लेखक- शैलेंद्र सिंह, नसीम अंसारी कोचर, सोमा घोष, गरिमा पंकज.

अब मुनासिब वक्त है कि कोरोना के कहर की जिम्मेदारी किस की, यह तय किया जाए. जो साफतौर पर दिख रहा है, वह यह है कि देश में इस के जानलेवा फैलाव और उस के बाद स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली की एक बहुत बड़ी वजह अदूरदर्शिता है.

सदियों की गुलामी ढोने वाले भारतीय असल में आजादी के 70 साल से ज्यादा बीत जाने के बाद भी राजाओं के चमत्कारी किस्सेकहानियों की मानसिक दास्तां से मुक्त नहीं हो पाए हैं.

लोगों ने मान रखा है कि राजा भगवान का दूसरा रूप होता है और बड़ा न्यायप्रिय और बुद्धिमान होता है. वह कई दैवीय शक्तियों का मालिक होता है वगैरह, जबकि हकीकत में लोकतंत्र में मुखिया राजा नहीं, बल्कि एक मैनेजर होता है जिस की बातों और वादों पर भरोसा करते हुए वोटर देश उसे सौंप देता है. कोरोना जैसे कहर या त्रासदी तय करते हैं कि मैनेजर अच्छा था या अच्छा नहीं था.

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दोटूक कहा जाए, तो बहैसियत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोरोना के मोरचे पर नाकाम साबित हो चुके हैं. 7 साल के कार्यकाल में पहली बार उन से इस्तीफे की मांग उठी है, उन की अदूरदर्शिता और कुप्रबंधन पर सवाल उठ रहे हैं और उन्हें ले कर लोगों के भ्रम टूट रहे हैं, क्योंकि जो परेशानियां लोगों ने उठाईं, वे जरूर मानव निर्मित हो कर असहनीय और अमानवीय थीं.

राजा जिद्दी, अहंकारी और क्रूर भी होते थे, पर लोकतंत्र के मैनेजर इस राह पर चल पड़ें तो वे नजारे कतई हैरत की बात नहीं, जिन्हें बीते दिनों देशभर के लोगों ने देखे और भोगे भी. 11 मई को उत्तर प्रदेश और बिहार में गंगा नदी में बहती लाशें इस बात की गवाही दे रही थीं कि देश का सिस्टम तारतार हो चुका है.

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