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लेखक-एस भाग्यम शर्मा

"मुझे पता ही नहीं चला कि वे कहां गए. बहुत कोशिश की, पर कोई सुराग नहीं मिला.

"मेरे मम्मीपापा मेरे पास आ गए और मैं अपनी नौकरी के साथसाथ उन का भी ध्यान रखने लगी. समय बीतता गया और एक दिन अचानक पापा को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. मम्मी उन के पीछे उन की याद में 2 साल भी नहीं रहीं. सेवानिवृत्ति के बाद  यह मकान खरीद व बना कर तुम्हारे पड़ोस में आ गई. मैं ने किसी से रिश्ता नहीं रखा. मन बहुत ही विरक्त था. मम्मीपापा के 2 साल में आगेपीछे जा चुके थे. मैं अकेली हो चुकी थी. यहां आ कर रहने लगी.

“अचानक एक दिन मेरी एक पुरानी सहेली का फोन आया कि 'मेरा बेटा मुझे ढूंढ रहा है’ और उस के थोड़ी देर बाद ही मुझे मेरे सोमू का फोन आया, ‘मैं आप का बेटा सोमसुंदरम बोल रहा हूं. मैं आप के पास आना चाहता हूं.’ मेरे आश्चर्य की सीमा न रही.

“जैसा तुम कह रही थीं न, वैसे ही मुझे भी लगा कि कहीं कोई धोखा तो नहीं दे रहा है. मैं ने उसे घर न बुला कर एक होटल में बुलवाया. वहां बात की. तब सारी परतें एकएक कर खुल गईं.”

"आंटी, अब मैं घर जाऊंगी, हालांकि, जाने की इच्छा बिलकुल नहीं है. कल धारावाहिक जारी रहेगा,” कह कर मैं चल दी.

घर आ कर मैं ने सारा काम किया. वह तो करना ही था. परंतु मेरा मन आंटी की कहानी में ही लगा रहा. यह तो बौलीवुड की कहानी से भी ज्यादा मजेदार थी. आंटी के साथ क्या हुआ, यह जानने के लिए उत्सुक थी और सोमू के बारे में जानने के लिए भी, या दोनों के लिए, यह तो आप डिसाइड करो. फिल्म, कहानी और उपन्यास यह सब भी मानव जीवन के ही तो प्रतिबिंब हैं. दूसरे दिन जल्दीजल्दी काम निबटा कर आंटी के घर पहुंच गई. अब मुझे सोमू घर पर है, इस की उत्सुकता ज्यादा थी. मुझे लगा, यह आग एक तरफ की नहीं है. वह भी मुझ से बात करने का मौका तलाशता है. अपनी आग को जप्त करने की मैं कोशिश करती कि इस उम्र में यह ठीक नहीं है. लेकिन मन है कि मानता ही नहीं.

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