Local Shopkeepers: लोकल दुकानदार और ऑटो टैक्सी वालों ने बिजनेस को इनोवेट नहीं किया. न तरीका बदला और न ही तेवर. वही पुराना घिसा पिटा बनियागिरी वाला तरीका जारी रखा जिसकी वजह से जोमैटो, ब्लिंकिट, ओला, उबर को मौका मिल गया. इन्होने आम आदमी की जरूरतों को शिफ्ट नहीं किया बल्कि उन्हें लोकल दुकानदार और ऑटो टैक्सी वालों की मनमानी से निजात दिला दी.
2015 से पहले किराना की दुकान सुबह 10 बजे खुलती थी, दोपहर में 2 से 4 बजे बंद रहती थी फिर रात 8 बजे बंद. रविवार को आधा दिन बंद. ग्राहक को दुकान के हिसाब से चलना पड़ता था, दुकान ग्राहक के हिसाब से नहीं चलता था. यह सदियों पुरानी बनियागिरी थी, जो परंपरा बन गई थी. भाव का कोई बोर्ड नहीं होता था. एक ही मोहल्ले में एक ही तेल तीन दुकानों पर तीन दाम पर मिलता था. नए ग्राहक को महंगा, पुराने को थोड़ा सस्ता. सामान की एक्सपायरी कोई नहीं बताता था. बिल कोई नहीं देता था. अगर बिल मांगा तो जवाब था, भैया भरोसा नहीं है क्या? और इस बनियागिरी का सबसे बड़ा हथियार था, उधारी. उधारी देकर दुकानदार ने ग्राहक को ग्राहक नहीं, बंधुआ बना दिया था. महीने भर उधारी लिख लो, फिर जब हिसाब हो तो पता चले 500 रुपये ज्यादा जुड़े हैं. ग्राहक इसलिए नहीं बोलता था क्योंकि अगले महीने फिर उधारी लेनी है. यह भरोसा नहीं, मजबूरी थी.
साफ सफाई जीरो. दाल में कंकड़, आटे में मिलावट, खुला तेल, खुला मसाला. दुकान पर बैठने के लिए बेंच तक नहीं. सामान लेने जाओ तो दुकानदार फोन पर लगा होता था. जब ब्लिंकिट आया तो ग्राहक को 24 घंटे का ऑप्शन मिला. ग्राहक को पहली बार भाव बोर्ड पर लिखा मिला. सामान थोड़ा महंगा ही सही लेकिन बिल पक्का मिलने लगा. सामान सीलबंद होता था और एक्सपायरी साफ लिखी होती थी. ग्राहक ने तुरंत ऐप अपना लिया.
ऑटो टैक्सी का हाल तो किराने से भी बुरा था. मीटर नाम की चीज सिर्फ कानून की किताब में थी. स्टेशन जाना है तो ऑटो वाला पूछता था, कहां से आए हो. रात है तो दोगुना किराया. बारिश है तो तीन गुना, मजबूरी है तो चार गुना. मना किया तो हमदर्दी गायब. सामान ज्यादा है तो नखरे, दो सवारी हैं तो किराया डबल. मीटर से चलने को कहो तो सीधा जवाब मिलता था कि मीटर खराब है. लोकल टैक्सी स्टैंड पर गुंडागर्दी थी. स्टैंड का प्रधान तय करता था कि किसकी गाड़ी चलेगी. नई गाड़ी वाले को घुसने नहीं देते थे. ग्राहक को पता ही नहीं कि किराया क्या है? स्टैंड वाले ने जो बोल दिया वही किराया होता था और गाड़ी की हालत कोई पूछने वाला नहीं था. सीट फटी, AC बंद और ड्राइवर गुटखा खाये या शराब पीकर गाड़ी चलाये कोई डर नहीं था.
ग्राहक सालों तक सहता रहा क्योंकि उसके पास कोई ऑप्शन नहीं था. जब ओला उबर आया तो AC ऑन हुआ. बिल पहले से पता होने लगा. गाड़ी घर के नीचे से मिलने लगी. ड्राइवर का नाम, नंबर सब ग्राहक के मोबाइल पर आने लगा. भले ही कंपनी बाद में लूटने लगी, पर शुरुआती 3 साल में उसने वह इज्जत दी जो लोकल ऑटो वाले ने 30 साल में नहीं दी. इस बीच ऑटो वाले ने कभी नहीं सोचा कि वह इन कम्पनियों से कुछ सीखे. वह आज भी उसी स्टैंड पर खड़ा होकर सवारी ढूंढ रहा है, जबकि सवारी फोन पर गाड़ी ढूंढ रही है.
किराना और ऑटो वालों ने सोचा कि मोहल्ले पर उनका कब्जा है, ग्राहक कहीं नहीं जाएगा. इसी घमंड को निकम्मापन कहते हैं. उन्होंने सर्विस नहीं सुधारी, भाव नहीं सुधारा, व्यवहार नहीं सुधारा. ई-कॉमर्स ने इसी खाली जगह पर कब्जा कर लिया. उसने लूट को सिस्टम बना दिया. पहले लोकल दुकानदार अकेले लूटता था, अब कंपनियाँ मिलकर लूटती है लेकिन ग्राहक के लिए तो दूसरी लूट पहली लूट से थोड़ी बेहतर लगने लगी है क्योंकि कम से कम वहां थोड़ी इज्जत तो है. अगर आज भी हर किराना वाला भाव लिख दे, बिल दे, घर पहुंचा दे और हर ऑटो वाला मनमानी करना छोड़ दे और मीटर से चले तो ब्लिंकिट और ओला की आधी दुकान उसी दिन बंद हो जाएगी. प्लेटफॉर्म की ताकत उसकी टेक्नोलॉजी नहीं है, हमारी लोकल दुकान की कमजोरी है. Local Shopkeepers





