Readers’ Problems :
मुझे जीजाजी का मजाकिया स्वभाव असहज कर देता है.
मैं 22 साल की हूं और अपनी बड़ी बहन के घर में कुछ महीनों से रह रही हूं. मेरे जीजाजी स्वभाव से बहुत बातूनी और मददगार हैं लेकिन कभीकभी उन के मजाक या बातचीत की शैली मुझे असहज कर देती है. मुझे डर लगता है कि अगर मैं कुछ कहूंगी तो बहन को बुरा लग सकता है या घर का माहौल खराब हो सकता है. मैं किसी पर गलत आरोप भी नहीं लगाना चाहती, लेकिन मन में बेचैनी रहती है. मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं इस स्थिति को कैसे संभालूं?
मैं आप की परेशानी को पूरी संवेदनशीलता के साथ समझ रही हूं. परिवार में रहते हुए असहज महसूस करना बहुत मुश्किल होता है, खासकर जब रिश्ते नाजुक हों. सब से पहले, यह जरूरी है कि आप अपनी भावनाओं को गंभीरता से लें. आप का असहज होना अपनेआप में महत्त्वपूर्ण संकेत है. आप शुरुआत में शांति से अपनी व्यक्तिगत सीमाएं तय कर सकती हैं, जैसे बातचीत को औपचारिक रखना, अकेले समय से बचना और अपनी दिनचर्या स्पष्ट रखना.
अगर फिर भी बेचैनी बनी रहती है तो आप अपनी बहन से बहुत शांत और भरोसेमंद तरीके से अपनी भावना साझ कर सकती हैं- बिना आरोप लगाए, केवल यह बताते हुए कि आप थोड़ा असहज महसूस कर रही हैं. परिवार में शांति बनाए रखना जरूरी है, लेकिन आप की मानसिक सुरक्षा उस से भी ज्यादा जरूरी है. अपने मन की बात दबाना समाधान नहीं होता, सही समय और सही भाषा में कहना ही समझदारी है.
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मातापिता चाहते हैं कि मैं अपने दोस्तों से दूरी बना लूं.
मैं 17 साल का हूं. मैं अपने दोस्तों के साथ रहना पसंद करता हूं. इस के कारण घर में बहुत तकरार होती है. मुझे समझ नहीं आता कि मैं दोनों को खुश कैसे रखूं?
मातापिता की चिंता और दोस्ती की स्वतंत्रता के बीच संतुलन ढूंढ़ना कठिन होता है. सब से पहले, मातापिता से शांति से बात करें और उन्हें समझाएं कि आप जिम्मेदारी के साथ दोस्तों के साथ समय बिताना चाहते हैं. साथ ही, दोस्तों को भी बताएं कि आप घर और पढ़ाई को महत्त्व देते हैं. धीरेधीरे यह संतुलन बनाना संभव है. अपनेआप पर दबाव न डालें, समय के साथ सब चीजें ठीक
हो जाएंगी.
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पति मेरी भावनाओं को कभी गंभीरता से नहीं लेते.
मेरी उम्र 34 साल है. मेरी शादी को 10 साल हो चुके हैं. पति न मुझे मारते हैं, न गाली देते हैं, न किसी और औरत के बारे में बात करते हैं. फिर भी मैं अंदर से खाली महसूस करती हूं. मैं रोती हूं तो वे कहते हैं, ‘‘तुम ज्यादा सोचती हो.’’ मैं परेशान होती हूं तो कहते हैं, ‘‘हर किसी की जिंदगी में दिक्कतें होती हैं.’’ धीरेधीरे मैं ने अपनी बातें कहना छोड़ दिया है. अब मैं हंसती भी हूं तो बनावटी लगती है. क्या यह भी एक तरह की समस्या है?
हां, यह एक बहुत गहरी समस्या है, सब से खतरनाक इसलिए क्योंकि इस में शोर नहीं होता. जब किसी इंसान की भावनाओं को बारबार नजरअंदाज किया जाता है तो वह बोलना बंद कर देता है. बाहर से वह ठीक दिखता है, लेकिन अंदर से अकेला पड़ जाता है.
आप के पति शायद यह नहीं समझते कि ज्यादा सोचना भी एक दर्द होता है. आप को फिर से अपनी आवाज ढूंढ़नी होगी. यह कहना सीखना होगा कि ‘मेरी भावनाएं भी वास्तविक हैं.’
अगर रिश्ते में आप की भावनाओं के लिए जगह नहीं है तो धीरेधीरे आप का अस्तित्व सिकुड़ने लगता है. यह स्थिति बदली जा सकती है, लेकिन चुप रह कर नहीं.
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मैं जीवन से संतुष्ट नहीं हूं. समझ नहीं आ रहा क्या करूं.
हर दिन खुद की दूसरों से तुलना करता हूं. मैं विवाहित हूं, मेरी उम्र 38 साल है. कैरियर में मुझे वह सफलता नहीं मिली जिस की मुझ से उम्मीद की जा रही थी. घर में कोई सीधे कुछ नहीं कहता, लेकिन मुझे महसूस होता है कि घरवाले निराश हैं. लगता है कि मैं एक असफल पति और पिता हूं.
आप जिस भावनात्मक दौर से गुजर रहे हैं वह आज के समय में कई जिम्मेदार पुरुषों की सच्चाई है. बस, फर्क इतना है कि ज्यादातर लोग इसे शब्द नहीं दे पाते. कैरियर की सफलता को हम ने पुरुषत्व, पति होने और पिता होने की कसौटी बना लिया है, जबकि सच यह है कि आप की कीमत सिर्फ आप की सैलरीस्लिप या पद से तय नहीं होती.
परिवार की चुप्पी अकसर निराशा से ज्यादा उन की अपनी चिंता और असमंजस का परिणाम होती है, न कि आप के प्रति कोई फैसला. दूसरों से तुलना करने की आदत धीरेधीरे आत्मविश्वास को खोखला कर देती है और आप अपनी उन कोशिशों को नजरअंदाज करने लगते हैं जो आप रोज कर रहे हैं- परिवार के लिए समय देना, जिम्मेदारियां निभाना, मुश्किल हालात में टिके रहना आदि. याद रखिए, असफलता कोई पहचान नहीं, एक पड़ाव है.
अगर आप ईमानदारी से प्रयास कर रहे हैं, सीख रहे हैं और अपने परिवार की परवाह करते हैं तो आप असफल पति या पिता नहीं हो सकते. खुद से कठोर सवाल पूछने से पहले खुद को यह स्वीकार करने का मौका दीजिए कि आप भी इंसान हैं और आप की यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है.
-कंचन
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