Islam and Society: हाल ही में मौलाना साजिद रशीदी ने जंतर-मंतर पर हुए प्रोटेस्ट में आई कुछ लड़कियों द्वारा इस्तेमाल की गई अपमानजनक भाषा पर आपत्ति जताई और कहा कि भाषा और तहज़ीब की भी एक सीमा होनी चाहिए. लड़कियों के मुंह से ऐसी भाषा शोभा नहीं देती. भाषा और तहजीब की बात करने वाले मौलाना को अपने मजहब की थोड़ी तफ्तीश कर लेनी चाहिए क्योंकि वहां भी ग़ालियों और नीचा दिखाने वाली भाषा का जमकर इस्तेमाल हुआ है. यह बिलकुल वाजिब बात है कि लड़कियों के मुंह से गालियां शोभा नहीं देती लेकिन यहाँ सवाल यह है की ऐसी भाषा अगर धर्म का हिस्सा हो तो क्या शोभा देती हैं?
किसी भी समाज की सभ्यता की सबसे बड़ी कसौटी ये होती है कि वो अपने सबसे कमजोर इंसान से कैसा बर्ताव करता है? औरत, अल्पसंख्यक और सवाल पूछने वाले अगर ये तीनों किसी किताब में अपमानित होते हैं तो उस किताब को पवित्र कहने का क्या मतलब रह जाता है? कोई भी पवित्र किताब इस आधार पर नहीं जज नहीं होनी चाहिए कि उसमें कितनी दुआएं हैं बल्कि इस आधार पर जज होनी चाहिए कि उसमें इंसान को कितनी इज्जत मिली है. अगर इस कसौटी पर कुरान और उसके बाद लिखी गई हदीसों को रखा जाये तो तीन चीजें साफ दिखती हैं. विरोधी के लिए सजा, औरत के लिए पाबंदी और दूसरे धर्म वाले के लिए अपमान. इन बातों से यह तो साबित होता ही है कि यह किसी ईश्वर ने नहीं रची बल्कि यह किताब असल में एक खास दौर और उस दौर की सत्ता की जरूरतों का दस्तावेज भर है.
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