Gender Nnequality: किसी भी समाज का निर्माण एक दिन में नहीं होता. समाज में रहने वाले लोगों की सोच, उन के विचार, उन की मान्यताएं समाज की दशा व दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं. समाज में रहने वाले लोगों के विचार, उन की सोच पीढ़ीदरपीढ़ी स्थानांतरित होती हुई उस समाज की मान्यताओं का रूप ले लेती हैं. इन मान्यताओं एवं संस्कृति का प्रभाव उस समाज में रहने वाले लोगों पर पड़ता है. धर्मों ने इस में सब से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

पुराणों और स्मृतिकारों की दृष्टि में महिला

हमारे पुराणों व संहिताओं में और स्मृतिकारों व टीकाकारों ने महिलाओं की गिनती जिस प्रकार से बुराइयों में की है, संभवतया उस से पुरुषों के अंदर महिलाओं के प्रति नफरत व घृणा का बीजारोपण अवश्य हुआ होगा. स्मृतिकारों और टीकाकारों ने महिलाओं की गिनती कुछ प्रमुख बुराइयों में की है, उसे सभी दुखों का स्रोत बताया गया है, उसे नियंत्रण में रखने के लिए मारनेपीटने के निर्देश दिए गए हैं.

मैत्रायणी संहिता में स्त्री कपासा व सुरा के साथसाथ 3 प्रमुख बुराइयों में गिनती की गई है. मनु ने तो स्त्रियों के प्रति बहुत ही कठोर बात कही है. उस ने कहा है,  ‘स्त्रियों की इच्छाएं अपवित्र होती हैं, वे बेईमान, ईर्ष्यालु और दुराचारिणी होती हैं.’

ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है, ‘पुत्री ही सभी दुखों का स्रोत है.’ कथासरित्सागर में लिखा हुआ है, ‘पुत्र सुख का प्रतीक है और पुत्री दुख का मूल.’

स्मृतिकार बृहस्पति का मत है कि यदि शत्रु जबरदस्ती किसी स्त्री से संभोग कर ले तो स्त्री का त्याग न किया जाए, स्त्री से प्रायश्चित्त करा कर पति उसे वापस ले सकता है. यानी, पीडि़ता से ही प्रायश्चित्त कराने की बात कही गई.

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