बिहार में तालीम को मुफ्तखोरी में फंसा कर रख दिया गया है. हर सरकार स्कूलों और पढ़ाईलिखाई के बरगद को जड़ से दुरुस्त करने के बजाय उस की शाखाओं व पत्तों का रंगरोगन कर के ही अपनी जवाबदेही का पूरा होना मान लेती है. स्कूलों में बच्चों की हाजिरी अच्छी हो, इस के लिए सरकार कभी बच्चों को दोपहर का खाना खिलाती है तो कभी स्कूल ड्रैस बांटती है. लड़कियों को स्कूल जाने के लिए मुफ्त में साइकिल बांटने की योजना भी चलाई जा रही है. कभी सरकार ने यह जानने की जहमत नहीं उठाई कि सरकारी स्कूलों में मास्टर हैं या नहीं? मास्टर स्कूल आते हैं या नहीं? ब्लैकबोर्ड और चौक हैं या नहीं? स्कूलों में बैंच और टेबल दुरुस्त हैं या नहीं?

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