Sheikh Hasina: हसीना को मानवीय आधार पर भारत में शरण देना एक असाधारण परिस्थिति में लिया गया फैसला था, लेकिन क्या यह संरक्षण अनिश्चितकाल तक जारी रहना चाहिए? बांग्लादेश की नई सरकार की प्रत्यर्पण मांग और बिगड़ते द्विपक्षीय रिश्तों के बीच मोदी सरकार की नीति पर सवाल उठना स्वाभाविक है. आखिर किसी एक पूर्व नेता के साथ राजनीतिक निकटता भारत के दीर्घकालीन राष्ट्रीय हितों से बड़ी कैसे हो सकती है? भारत-बांग्लादेश रिश्तों की कीमत पर किसी एक व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक संरक्षण देना कैसी विदेश नीति है?

कूटनीति में दोस्ती स्थायी नहीं होती, हित स्थायी होते हैं. पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते किसी एक नेता की पसंद-नापसंद से नहीं, बल्कि वहां की जनता, वहां का भूगोल, उस देश से हमारे व्यापार सम्बन्ध, सुरक्षा और हमारे दीर्घकालीन राष्ट्रीय हितों से तय होते हैं. लेकिन बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के मामले में मोदी सरकार की नीति को लेकर अब यह सवाल खड़ा हो रहा है कि भारत आखिर कब तक शेख हसीना की मेहमाननवाजी करता रहेगा?

5 अगस्त 2024 को सत्ता से हटने के बाद शेख हसीना अपनी जान बचाकर भारत आईं थीं. तब परिस्थितियां असाधारण थीं. शेख हसीना के सम्बन्ध प्रधानमंत्री मोदी से अच्छे थे, लिहाजा मानवता के आधार पर उन्हें भारत में शरण मिली. भारत के उच्चायुक्त का हाल में एक बयान भी आया था, जिसमें उन्होंने कहा कि उस समय शेख हसीना बांग्लादेश की प्रधानमंत्री थीं और पड़ोसी व दोस्त होने के नाते भारत के सामने उन्हें प्रवेश देने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं था. लेकिन असाधारण परिस्थिति में दिया गया अस्थायी आश्रय अब दो साल से अधिक लंबा हो चुका है. बांग्लादेश की तारिक रहमान सरकार उनके प्रत्यर्पण की मांग बार बार कर रही है. और भारत सरकार यह कह कर उनका अनुरोध टाल रही है कि मामला कानूनी प्रक्रिया में है और उसकी कोई समय-सीमा नहीं बताई जा सकती है. 7 अक्टूबर 2026 को विदेश मंत्रालय ने फिर कहा कि प्रत्यर्पण ‘‘कानूनी मामला’’ है.

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