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‘झंडा चौक’ घर से 1 किलोमीटर की दूरी पर ही था. फ्लैट में ताला लगा कर नीचे आ गई. बाजार की रौनक धीरेधीरे सिमटने के क्रम में थी. दुकानप्रतिष्ठान बंद होने लगे थे. पर चौक पर अभी भी खासी चहलपहल थी. बड़ेबड़े शोरूम अभी खुले हुए थे. बाईं ओर के लैंप पोस्ट तले एक गोलगप्पे वाला खोमचा लगाए खड़ा था. भीतर की निराशा को तिरोहित करने के लिए वह उस के पास आ गई. फिर एक के बाद एक, पूरे 10 गोलगप्पे, इमली का तीखा मसालेदार पानी उदर के भीतर गया तो मन रूई की तरह हलका हो गया.

गोलगप्पे वाले के बगल में ही रामखेलावन का फलों का ठेला था. वह रामखेलावन की स्थायी ग्राहक थी. रामखेलावन उसे देखते ही चहका, ‘क्या तौल दें, मेम साहब?’
मुग्धा ने एक नजर ठेले पर रखे फलों पर डाली. आदित्य को अंगूर खूब पसंद हैं. उस ने एक किलो अंगूर तौल देने को कहा.
‘कितने पैसे, भैया?’
‘90 रुपए, मेमसाहब.’

मुग्धा ने उस की ओर 100 का नोट बढ़ा दिया. तभी 2-3 ग्राहक और आ गए और रामखेलावन उन्हें तत्परता से सौदा देने में लग गया. उन के चले जाने के बाद वह एक क्षण को चिंतन की मुद्रा में आया और फिर बंडी की भीतरी जेब से 100-100 के 4 नोट निकाल कर उन में 10 का नोट मिलाया, फिर मुग्धा की ओर बढ़ा दिए, ‘ये रहे आप के बाकी पैसे.’

410 रुपए देख कर मुग्धा सकपका गई.

‘भैया, हिसाब ठीक से देख लिया न?’ रुपए थामते हुए वह हकला उठी.

‘लो, कर लो बात...’ रामखेलावन ने दांत निपोर दिए. उस के होंठों पर निश्छल हंसी खिल आई, ‘हिसाबकिताब के मामले में इतना भी कमजोर नहीं है मेम साहब. अरे, 500 में 90 गया तो कितना बचा? 410 ही न?’

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