AR Rahman Controversy :
संगीत या कला को धर्म, भाषा व देश की सरहदों में बांटा नहीं जा सकता. संगीत को धर्म के चश्मे से भी नहीं देखा जाना चाहिए. कटु सत्य यह है कि संगीत का कोई धर्म नहीं होता. इस के बावजूद एक कलाकार की पहचान उस के सुरों की बनिस्बत उस के मजहब से होने का सीधा अर्थ यही होता है कि समाज की वैचारिक सेहत ठीक नहीं है.
भारत को वैश्विक पटल तक पहुंचाने वाले ए आर रहमान ने औस्कर की दहलीज पर खड़े हो कर दुनिया को ‘इलाही’ की इबादत और भारत की विरासत का संगम दिखाया, जो आज एक अजीबोगरीब घेरेबंदी का शिकार है.
हाल ही में बीबीसी एशियन नैटवर्क के लिए पाकिस्तानी ब्रिटिश पत्रकार हारून रशीद को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बदलते मिजाज और बढ़ते ‘कम्युनल’ गैप पर एक कलाकार की पीड़ा व्यक्त की, जिस की वजह से उन्हें कठघरे में खड़ा किया जा रहा है, यह बहुत ही ज्यादा चिंताजनक बात है. दिलीप कुमार से अल्लाह रक्खा रहमान बनने का उन का सफर केवल एक नाम बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि एक रूहानी तलाश और भारतीय संगीत को वैश्विक बनाने का वह जनून है जिसे आज सांप्रदायिकता के चश्मे से देखा जा रहा है. खुद ए आर रहमान संगीत को धर्म से जोड़ कर नहीं देखते. वे कई बार कह चुके हैं- ‘‘संगीत का कोई धर्म नहीं होता. संगीत केवल आत्मा को छूने वाली एक भाषा है. जब मैं संगीत बनाता हूं तो मैं किसी विशेष समुदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए बनाता हूं.’’
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