Festival Season: त्योहारों का सीजन शुरू हो चुका है. अब चारों ओर गहमागहमी नजर आने लगी है. बाजार सज रहे हैं. काम की तलाश में दूसरे शहरों में गये लोग घर लौटने के इंतजाम में लग गये हैं. गांव हो या शहर हर जगह त्योहारों की रौनक़ दिखाई देने लगी है. अक्टूबर से शुरू होने वाला त्योहारों का सीजन नये साल का जश्न मनाकर ही खत्म होता है. इस बीच दशहरा, भैया दूज, दीवाली, छठ और क्रिसमस जैसे बड़े त्यौहार आते हैं जो भारत के हर गांव हर शहर और हर तबके को खुशियों से भर देते हैं. यही भारत की असली पहचान है लेकिन इन त्योहारों को धर्म ने हाइजेक किया हुआ है.
त्योहार जरुरी होते है क्योंकि यह समाज को नई ऊर्जा देते हैं. त्योहारों से सामाजिक मेलमिलाप बढ़ता है. भागती हुई जिंदगी में खुशियों का ठहराव आता है. किसी को बोनस मिलता है तो किसी को साल भर की भागदौड़ से छुट्टी मिलती है. इस दौरान छोटे व्यापारियों की रोजी रोटी चलती है जिससे बाजार जिंदा हो जाते हैं लेकिन त्योहारों का एक नकारात्मक पहलू भी है. इसमें धर्म के नाम पर फिजूलखर्ची को बढ़ावा मिलता है.
मंदिर मूर्ति पूजा-पाठ और दक्षिणा के खेल में सबसे ज्यादा आम आदमी लूटा जाता है. अमीर शौक से खर्च करता है लेकिन गरीब का बजट बिगड़ जाता है इसलिए सबसे जरुरी बात यह है कि त्योहारों को सिर्फ ख़ुशी, खरीददारी और सामाजिक मेल मिलाप के तौर पर ही मनाया जाये. इसमें धर्म को घुसेड़ना बिलकुल भी ठीक नहीं है क्योंकि धर्म ने ज्यादातर त्योहारों को हड़प लिए हैं. पुराने समय में त्यौहार सिर्फ सामाजिक मेलजोल और भाईचारे का उत्सव हुआ करते थे उन्हें धर्म ने हाइजेक कर अपनी कहानियाँ थोप दी और त्योहारों को लूटने का जरिया बना दिया.
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