तालाबंदी ने मानो कई तरह के सबक सिखाए हैं. स्कूल का चुनाव नाम देख कर नहीं जेब और फीस देख कर करना चाहिए. निजी कंपनियों ने बडे़ पैमाने पर अपने कर्मचारियों को विश्वव्यापी आपदा में बिना सहारे के छोड़ दिया. ऐसे पैरेंट्स बच्चों की पढ़ाई को ले कर तनाव से गुजर रहे हैं. महंगी शिक्षा के बाद भी उस के प्रतिफल में नौकरियां नहीं हैं, जिस से बेरोजगारों को निजी कंपनियों में बकरे की तरह हलाल होना पड़ता है. ऐसे में महंगी शिक्षा का कोई औचित्य समझ से परे है.

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