भले ही झारखंड की नई डोमिसाइल नीति पर राज्य कैबिनेट की मुहर लग गई है लेकिन विरोधी दलों द्वारा इसे आधाअधूरा बताए जाने के चलते गरीब जनता को अभी और इम्तिहान देने पड़ सकते हैं. लंबे इंतजार और कई हिंसक आंदोलनों के बाद झारखंड की डोमिसाइल नीति आखिरकार जमीन पर उतर आई. साल 2000 में बिहार से अलग हो कर झारखंड राज्य बनने के बाद से ले कर अब तक कई मुख्यमंत्री आए और गए, पर राज्य की डोमिसाइल नीति सभी के लिए मधुमक्खी का छत्ता ही साबित हुई. इस मसले को ले कर भड़की आग में बाबूलाल मरांडी की मुख्यमंत्री की कुरसी जल चुकी है. अब झारखंड की नई डोमिसाइल नीति पर राज्य कैबिनेट की मुहर लग गई है. हालांकि विरोधी दलों ने इसे आदिवासी विरोधी और आधाअधूरा बता कर नए सिरे से आंदोलन शुरू करने का बिगुल फूंक दिया है. इस से साफ है कि डोमिसाइल की आग में राज्य और उस की गरीब जनता को अभी और तपनापकना होगा.

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