सब जानते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप किस तरह अमेरिकी लोकतंत्र के आधारभूत व पुराने मूल्यों पर हमले कर रहे हैं. अमेरिका के लोकतंत्र का यह बुनियादी उसूल रहा है कि हारने वाला उम्मीदवार विजेता की जीत का एहतराम करता है, और विजेता हारे हुए प्रतिद्वंद्वी को राजनीतिक अखाड़े में आजमाइश की इजाजत देता है. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने पिछली बहस में अपनी शिकस्त के लिए प्रतिद्वंद्वी हिलेरी क्लिंटन पर धोखाधड़ी का आरोप लगाकर और अपने राष्ट्रपति बनने की सूरत में हिलेरी को जेल भेजने की धमकी देकर दरअसल अमेरिका के गणतंत्र के इस स्तंभ को ही नकार दिया है.

सिर्फ इसी स्तंभ की बेइज्जती नहीं हुई है, ट्रंप ने जिस तरह से सच्चाई के प्रति लापरवाही भरा रुख अपनाया है, वह भी अमेरिका के लोकतंत्र पर एक तरह का हमला ही है. सभी राजनेता सच को तोड़ते-मरोड़ते हैं, पर उनकी गलतबयानी में भी अमूमन सच एक टुकड़ा जरूर रहता है. बिना यह माने कि तथ्य और सबूत महत्वपूर्ण चीज हैं, कोई भी प्रामाणिक बहस नहीं हो सकती.

ठीक वैसे ही, जैसे इनके बिना शासन करना असंभव है. इसलिए दोनों ही पक्षों (हिलेरी व ट्रंप) को बजट के आंकड़ों पर बहस करने से पहले यह मान लेना चाहिए कि दो और दो का जोड़ चार ही होता है. ट्रंप अपनी वैकल्पिक हकीकत गढ़ डालते हैं और अपने समर्थकों को प्रोत्साहित करते हैं कि वे इस हकीकत को जिएं.

उन्होंने दावा किया कि न्यू जर्सी के हजारों मुसलमानों ने 11 सिंतबर, 2001 के आतंकी हमले का जश्न मनाया था. या यह कि अनेक लोगों ने सैन बर्नार्डिनो के हमलावरों के अपार्टमेंट के आस-पास बम देखे थे, मगर इसकी रिपोर्ट लिखाने की जरूरत उन्होंने महसूस नहीं की. वास्तव में, ये दोनों ही दावे गलत हैं, बावजूद इसके ट्रंप लगातार इन्हें दोहराते रहे और अमेरिका में मुसलमानों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने जैसी अपनी अन्यायपूर्ण नीतियों को जायज ठहराने के लिए इनका इस्तेमाल करते रहे. ट्रंप जिस तरह से सच को पेश कर रहे हैं, उसे देखते हुए आशंका है कि आखिरी बहस अपने पारंपरिक रूप में संपन्न हो सकेगी.

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