Human Rights Issue: किन्नर कितने ही शिक्षित और जागरूक हो जाएं, फिर भी उन के प्रति समाज के नजरिए के बदलने की उम्मीद न के बराबर ही दिखती है. इस की वजह मौजूदा वर्णव्यवस्था में किन्नरों की दोयम दर्जे की स्थिति तो है ही, खुद किन्नर भी अपनी तरफ से अपनी बेहूदी हरकतें छोड़ने की पहल नहीं करते. जेन कौशिक के खुद को ट्रांसजैंडर कहलाने और सुप्रीम कोर्ट में एक मुकदमा जीत जाने से मुख्यधारा में उन की जगह बन पाएगी, इस में शक है.

तय है दूसरे तमाम ट्रांसजैंडर्स की तरह जेन कौशिक को भी समझ आ गया होगा कि उस जैसियों के लिए बराबरी का ख्वाब कभी हकीकत में नहीं बदल सकता. अगर जेन की मंशा महज एक मुकदमे के जरिए मुख्यधारा में शामिल हो जाने की थी तो उस पर पानी फिर गया है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उस के साथ न्याय करने की अपनी जिम्मेदारी तो निभा दी है लेकिन उसे समाज में बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए उस के पास भी कोई कानून नहीं.

जेन को समझ यह भी आ गया होगा कि जिसे मेनस्ट्रीम यानी मुख्यधारा कहा जाता है उस पर मुट्ठीभर सवर्ण काबिज हैं. वरना तो दलित, पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यक और सवर्ण औरतें तक भी सिरे से वर्णव्यवस्था की शिकार हैं. इस पौराणिक सिस्टम पर कानून का भी जोर नहीं चलता. अगर चलता होता तो देश में रोजरोज के झगड़े, विवाद और फसाद खड़े नहीं हो रहे होते.

इस की ताजी मिसाल यूजीसी की नई गाइडलाइंस हैं जिन के लागू होते ही ऊंची जाति वालों ने वह बवाल काटा कि एक बार तो यह लगने लगा था कि अब सोशल मीडिया पर चल रही सवर्णों और गैरसवर्णों के बीच की जूतमपैजार सड़क पर आने को है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के स्टे ने हालात संभाल लिए जिस पर यही कहा जा सकता है कि छुरी तरबूज पर गिरे या तरबूज छुरी पर, कटना आखिरकार तरबूज को ही पड़ता है. जेन कैसे तरबूजे के मानिंद कटी, इस से पहले उस के बारे में जानने की कोशिश में वही कहानी सामने आती है जो आमतौर पर अधिकतर किन्नरों की होती है.

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