Inspirational Story : चांदीलाल आरष्टी के एक कार्यक्रम से स्कूटी से वापस लौट रहे थे. उन्हें घर वापसी में देरी हो गई थी. जैसे ही ‘सदर चैराहे‘ पर पहुंचे, तो उन की नजर शराब की दुकान पर पड़ी. उन्हें तुरंत ध्यान आया कि घर पर शराब की बोतल खाली हो गई थी और शाम की खुराक के लिए कुछ नहीं है.

उन्होंने स्कूटी एक ओर खड़ी की और अंगरेजी शराब का एक पव्वा खरीद लिया, जो उन की 2-3 दिन की खुराक थी. जब वे स्कूटी से घर की ओर चले तो उन्हें ध्यान आया कि पुलिस विभाग में भरती होने से पहले वे शराब को हाथ तक नहीं लगाते थे. फिर अपने विभाग के साथियों के साथ उठतेबैठते उन्हें शराब पीने की लत लग गई थी. सिस्टम में कई चीजें अपनेआप होने लगती हैं और उन से हम कठोर प्रण कर के ही बच सकते हैं. अब तो पीने की आदत ऐसी हो गई है कि शाम को बिना पिए निवाला हलक से नीचे उतरता ही नहीं.

घर पहुंच कर चांदीलाल ने अपने खाली मकान का ताला खोला. रसोई से ताजा खाने की गंध सी आ रही थी. इस का मतलब था कि घर की नौकरानी स्वीटी खाना बना कर जा चुकी थी. आनंदी के गुजरने के बाद मुख्य दरवाजे और रसोई की चाबी स्वीटी को दे दी गई थी, जिस से वह समय से खाना बना कर अपने घर जा सके.

आनंदी के बिना घर वीरान सा हो गया था. यही घर, जिस में आनंदी के रहते कैसी चहलपहल सी रहती थी, रिश्तेदारों और जानपहचान वालों का आनाजाना लगा ही रहता था, अब कैसा खालीखाली सा रहता है. घर का खालीपन कैसा काटने को दौड़ता है. सबकुछ होते हुए भी, कुछ भी न होने का एहसास होता है. केवल और केवल अकेला आदमी ही इस एहसास को परिभाषित कर सकता है. किसी ने सच कहा है ‘घर घरवाली का‘. वह है तो घर है, नहीं तो मुरदाघाट.

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