Democracy in India: लोकतंत्र में सत्ता की असली ताकत जनता का विश्वास होती है. सरकार की मजबूती का पैमाना यह नहीं होता कि वह कितने प्रदर्शनकारियों को राजधानी में घुसने से रोक सकती है, बल्कि यह होता है कि वह कितने लोगों को बिना डर के अपनी बात कहने का मौका देती है. लेकिन जब सत्ता जनता के सवालों से ही घबराने लगे, जब सरकार के लिए नागरिकों की आवाज से ज्यादा महत्वपूर्ण कुर्सी पर बैठे किसी अधिकारी की सुरक्षा हो जाए और जब हक की आवाज उठाने के लिए दिल्ली आने वाले लोगों को रोकने में भारी भरकम पुलिस बल तैनात करना पड़े, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र के भीतर कहीं न कहीं गंभीर बेचैनी जन्म ले चुकी है.
10 अक्टूबर को दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन को लेकर सुरक्षा व्यवस्था और प्रदर्शनकारियों को रोकने की कार्रवाई ने यही सवाल खड़ा किया है. आखिर जनता के सवालों का सामना करने के बजाय सरकार को इतनी सख्ती लागू करने की जरूरत क्यों महसूस हुई? राजधानी की सड़कों पर सुरक्षा के इतने व्यापक इंतजाम किस खतरे से निपटने के लिए किए गए थे? क्या अपने मताधिकार, चुनावी पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही के सवाल उठाने वाले नागरिक देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन गए हैं?
यह सवाल किसी एक अधिकारी को बचाने और उसे कुर्सी पर बिठाये रखने या न रखने का नहीं है. यह सवाल उस लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर है, जिसमें निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता कटघरे में है और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने की कसम उठा कर सत्ता में आयी सरकार की नीति-नीयत पर प्रश्नचिन्ह लग गया है.
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