लेखक-रोहित

देश में करोड़ों लोग इस समय बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं. कइयों की घर में भूखे मरने की नौबत आ गई है और कई गहरे अवसाद में जी रहे हैं. बढ़ती बेरोजगारी भारत के लिए बड़ी चिंता का विषय है, यदि इस समय इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो अर्थव्यवस्था का वापस जल्दी पटरी पर आना बेहद मुश्किल होने वाला है. बढ़ती बेरोजगारी भारत में कोई मुद्दा हो, यह बात गुजरीबिसरी सी लगती है. सत्तापक्ष ने कभी इसे मुद्दा माना ही नहीं और विपक्ष ने निष्क्रियता के चलते इसे मुद्दा बनाया भी नहीं. बाकी जनता पर धर्मांधता और अंधराष्ट्रवाद का नशा इतना हावी कर दिया गया कि इस तरह के सवालों से रूबरू होना अपनी देशभक्ति पर संदेह करने जैसा हो गया.

लेकिन बेरोजगारी का दंश कितना भयानक हो सकता है, इसे उत्तर प्रदेश के बरेली जिले से आई दिल दहला देने वाली घटना से सम झा जा सकता है. वहां 3 दिनों तक मासूम बच्चे भूख से तड़पते रहे और उन बच्चों का पिता मनोज फांसी के फंदे पर लटका रहा. जब बच्चों को भूख बरदाश्त न हुई तब उन्होंने पड़ोसियों से मदद में खाना मांगा. पता चला कि मनोज पिछले डेढ़ साल से बेरोजगार था. घर में भारी तंगी थी, नौकरी मिल नहीं रही थी और खाने के लाले थे. यह कोई अकेले मनोज का मामला नहीं. विश्व बैंक के आंकड़ों के आधार पर प्यू रिसर्च सैंटर ने अनुमान लगाया है कि भारत में गरीबों की संख्या महामारी के कारण केवल एक वर्ष में 13.40 करोड़ हो गई है.

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