देश में न तो कानून का राज है और न कानून का डर. कानून अब ताकतवरों, रसूखदारों के हाथ का खिलौना बन गया है. कानून के रखवाले न तो कानून को ठीक तरीके से लागू कर पा रहे हैं और न ही उस की हिफाज़त कर पा रहे हैं. यही वजह है कि अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को परेशान करने, सत्ता में बने रहने, सांप्रदायिक उन्माद फैलाने, वोटों की खातिर ध्रुवीकरण करने, धर्मविशेष के लोगों को दहशत में रखने, बहुओं द्वारा ससुराल वालों से बदला लेने, ज़मीनजायदाद हड़पने आदि के लिए रसूखदार लोगों द्वारा पैसे व ताकत के बल पर कानून को तोड़मरोड़ कर अपने हक़ में इस्तेमाल करने, झूठी एफआईआर दर्ज करवा कर लोगों को परेशान करने, उन्हें जेल भेजने और यहां तक कि उन पर रासुका या देशद्रोह जैसा इलज़ाम लगा कर सालों सलाखों में कैद रखने के लाखों उदाहरण बिखरे पड़े हैं.

भीमा कोरेगांव में दलितों का उत्पीड़न हो, दिल्ली की जामिया मिल्लिया के छात्रों का उत्पीड़न हो, डा. कफील का मामला हो, आईपीएस संजीव भट्ट का केस हो या आईपीएस दारापुरी को जेल भेजने का, आतंकी बता कर मुसलिम युवाओं को उत्पीड़ित करने का मामला हो या गोकशी-गोतस्करी के झूठे आरोप में फंसाने का, 498-ए का दुरुपयोग कर के घरेलू हिंसा और दहेज़ मांगने का आरोप लगा कर पतियों और ससुरालियों का उत्पीड़न करना हो या राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को परेशान करने या जेल भेजने की बात हो, एक झूठी एफआईआर एक निर्दोष की पूरी जिंदगी ख़ाक करने के लिए काफी है. वह अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ता रहेगा, जिंदगी के तमाम साल बरबाद कर देगा, सारी जमापूंजी पुलिस-वकीलों और कोर्ट के चक्कर लगाने में खर्च कर देगा, आरोपों के चलते अपनी इज्जत का जनाज़ा उठते देखेगा, समाज में तिरस्कार और अपमान सहेगा, नौकरी-धंधे से हाथ धो बैठेगा, सालोंसाल जेल काटेगा और अगर कहीं थोड़ा भाग्यशाली रहा और सालों चली कानूनी कार्रवाई के बाद कोर्ट में अपनी बेगुनाही साबित कर पाया, तब भी समाज में मुंह उठा कर चलने व जीने के काबिल नहीं बचेगा.

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