अगर कोई यह कहे कि वह बोरिस बेकर को नहीं जानता तो तय है कि उस की दिलचस्पी लौन टेनिस में कतई नहीं है. करोड़ों लोगों की दिलचस्पी टेनिस में पैदा करने वाले बोरिस बेकर को हाल ही में एक ब्रिटिश कोर्ट ने दिवालिया घोषित कर दिया तो टेनिस पे्रमियों के जेहन में सहज ही सन 1985 के विंबलडन की यादें ताजा हो आईं.

उस समय तक भारत में टीवी काफी लोकप्रिय हो चुका था और उसी के जरिए लोग जान रहे थे कि दुनिया के सब से दूसरे महंगे खेल टेनिस को, जिस का अपना अलग ही आकर्षण था. सन 1985 का विंबलडन टूर्नामेंट कई मायनों में अहम और दिलचस्प था. फाइनल मुकाबला तब के धाकड़ खिलाड़ी केविन कुर्रान और बोरिस बेकर के बीच था.

केविन कुर्रान की जीत तय मानी जा रही थी, क्योंकि उन का मुकाबला एक ऐसे लड़के से था, जो पहली दफा पेशेवर टूर्नामेंट खेल रहा था. दूसरे केविन कुर्रान क्वार्टर फाइनल में जान मैकेनरो और सेमी फाइनल में जिमी कानर्स जैसे नामी खिलाडि़यों को हरा कर फाइनल तक पहुंचे थे. ये दोनों ही खिलाड़ी समीक्षकों, दर्शकों और सटोरियों की निगाह में खिताब के प्रबल दावेदार और हकदार थे, लेकिन केविन कुर्रान ने बाजी पलट दी थी.

सुनहरे घने बालों वाले बोरिस की चमकती भूरी आंखें और भौहें हर किसी को भाई थीं, पर वह केविन कुर्रान को हरा कर टेनिस का यह सब से बड़ा खिताब अपने नाम कर पाएंगे, इस में हर किसी को शक था. इस टूर्नामेंट में बोरिस बेकर की हैसियत एक गैर वरीयता प्राप्त खिलाड़ी की थी, जिस के बारे में माना जा रहा था कि वह थोड़ा संयोग और थोड़ी सी प्रतिभा और खेल तकनीक के दम पर फाइनल तक आ पहुंचे हैं.

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