Democracy and Voters: दुनियाभर के लोकतांत्रिक देश ही नहीं, तानाशाही वाले भी कितने ही देश, जनता की पसंद पर ही राज करते हैं और इस के लिए मतदान महत्त्वपूर्ण है. कठिनाई यह है कि मतदाता क्या आज के उलझे हुए विशाल शासकीय, सैन्य, आर्थिक व टैक तंत्र को समझ सकता है कि जिस से वह सही निर्णय ले सके. ऐसा निर्णय जो वास्तव में सरकार को काबू में रखते हुए उस से सही व सब के लिए ज्यादा से ज्यादा काम करा सके.
लोकतंत्र में वोटों का चलन पुराना है. यह वोट पहले केवल अमीर या शासक या धर्म के गुरु द्वारा नियुक्त किए गए लोग ही दे पाते थे. आमजन को इन के फैसले मजबूरन मानने पड़ते थे. आज स्थिति सिर्फ इतनी बदली है कि वोट तो हर नागरिक दे सकता है लेकिन फैसले आज भी शासक, धर्म या उद्योगों के मालिकों के माने जाएंगे.
आज का वोटर चाहे भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, ईरान, उत्तर कोरिया, क्यूबा, अमेरिका या यूरोप के किसी देश का हो, शासन के बारे में वह इतना कम जानता है कि उस के वोट के आधिकार का मतलब लगभग खत्म सा हो गया है. वोटरों ने अपनी पहली पढ़ाई, कि देश व समाज और धर्म उस के बारे में क्या व क्यों फैसले ले रहे हैं और उन से उस के वर्तमान और भविष्य पर क्या असर पड़ेगा, बंद कर दी है. आज किसी भी लोकतंत्र को देख लें, वोटर केवल सतही नारों पर वोट दे रहे हैं. अमेरिका मागा- मेक अमेरिका ग्रेट अगेन- वाले, गोरे चर्च के कंट्रोल वाले अनपढ़ लोगों ने डोनाल्ड ट्रंप जैसे बेवकूफ को चुन लिया. यूरोप के कितने ही देशों में चर्च समर्थक खाली बैठे बेरोजगार गोरों की जमात सिर्फ इमिग्रैंट्स को ले कर सरकारें चुनने में लग गई है.
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