Delhi Protest News: लोकतंत्र में सत्ता की असली ताकत जनता का विश्वास होती है, पुलिस की नाकेबंदी नहीं. लेकिन सीजेपी के प्रदर्शन को रोकने के लिए दिल्ली में जिस तरह सुरक्षा के नाम पर रास्तों, यातायात और आम जनजीवन को प्रभावित किया जा रहा है, उससे यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर एक कुर्सी बचाने के लिए पूरे शहर को बंधक क्यों बनाया जा रहा है?
प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिस की भारी तैनाती, सड़कों पर बैरिकेडिंग और आवाजाही पर प्रतिबंधों का सबसे बड़ा खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ता है, जिनका इस राजनीतिक टकराव से कोई लेना-देना नहीं है. दफ्तर जाने वाले कर्मचारी, रोज कमाने-खाने वाले मजदूर, मरीज, विद्यार्थी, छोटे कारोबारी और दिल्ली पहुंचने वाले यात्री सबकी दिनचर्या आज अस्त-व्यस्त हो गई है.
मेट्रो या ट्रेन सेवाओं में बदलाव और रास्ते बंद होने से अपने गंतव्य तक पहुंचने में लोगों का समय बर्बाद हुआ, ईंधन की खपत बढ़ी और व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित हुईं. दिहाड़ी मजदूर की एक दिन की कमाई छिन जाना भी उसके परिवार के लिए बड़ा आर्थिक संकट है. आज कोई काम न मिलने से हजारों घरों में रात का चूल्हा नहीं जलेगा या फिर मांग कर पेट भरा जाएगा.
एक कुर्सी की सुरक्षा के नाम पर अगर जनता की रोजी-रोटी, आवाजाही और नागरिक स्वतंत्रता दांव पर लगने लगे, तो यह व्यवस्था की मजबूती नहीं, उसकी असुरक्षा का संकेत है. लोकतंत्र में शहर किसी सरकार की निजी संपत्ति नहीं होता और न ही जनता को सत्ता की सुविधा के लिए बंधक बनाया जा सकता है. आखिरकार कुर्सी जनता की सेवा के लिए है, या जनता को परेशान करने के लिए?
आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें
डिजिटल
सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं
- सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
- देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
- 7000 से ज्यादा कहानियां
- समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
डिजिटल + 24 प्रिंट मैगजीन
सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं
- सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
- देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
- 7000 से ज्यादा कहानियां
- समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
- 24 प्रिंट मैगजीन




