कलयुग में राम की उपेक्षा के बहुत सारे उदाहरण हैं. इनमें से एक यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शंकर की नगरी वाराणसी से तो गहरा रिश्ता रखते हैं पर राम की नगरी अयोध्या से उनका केवल चुनावी रिश्ता ही रह गया है. 2014 के लोकसभा चुनाव में वह राजकीय इंटर कालेज के मैदान पर चुनावी सभा करने के लिये गये थें. उस समय वह भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी थें. 2014 का लोकसभा चुनाव जीत कर नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बनें.

डिग्री और पत्नी त्याग पर खामोशी क्यों ?

2014 से 2019 के बीच देश विदेश के हर शहर वें गये होंगे पर अयोध्या में राम मंदिर नहीं आये. अपनी चुनावी जीत के बाद धन्यवाद देने काशी गयें. कुंभ में डुबकी लगाने प्रयागराज गये पर अयोध्या नहीं आयें. 2019 के लोकसभा चुनाव प्रचार में भी वह अयोध्या ना आकर फैजाबाद और अंबेडकर नगर संसदीय सीट को जोड़ने वाली मया बाजार में रैली करने ही आ रहे हैं जो अयोध्या से 27 किलोमीटर दूर है.

नेता तो नेता, जनता महा बेवकूफ

2014 के चुनाव जीत कर केन्द्र सरकार में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेद्र मोदी को अयोध्या बुलाने के तमाम प्रयास यहां के संतों ने किया. संतों का मानना था कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी को अयोध्या आना चाहिए था. नरेन्द्र मोदी अयोध्या आने के बाद भी राम मंदिर नहीं गये हैं. इससे मंदिर की राजनीति करने वाले संतों में निराशा का भाव है. भाजपा के नेता और कार्यकर्ता इस पर खुलकर बोलने से बचते हैं. वें इसे कोई मुददा नहीं मानते. पर वह इस सवाल का जबाव नहीं दे पाते हैं कि राम मंदिर और अयोध्या से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरी का मर्म क्या है ?

मेनका के बिगड़े सुर

अयोध्या में राम मंदिर ही वह मुददा है जिस के आधार पर भाजपा ने अपनी विजय यात्रा तय कीं. इसी मुददे पर 1992 में भाजपा की उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान की चुनी हुई सरकारें बर्खास्त की गई थी. आज बहुमत की सरकार बनाने के बाद भी नरेंद्र मोदी की अयोध्या यात्रा चुनावी होकर रह गई है. एक तरफ वह काशी में शिव की महिमा का बखान करते हैं दूसरी तरफ अयोध्या से उनकी दूरी बनी है. वें अयोध्या आकर भी राम मंदिर नहीं जा सके हैं.

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