हमारे देश में समस्याएं कई परतों में खुलती हैं. जिस समय कोरोना यूरोपीय देशों में हाहाकार मचा रहा था उस समय भारत की पढ़ीलिखी जनता इस गलतफहमी और आत्मविश्वास की शिकार थी कि भारत इस से मुक्त रहेगा क्योंकि यहां की हवाओं में तो वैदिक संस्कृति प्रवाहित होती है और भारत की गाय जो मीथेन गैस पीछे के रास्ते छोडती है वह गैस ही काफी है कोरोना के कणों को ख़त्म करने के लिए. यही कारण था कि डिजिटली जनता घर की थालियां बजा कर कोरोना के कान फोड़ लेने और अंधेरे में दिए जला कर कोरोना को अंधा बनाने के लिए विदेशी एंड्रायड फोन से सोशल मीडिया में पोस्ट डालने की ताबड़तोड़ कोशिशें कर रही थी.

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