Heartbreaking Story: पिता की डांट, उन के हाथों बेइज्जत होने का डर और हर समय यह ताना कि वह जीवन में कुछ नहीं कर पाया और कुछ नहीं कर पाएगा, इन शब्द बाणों ने ऐसी घोर हताशा और निराशा उस के अंदर भर दी कि उस ने एक झटके में सब को अलविदा कह दिया.
वह अभी सिर्फ 24 साल का था. उस के सामने बहुत लंबा जीवन शेष था, मगर पिता की उलाहनाओं और अपेक्षाओं ने उसे मौत का रास्ता चुनने के लिए मजबूर कर दिया. 23 अप्रैल को कानपुर में घटी एक दर्दनाक घटना ने समाज के उस चेहरे को बेनकाब किया है, जिसे हम अक्सर बच्चों के भविष्य की चिंता, अनुशासन और संस्कार के नाम पर छिपा देते हैं. यह घटना एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि एक सामाजिक विफलता है. एक ऐसी विफलता, जिस में एक पिता का प्रेम नियंत्रण और अपमान में बदल गया और एक बेटे की उम्मीदों ने धीरेधीरे दम तोड़ दिया.
जब पिता की अपेक्षाएं बेटे के भीतर डर पैदा करने लगे और उस का घर सुरक्षित स्थान की बजाय तनाव का केंद्र बन जाए, तो युवा मन आखिर कहां जाए? कानपुर में बर्रा-8 के वरुण विहार में रहने वाले प्रशिक्षु वकील प्रियांशु श्रीवास्तव ने कानपुर के न्यायालय भवन की पांचवीं मंजिल से छलांग लगा कर जान दे दी. उस की जेब से मिले दो पेज के सुसाइड नोट में जो सब से ज्यादा दुखी और मार्मिक बात लिखी थी वह यह कि - मेरे पिता मेरे शव को न छुएं.
प्रियांशु ने सुसाइड नोट में अपने पिता राजेंद्र कुमार पर आक्रोश व्यक्त किया है. पिता की तरफ से उस का दिल इसकदर टूट चुका था कि उस ने उन्हें अपना शव तक न छूने की बात लिख डाली. प्रियांशु ने अपने 2 पेज के सुसाइड नोट में जो कुछ भी लिखा है वह आज बच्चों पर पेरैंट्स द्वारा अनावश्यक रूप से बढ़ती जा रही अपेक्षाओं और दबाव से उत्पन्न हताशा और अवसाद की कहानी बयान करता है जिस का सामना आज बहुतेरे बच्चे कर रहे हैं.
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