प्रभास को संभालने के लिए मेघना की छोटी बेटी ही काफी थी. अभी 2 दिन उसे यहां बच्चों को संभालते हुए बीते ही थे कि अस्पताल से अचानक कुछ लोग आए. वे हेमा की मौत की खबर देने आए थे. यह सुन कर मेघना बुरी तरह चौंक गई. बच्चों को खबर से दूर रखना तो चाहती थी, लेकिन यह कब तक संभव था.

ओज वाकई बड़ा हो गया था. उस ने खबर सुनी और गजब का धीरज दिखाते हुए अपने दोनों भाईबहनों को पास ले कर चुप से बैठ गया. मेघना ने पुकारा, "ओज..." उस ने कहा, "आंटी, पापा तो ठीक हैं न... वे तो घर आ जाएंगे न." मेघना को जाने क्यों ऐसा लगा, जैसे इन के लिए इन के पापा ही सबकुछ हैं.

कुछ दिन तक मेघना और रुक कर अभी घर से आनाजाना कर ही रही थी कि तरुण ठीक हो कर वापस आ गया. मेघना को प्रभास की चुप्पी अजीब लगती, लेकिन वह यह सोच कर अपने मन को समझा लेती कि बैंक के कई स्टाफ चल बसे, प्रभास का मन उदास होगा.

इधर तरुण के मन में एक उथलपुथल थी. वह समझ नहीं पा रहा था कि हेमा के जाने से वह दुखी था या दुखी नहीं था. वह खुद को बताना चाहता था कि हेमा के चले जाने से उसे बहुत दुखी होना चाहिए, क्योंकि वह उस की प्रेमिका और पत्नी दोनों थी. लेकिन उस के समझाए का उस के दिल पर असर ही नहीं हो रहा था.

वह पता नही क्यों हलका सा महसूस कर रहा था, क्योंकि आएदिन प्रभास के साथ हेमा की नाकाबिल ए बरदाश्त की हद तक अंतरंगता अब नहीं थी. घर की साफसफाई के बाद  सोफे पर तरुण के पसरने पर अब कोई चिकचिक नहीं थी. औफिस से आने के बाद किसी और के लिए चाय बना कर देने की जल्दी नहीं थी. बच्चों को मन के मुताबिक प्यार करते वक्त हेमा की छींटाकशी नहीं थी. यहां तक कि रात को सोने से पहले इच्छा के विरुद्ध हेमा के शरीर की सेवा, मसलन कभी पीठ दबाना, कभी पैर तो कभी सिर या फिर उस के शरीर की क्षुधा शांत करना, अब नहीं थी.

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