Supreme Court of India: 10 और 11 अक्टूबर को दिल्ली में जो हुआ वह लोकतंत्र के इतिहास में बेहद डरावना था. दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स DUJ ने याचिका दायर की कि 35 से ज्यादा पत्रकारों को हिरासत में लिया गया, धक्का-मुक्की की गई, कैमरे छीने गए और महिला पत्रकारों के साथ बदसलूकी की गई. 15 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह सवाल उठा कि आज के डिजिटल दौर में पत्रकार किसे माना जाए और क्या पत्रकारिता करने के लिए सरकारी मान्यता जरूरी है?
सीनियर पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता ने कोर्ट को बताया कि PIB का कार्ड दिखाने के बाद भी उन्हें बिना किसी कागज के हिरासत में ले लिया गया. वहीं दिल्ली पुलिस के ACP विवेक भगत ने जंतर-मंतर के पास प्रोटेस्ट कवर करते हुए एक महिला पत्रकार के साथ बदतमीजी और छेड़छाड़ की, जब इस महिला पत्रकार ने शिकायत की तो FIR दर्ज नहीं हुई, उल्टा उसी ACP ने उनके खिलाफ SC/ST एक्ट में केस कर दिया कि उन्होंने जातिसूचक टिप्पणी की है.
इसी सुनवाई में केंद्र सरकार के वकील सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कुतर्क दिया जिसके जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पत्रकार कौन है? यह समझा दिया. तुषार मेहता ने कोर्ट में कहा- “आजकल तो हर किसी के हाथ में मोबाइल है, हर कोई पत्रकार बन गया है, पुलिस कैसे पहचाने कि कौन असली पत्रकार है और कौन रील बना रहा है? कई तो फ्रीलांस पत्रकार बन कर पुलिस को हैरेस करते हैं”
तुषार मेहता का यह कुतर्क सुनते ही सीनियर वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा- “इजरायल और फिलिस्तीन के वॉर जोन में भी ऐसी स्वतंत्र महिला पत्रकार जाती हैं, उन्हें वहाँ कोई नहीं रोकता लेकिन यहां जंतर-मंतर जाने से रोका जा रहा है”
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