Sexual Awareness : अगर कोई चीज आनंद देती है तो वह बुरी कैसे हो सकती है? फिर क्यों सब से विकसित और शिक्षित समाज भी सैक्स पर खुल कर बात करने से हिचकिचाते हैं? क्यों इसे फुसफुसा कर कहा जाता है. छुपाया जाता है, शर्म से ढका जाता है या नैतिक समस्या बना दिया जाता है. क्या सैक्स हानिकारक है? नहीं, विज्ञान के अनुसार सैक्स मैंटल और फिजिकल हेल्थ के लिए बहुत अच्छा है. तो क्या सैक्स समाज के लिए हानिकारक है?
नहीं, दो लोगों के मिलने होने से समाज टूट नहीं जाता. तो फिर समाज ने सैक्स के खिलाफ युद्ध क्यों छेड़ रखा है?
दुनिया के कई धार्मिक कल्चर में लोगों को सैक्स के कारण दंडित किया जाता है, शर्मिंदा किया जाता है, यहां तक कि मार दिया जाता है. सैक्स को पाप या ऐसी चीज मान लिया गया है जिसपर कंट्रोल जरूरी है. किस का कंट्रोल? यह धर्म तय करता है. लेकिन अगर हम ईमानदारी से देखें, तो सैक्स के मामले में कंट्रोल सिर्फ जवान होने तक का होना चाहिए बाकि बातें सिर्फ समाज को मुट्ठी में रखने की साजिश है.
दरअसल समाज को डेमोक्रेसी कंट्रोल नहीं कर पा रहा क्योंकी यह धर्म के हाथों की कठपुतली बन गया है. डेमोक्रेसी के उसूल सामाजिक विज्ञान को समझते हैं लेकिन धर्म के नियम रूढ़िगत होते हैं. धर्म किसी तरह विज्ञान को नहीं मानता. विज्ञान से खतरा है. डर है की विज्ञान युगों की संस्कृतियों को निगल न जाए. अगर विज्ञान डेमोक्रेसी के साथ आगे बढ़ा तो सबकुछ तहस नहस हो जाएगा.
विज्ञान ने चिकित्सा, तकनीक और अंतरिक्ष में बड़ी प्रगति की. शरीर को समझा, हार्मोंस को जाना, मनोविज्ञान को पढ़ा. अब तक सैक्स से जुड़ी गलतफहमियां खत्म हो जानी चाहिए थीं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. क्यों? क्योंकि सैक्स के बारे में हमारे विचार एक्सीपेरिमेंटल नहीं हैं बल्कि विरासत में मिले हुए हैं. ये हजारों साल पुराने पैटर्न हैं. हम ने इन्हें खुद नहीं बनाया. हम ने बस स्वीकार कर लिया. कल्पना कीजिए अगर किसी बच्चे को दूध पीते समय छुपना पड़े क्योंकि बड़ों को यह शर्मनाक लगता हो. यह कितना अजीब लगेगा.
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