भारत में मुसलिम समुदाय बतौर अल्पसंख्यक हमेशा से ही सियासी बिसात के प्रमुख मोहरे की तरह इस्तेमाल होता आया है. चुनावों की नजदीकी अचानक सियासतदानों को इन के वोटों की अहमियत का एहसास कराने लगती है लेकिन इसी समुदाय के रहनुमा और जामा मसजिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी तो भ्रष्टाचार को मुसलिमों के लिए वरदान बता रहे हैं. पढि़ए खुरशीद आलम की रिपोर्ट.
 
क्याभ्रष्टाचार मुसलमानों के लिए वरदान है? क्या इस वरदान से मुसलमानों की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति में सुधार हुआ? क्या इस वरदान से देश विकास की ओर बढ़ रहा है या वह भ्रष्ट देशों की सूची में अपना स्थान बना रहा है? क्या भ्रष्टाचार से ही मुसलमानों का विकास एवं उन्नति संभव है या उन्हें इस बुराई के खिलाफ लामबंद हो जाना चाहिए जैसे सवालों पर बहस दिल्ली की जामा मसजिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी के उस भाषण के बाद शुरू हो गई है जिस में उन्होंने कह दिया कि भ्रष्टाचार मुसलमानों के लिए वरदान है क्योंकि इस के कारण मुसलमान अपने छोटेमोटे काम करा लेते हैं. इस के विपरीत सांप्रदायिकता देश के लिए घातक है.
मौका था, जामा मसजिद के गेट नंबर 7 के पास मैदान में आयोजित मुसलमानों के एक सम्मेलन का, जिसे जामा मसजिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी ने वर्तमान सियासी परिदृश्य में अपनी रणनीति तय करने के लिए बुलाया था. सम्मेलन को संबोधित करते हुए सैयद अहमद बुखारी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में मुलायम सिंह को विशेष रूप से निशाना बनाया. कांगे्रस से नाराजगी का इजहार किया गया और भाजपा के साथ जाने की किसी भी संभावना को सिरे से निरस्त किया गया. वहीं, बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती के प्रति नरमी का इजहार किया गया और तृणमूल कांगे्रस की ममता बनर्जी के बारे में कहा कि ममता ने उन्हें एक पत्र भेजा है जो 6 पेज का है.
पत्र में उन्होंने पूर्ण विवरण से बताया है कि सच्चर कमेटी के सुझावों की रोशनी में मुसलमानों के लिए कौनकौन से काम किए हैं. पत्र को वे समय आने पर अखबारों के माध्यम से जनता के सामने पेश करेंगे. भ्रष्टाचार उन्मूलन को ले कर वजूद में आई आम आदमी पार्टी को यहूदियों का एजेंट बताते हुए मुसलमानों को उस से सचेत रहने का आह्वान किया और कहा कि आने वाले समय में मालूम हो जाएगा कि उन की बात सही है.
निशाने पर सपा
200 से अधिक प्रतिनिधियों के इस सम्मेलन का मकसद मुसलमानों की सियासी रहनुमाई करना था लेकिन यह देख कर आश्चर्य हुआ कि पूरा सम्मेलन सिर्फ उत्तर प्रदेश पर फोकस था और निशाने पर समाजवादी पार्टी व उस के मुखिया मुलायम सिंह यादव थे. मुजफ्फरनगर दंगों को ले कर उन्हें खूब खरीखोटी सुनाईं. जमीअत उलेमा हिंद के एक ग्रुप के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी द्वारा मुलायम सिंह का समर्थन किए जाने पर उन का नाम लिए बिना उन्हें निशाना बनाया.
शाही इमाम ने अपने भाषण में कहा कि मुलायम चाहते हैं कि मुसलमानों में आरएसएस और भाजपा का भय बैठा रहे ताकि मुसलिम वोट उन से दूर न हों.
व्यक्तिगत तौर पर यह सम्मेलन शाही इमाम की आवाज पर हो रहा था. इस के पूर्व इस तरह की बैठकें या सम्मेलन जामा मसजिद राबिता कमेटी के बैनर तले हुआ करते थे. यह ओपन सम्मेलन था और हर किसी को शरीक होने की इजाजत थी.
सम्मेलन में समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता एवं उर्दू साप्ताहिक ‘नई दुनिया’ के संपादक शाहिद सिद्दीकी, समाजवादी पार्टी के टिकट पर कांगे्रस के सहयोग से सांसद बने राज्यसभा सदस्य मोहम्मद अदीब, दैनिक ‘राष्ट्रीय सहारा’ के पूर्व एवं दैनिक ‘अजीजुल हिंद’ के वर्तमान संपादक अजीज बर्नी सहित पूर्व सांसद डा. एम एजाज अली आदि ने अपने विचारों को पेश किया.
शाहिद सिद्दीकी ने गैर राजनीतिक फं्रट की वकालत करते हुए उसे समय की जरूरत बताया और कहा कि फ्रंट राजनीतिक हो लेकिन उस के पदाधिकारी राजनीति में हिस्सा न लें. उन की इस बात से असहमति जताते हुए अजीज बर्नी ने कहा कि स्वाधीनता के बाद से हम ने इसी तरह की राजनीति की है जिस का नतीजा यह निकला है कि हम हाशिए पर पहुंचा दिए गए. हम अपनी पार्टी, अपने झंडे के साथ चुनाव लड़ेंगे. हमारे सामने 2014 का लोकसभा चुनाव नहीं होना चाहिए बल्कि 2019 और 2024 को सामने रख कर अपनी रणनीति बनानी चाहिए.
दंगों पर सब रहे खामोश
सांसद मोहम्मद अदीब ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में 50 मुसलिम विधायकों पर निशाना साधते हुए कहा कि मुजफ्फरनगर दंगे पर सब खामोश रहे और किसी ने इस्तीफा देने की बात तो दूर उस के खिलाफ आवाज तक नहीं उठाई. शाही इमाम का कहना था कि मुलायम सिंह ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पूर्व जो वादे किए थे, हम ने उस का जवाब मांगा था. 1 महीने के बाद भी उन का जवाब नहीं आया क्योंकि उन्होंने वादों को पूरा नहीं किया है. मुसलमानों के साथ धोखा किया है और 2014 के चुनाव में उन्हें इस का जवाब मिल जाएगा. इस अवसर पर शाही इमाम की अगुआई में एक 
11 सदस्यीय कमेटी गठित की गई जो स्थिति की समीक्षा कर अपनी रिपोर्ट पेश करेगी जिस की रोशनी में आगे की रणनीति तैयार की जाएगी.
शाही इमाम अहमद बुखारी की इस पहल को आम मुसलमानों में सियासी दृष्टिकोण से देखा जा रहा है. मुसलिम समाज इसे मोलभाव के रूप में देख रहा है. कुछ दिन पूर्व मायावती के विशेष दूत सतीश शर्मा और नसीमउद्दीन सिद्दीकी जामा मसजिद आए थे और शाही इमाम से मुलाकात की थी. उस मुलाकात में क्या चर्चा हुई, यह तो नहीं मालूम लेकिन मुसलमानों में यह धारणा पाई जा रही है कि यह उसी योजना के तहत हो रहा है. वैसे भी यह कोई पहला मौका नहीं है जब चुनाव पूर्व शाही इमाम सक्रिय हुए हों. इस बार उन्हें मुजफ्फरनगर दंगा एक हथियार के तौर पर मिल गया.
अतीत में लोकसभा और विधानसभा चुनाव पूर्व शाही इमाम की सक्रियता की खबरें अखबारों में सुरक्षित हैं. लेकिन मुसलमानों के नाम पर होने वाली इस सक्रियता से आम मुसलमानों को भी कुछ फायदा हुआ या फिर सक्रिय होने वालों को ही इस का क्या लाभ मिला? सवाल यह है कि क्या यह बताने के लिए कि राज्य में मुसलमान किसे वोट दें, यह सम्मेलन किया गया था या मुलायम सिंह ने अहमद बुखारी की मांगों को नहीं माना था जिस के बाद उन्होंने मुलायम को सबक सिखाने के लिए यह सम्मेलन किया? उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पूर्व जिस तरह अहमद बुखारी ने अपने रिश्तेदार को समाजवादी पार्टी द्वारा टिकट न दिए जाने पर नाराजगी का इजहार किया था, उसे आम मुसलमान भूला नहीं है.
मुसलमान और भ्रष्टाचार
सांप्रदायिकता के खतरनाक होने पर कोई संदेह नहीं है लेकिन किसी बुराई को वरदान के तौर पर पेश करना, समझ से परे है, वह भी जामा मसजिद के इमाम के मुख से. क्या इस का मतलब यह है कि भ्रष्टाचार को रोकने की जो भी कोशिशें हो रही हैं, वे नहीं होनी चाहिए क्योंकि इस से मुसलमानों को फायदा हो रहा है. भ्रष्टाचार के चलते मुसलमानों का काम हो जाता है, यदि इस पर प्रतिबंध लग गया तो वे काम कैसे हो सकेंगे.
बुनियादी बात यह है कि कितने फीसदी मुसलमानों का काम भ्रष्टाचार से होता है, यह मामला तो सिर्फ मुसलमानों से संबंधित नहीं है बल्कि सभी देशवासियों से जुड़ा है और उन्हें अपने कामों के लिए घूस देनी पड़ती है. ऐसी स्थिति में तो भ्रष्टाचार के संरक्षण के लिए सिर्फ मुसलमानों को ही नहीं बल्कि सभी देशवासियों को मुहिम चलानी चाहिए ताकि उन का काम होता रहे.
निसंदेह सरकार के ऐसे कई विभाग हैं जहां भ्रष्टाचार नहीं है जैसे बैंक, पोस्टऔफिस आदि. इस के अतिरिक्त भी बहुत से विभागों में भ्रष्टाचार नहीं के बराबर है लेकिन जिन मामलों में व्यक्ति खुद भ्रष्ट होता है वहां वह भ्रष्टाचारी को तलाश करता है. 
यह सही है कि आम आदमी को भी कभीकभार अपने सही काम कराने के लिए घूस देना पड़ती है. लेकिन यदि व्यक्ति सही है तो जीत उसी की होती है. सरकार के जिन विभागों एवं टैंडर प्रक्रिया में भ्रष्टाचार की बात की जाती है वहां आम आदमी का काम नहीं होता बल्कि कंपनियों और ठेकेदारों का काम होता है, वे भ्रष्टाचार करते हैं. यह तर्क देना कि ये ‘लक्ष्मी’ की पूजा करते हैं, इसलिए भ्रष्टाचार से मुसलमानों का काम हो जाता है, सचाई से परे है.
पाकिस्तान जैसे मुसलिम देश में भ्रष्टाचार का ग्राफ काफी ऊंचा है और ट्रांसपैरेंसी इंटरनैशनल की रिपोर्ट में उसे भ्रष्ट देशों की सूची में जो स्थान दिया गया है, क्या उस पर गर्व किया जा सकता है? निश्चय ही यह एक बुराई है जिस का समर्थन भी इसी श्रेणी में आता है, इसलिए इस का समर्थन कदापि
नहीं किया जा सकता. जिस तरह सांप्रदायिकता देश के लिए हानिकारक है उसी तरह भ्रष्टाचार भी देश के लिए घातक है. इस के बाद भी यदि किसी धार्मिक गुरु की ओर से उसे वरदान बताया जाए तो पाठक स्वयं फैसला कर लें कि उस मंशा का आशय क्या है.

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