Festival Celebration: त्योहार अगर त्योहार जैसे नहीं लगते तो गलती आप की ही है क्योंकि इन छुट्टियों के दिनों में भी घर के सदस्य, भले ही वे तीनचार ही क्यों न हों, साथ हो कर भी साथ नहीं रहते. उत्साह और उल्लास मन का विषय है धन का नहीं जो इन दिनों सब के पास ठीकठाक है लेकिन खुशी की बड़ी यह वजह नहीं. खुशी की वजहें हैं मिल कर त्योहार एंजौय करना, साथ शौपिंग करना और सालभर का संयुक्त लेखाजोखा तैयार करना.
इस में कोई शक नहीं कि त्योहारों पर पहले सा लुत्फ किसी को नहीं आता जिस की अपनी वजहें भी हैं. लेकिन (इस में भी कोई शक नहीं कि त्योहार अब पहले जैसे नहीं रहे, यह कहने वाले अधिकतर लोग भी पहले जैसे नहीं रह गए हैं.) वे कामकाज के बोझ तले दब गए हैं और इतने दब गए हैं कि नजर उठा कर तो दूर की बात है खुद उठ कर भी त्योहारों की रौनक नहीं देख पाते.
लोग टैक्नोलौजी के गुलाम हो गए हैं और इतने हो गए हैं कि त्योहार भी सोशल मीडिया पर सोशल मीडिया के लिए ही मनाते हैं. चुनिंदा सोशल मीडिया प्लेटफौर्मों के ग्रुप्स ही उन के लिए परिवार और समाज हो गए हैं. उन की दिनचर्या भी पहले जैसी नहीं रह गई है. उन के शौक बदल गए हैं, खानेपीने का तरीका बदल गया है और रहनसहन भी पहले सा नहीं रह गया है. इस से भी अहम बात, उन का पैसा खर्च करने का स्टाइल भी बदल गया है.
सार यह कि एक पूरी की पूरी जेनरेशन इतनी इन्ट्रोवर्ट हो गई है कि वह शौपिंग के लिए बाजार जाने से कतराती है. बढ़ते हुए ट्रैफिक से उसे दहशत होती है, बाजार की भीड़ का हिस्सा बनना उसे देहाती या गंवारपना लगता है. लेकिन उसे यह एहसास नहीं कि हकीकत में वह एगोसफोबिया की गिरफ्त में आ गई है जिस में भीड़भाड़ से निकलने में भी डर लगता है.
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