर बिस्तर पर लिटा दिया.

‘अब आप इस तरह करेंगे तो मैं नहीं आऊंगा….’ वह उनको धमकाने के अंदाज में बोला और मास्टर जी रोते-रोते मुस्कुरा पड़े.

पूनम चाय ले आयी थी. आज चाय गुड़ की जगह चीनी की बनी मालूम पड़ती थी. चाय पीते हुए डौक्टर ने पूनम से पूछा, ‘आगे पढ़ने की इच्छा हो तो मैं शहर के कौलेज में बात करूं तुम्हारे लिए… मैं चाहता हूं कि तुम पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जाओ और अपने बाबा का सहारा बनो. फिर मास्टर जी की तबियत भी सुधर रही है… क्यों मास्टर जी?’ उसने अपनी बात के समर्थन के लिए उनकी तरफ देखा.

‘डौक्टर साहब, मेरी इतनी औकात कहां कि इसे आगे पढ़ा सकूं. इच्छा तो बहुत थी पर…’ वह खामोश हो गये.

‘अगर आप कहें तो मैं कोशिश करूं… शहर में कुछ कौलेज गरीब लड़कियों को मुफ्त शिक्षा और साथ में काम की ट्रेनिंग भी देते हैं.’ उसने बताया.

‘डौक्टर साहब, आपके वैसे ही बहुत उपकार हैं हम पर…’ बूढ़े ने हाथ जोड़ दिये.

‘ओफ्फो मास्टर जी… आपकी यही बात मुझे पसन्द नहीं है… आखिर इंसान इंसान के काम नहीं आएगा, तो क्या देवता उतरेंगे आसमान से? बस… अगर आप राजी हैं तो मैं इसके लिए जरूर कोशिश करूंगा… मगर पहले आप सेहतमंद हो जाएं ताकि अपने रोजमर्रा के कामकाज स्वयं कर सकें.’

‘हां-हां… मैं जल्दी अच्छा हो जाऊंगा…’ मास्टर जी खुशी से कंपकपाते स्वर में बोले.

पूनम को तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वह आगे पढ़ भी सकती है और नौकरी भी कर सकती है. वह मन ही मन डौक्टर के चरणों में अर्पित हो गयी. उसे कुछ न सूझा कि किन शब्दों में वह डौक्टर साहब का धन्यवाद करे.

‘अच्छा, अब मैं चलता हूं… अभी विधायक बाबू को देखने भी जाना है… अच्छा पूनम… बाबा का ध्यान रखना…..’ उसने मास्टर जी की ओर देख कर हाथ जोड़े और बैग उठाकर बाहर की ओर चल पड़ा. देहरी पर किवाड़ थामे पूनम उसे दूर तक जाते हुए देखती रही… ‘कितनी शालीनता है इनके व्यक्तित्व में… कितना अपनापन…. कितना सहज’ वह सोच रही थी.

तीन महीने बीतते-बीतते मास्टर जी ने चलना-फिरना शुरू कर दिया था. अब तो वह रोज सुबह कुछ दूर खेतों की ओर टहलने भी निकल जाते थे. डौक्टर नियत समय पर उनके लिए दवाएं और इंजेक्शन आदि भेज दिया करता था और मास्टर जी को देखने आता तो किसी न किसी बहाने रुपये भी दे जाता था, ताकि वह जरूरत के हिसाब से फल और दूध आदि लेते रहें. पूनम की लक्ष्मी मौसी भी देखभाल में लगी रहती थीं. डौक्टर के दिये रुपयों से घर की हालत में सुधार आ गया था. दो वक्त चूल्हा जलने लगा था. दु:ख के बादल धीरे-धीरे छंट रहे थे. फिर एक दिन अचानक डौक्टर सूर्यकांत ने यह सुखद समाचार सुनाया…

‘तुम्हारा एडमिशन शहर के एक कौलेज में हो गया है… उसी के हौस्टल में तुम्हारे रहने का इंतजाम भी… बस अब मन लगाकर आगे की पढ़ाई करो… मास्टर जी की सेहत भी सुधर गयी है… बाकी देखभाल और खानापीना तो लक्ष्मी मौसी भी कर दिया करेंगी… क्यों मास्टर जी?’  उसने मास्टर जी की ओर देखा.

‘हां-हां, क्यों नहीं…’ मास्टर जी भर्राए स्वरों में बोले, ‘अपनी देखभाल तो अब मैं खुद भी कर सकता हूं….’ उन्होंने पूनम का हौसला बढ़ाने के लिए कहा.

और बस कुछ ही दिन बाद पूनम डौक्टर सूर्यकांत के साथ शहर आ गयी. लक्ष्मी मौसी भी उसे शहर तक छोड़ने के लिए डौक्टर की गाड़ी में बैठकर आयी थीं. जिस कौलेज में उसका एडमिशन हुआ था वह काफी बड़ा कौलेज था. इतना बड़ा कौलेज देखकर ही पूनम का दिल बैठा जा रहा था. हौस्टल की वार्डन उसे बड़ी सख्त औरत लगी, लेकिन बाद में समझ में आया कि ऊपर से पत्थर दिखने वाली वार्डन अन्दर से बिल्कुल मोम की तरह मुलायम थीं. ईसाई औरत थीं. लोग उन्हें सिस्टर सिरिल के नाम से पुकारते थे. पहले तो पूनम उनसे काफी डर गयी, परन्तु धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि वह ममता की साक्षात मूरत थीं, मगर कुछ बदमाश लड़कियों के लिए चंडी का रूप भी धर लेती थीं. उनकी सख्ती वाजिब थी. को-एजुकेशन वाला कौलेज था, इसलिए हौस्टल की लड़कियों को अनुशासन में रखना बहुत जरूरी था. लड़के और लड़कियों के हौस्टल आसपास ही बने थे. हौस्टल में पहले दिन पूनम काफी घबरायी-घबरायी सी रही. गांव से अचानक शहर के वातावरण में वह अपने आपको एडजेस्ट कर पाएगी या नहीं, यही चिन्ता उसे घेरे रही. डौक्टर सूर्यकांत उसको वार्डन के पास छोड़कर लक्ष्मी मौसी को वापसी की बस में बिठाने के लिए चले गये थे.

वार्डन ने अपने कमरे में बिठा कर पूनम को काफी देर तक सारी ऊंच-नीच समझायी, सारे नियम-कायदे बताए और फिर बड़े प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं…

‘कोई परेशानी हो तो बिना झिझक सीधे मेरे पास आ सकती हो… और यह कुछ सामान व किताबें डॉक्टर सूर्यकांत तुम्हारे लिए दे गये हैं… डौक्टर बाबू बहुत भले आदमी हैं. इस कौलेज को उनसे काफी डोनेशन मिलता है…’ डौक्टर की तारीफ करते-करते उन्होंने एक छोटा सूटकेस और किताबों का बंडल पूनम को पकड़ा दिया. पूनम ने झिझकते हुए सूटकेस और किताबों का बंडल पकड़ा और वार्डन के साथ अपने कमरे की ओर चल पड़ी. उसका रोम-रोम डौक्टर सूर्यकांत को धन्यवाद दे रहा था. उसका जी चाह रहा था कि कहीं से उनकी एक तस्वीर मिल जाती तो वह रात-दिन उनकी पूजा करती, उनके चरणों को अपने आंसुओं से धोती. न जाने किस जनम के पुण्य थे, जो उसे इस देवता स्वरूप व्यक्ति के दर्शन हुए थे. कमरे में पहुंचकर वह खुशी और अहसानों के बोझ तले फूट-फूट कर रो पड़ी. न जाने कितनी देर तक वह रोती रही. आज उसे अपनी स्वर्गवासी मां की बेहद याद आयी. उसने सूटकेस खोला तो उसमें पांच साड़ियां, ब्लाउज, पेटिकोट, दो शलवार-सूट, तौलिया, चादर, कंघा, पाउडर और छोटी-छोटी जरूरत की तमाम चीजों के साथ एक पत्र भी मिला. लिखा था –

‘कौलेज के वातावरण के हिसाब से रहने की कोशिश करना. ऐसा न लगे कि तुम गांव से आयी हो, वरना मजाक बनते देर नहीं लगेगी. हर तरफ से दिमाग हटाकर सिर्फ पढ़ाई पर लगाना. बाबा की फिक्र करने की जरूरत नहीं है. मैं हर हफ्ते उन्हें देखने के लिए जाता रहूंगा. कोई परेशानी हो तो वार्डन से कहने में हिचकिचाना नहीं. मैं बीच-बीच में मिलता रहूंगा. किसी चीज की जरूरत हो तो फोन कर देना… सूर्यकांत.’

पूनम की आंखों में पुन: आंसू आ गये. काफी देर तक वह बिस्तर पर पड़ी उनके बारे में सोचती रही. उसे पता ही न चला कि कब नींद ने उसे अपनी आगोश में ले लिया.

पूनम धीरे-धीरे कौलेज के वातावरण में ढल गयी. वह मेहनत से पढ़ रही थी. प्रथम वर्ष की परीक्षा उसने काफी अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की थी. डौक्टर सूर्यकांत कभी स्वयं आकर और कभी फोन से उसका हालचाल लेते रहते थे. बाबा भी उसे लगातार चिट्ठियां लिख-लिख कर अपने सेहतमंद होने की खबर देते रहते थे और उसकी हौसलाअफ्जाई भी करते रहते थे. बाबा की हर चिट्ठी में डौक्टर सूर्यकांत की तारीफें भरी रहती थीं. वह हर हफ्ते नियम से बाबा को देखने जाते थे और फल और पैसे भी नियमित भिजवाते रहते थे.

सेकेंड इयर का इम्तहान देने के पश्चात् डौक्टर के परामर्श से पूनम ने नर्सिंग की ट्रेनिंग शुरू कर दी थी. वह महसूस कर रही थी कि दूसरे साल में डौक्टर सूर्यकांत का हौस्टल आना काफी कम हो गया था. कभी-कभी तो वह वार्डन से ही उसका हालचाल पूछकर चले जाते थे. पूनम बहुत बेचैनी से उनका इंतजार करती थी. वह तो मन ही मन अपने देवता के चरणों में समर्पित हो गयी थी.

इम्तहान के बाद छुट्टियों में वह दो साल बाद अपने घर जाने वाली थी. वह बहुत खुश थी. दो साल में, शहर के वातावरण में ढल कर उसका रूप निखर आया था. बातचीत का सलीका बदल गया था. उठने-बैठने के ढंग में बदलाव आ चुका था. अब तो उसमें और किसी शहरी लड़की में फर्क करना ही मुश्किल था. कहां वह गांव की डरी-सहमी चिथड़ों में लिपटी पूनम और कहां साफ उजली साड़ी में लिपटी खूबसूरत नवयौवना. वह स्वयं भी शीशे में खुद को निहार कर विश्वास नहीं कर पाती थी कि वह वही गांव वाली पूनम है. बाबा और लक्ष्मी मौसी भी उसको देखकर जरूर हैरान होएंगे और गांव वाले भी पता नहीं क्या-क्या बातें बनाएंगे. वह सारी बातें सोच-सोच कर अकुला रही थी.

डौक्टर सूर्यकांत उसको लेने के लिए दोपहर ढले हौस्टल पहुंच गये. सिस्टर सिरिल ने पूनम को उसके कमरे से बुलवाया. डौक्टर के आने का समाचार सुन कर वह भागती हुई वार्डन के कमरे में पहुंची. दरवाजे पर उसे खड़ा देख वार्डन ने कहा, ‘आओ बेटी… डौक्टर साहब छुट्टियों में तुम्हें गांव वापस ले जाने आये हैं… जाओ अपना सामान तैयार कर लो…..’

डौक्टर ने एक उड़ती हुई नजर पूनम पर डाली और मुस्कुरा कर वार्डन से बातें करने लगा. वार्डन का आदेश सुनते ही पूनम खुशी से लगभग दौड़ती हुई अपने कमरे में आयी. उसने जल्दी-जल्दी अपने कपड़े समेटकर सूटकेस में रख लिये. आज वह बहुत खुश थी. वह दो साल बाद अपने बाबा से मिलेगी, लक्ष्मी मौसी से मिलेगी…

(धारावाहिक के अगले भाग में पढ़िये कि शहर के वातावरण में बिल्कुल निखर चुकी अपनी बेटी पूनम को सामने देखकर उसके बाबा का क्या हाल हुआ और उनकी चिन्ता क्यों बढ़ गयी.)

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