Problems Of Youth : सोशल मीडिया पर यूथ अपनी बात रखने से ज्यादा भड़ास निकालते दिखाई देते हैं. इस का कारण सोचेसमझे तरीके से उन की आवाज शासन, समाज और प्रशासन द्वारा दबाया जाना है. यह भड़ास कहीं भी अचानक फूट पड़ती है.

जब मशहूर फुटबौलर लियोनेल मेसी भारत दौरे पर आए और दिल्ली, मुंबई, कोलकाता के बड़े स्टेडियमों में पहुंचे, तो वे देश के लिए गर्व के पल थे. दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों के स्टेडियमों में हजारों लोग जुटे, उत्साह चरम पर था.

लेकिन उसी माहौल में एक अजीब सी स्थिति पैदा हो गई जब मैसी जैसे ही राज्य के मुख्यमंत्री के साथ स्टेडियम में उतरे, भीड़ के एक हिस्से ने अपने ही मुख्यमंत्री के खिलाफ हूटिंग शुरू कर दी. कहीं ‘एक्यूआई’ की आवाजें आईं, कहीं ‘बू...बू...की हूटिंग हुई.’

इस पर कई लोगों का कहना था कि ‘बाहर से आए मेहमान के सामने ऐसा करना ठीक नहीं’, ‘देश की इमेज खराब होती है’, ‘राजनीति को खेल से दूर रखना चाहिए’ आदि. बात अपनी जगह सही भी लगती है, लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता. सवाल तो यह है कि आखिर आज का यूथ अपनी आवाज उठाए तो उठाए कहां? क्या उन्हें प्रोटैस्ट करने की आजादी है और अगर है तो कितनी सुरक्षा? आज का यूथ गुस्से में क्यों है?

भारतीय युवा सिर्फ बेरोजगारी से परेशान नहीं है, वह सिस्टम से थका हुआ है. वह देखता है कि हवा ज़हरीली होती जा रही है, लेकिन कोई जवाबदेही नहीं. शिक्षा महंगी होती जा रही है, लेकिन नौकरियां नहीं बढ़ रहीं. मेहनत करने के बाद भी सेलेक्शन में ‘कनैक्शन’ काम आता है, ज्ञान नहीं. और तो और, सवाल पूछने वालों को ‘एंटी’ कह कर चुप करा दिया जाता है. हिंदू प्रोटैस्ट करे भक्त लेकिन मुसलिम प्रोटैस्ट करे तो गद्दार, और सिख सवाल उठाए तो खालिस्तानी. बस, जो हां में हां मिलाए वही कहलाते हैं असली हिंदुस्तानी. कहने को तो देश में फ्रीडम औफ एक्सप्रैशन है लेकिन जब लोग नारेबाजी करते हैं या पोस्टर ले कर विरोध करते हैं तो बदले में जवाबदेही नहीं स्वीकार की जाती बल्कि लाठीचार्ज होता है.

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