Government Bans on Cinema : दिसंबर में 30वें केरल अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफके) में केंद्र सरकार द्वारा कुछ फिल्मों की स्क्रीनिंग पर प्रतिबंध लगाने का फैसला फिल्मकारों, केरल राज्य चलचित्र अकादमी की कलात्मक स्वतंत्रता पर नरेंद्र मोदी की सरकार का हमला और जनता के मामलों में अनुचित हस्तक्षेप है.
भारत में कला, संस्कृति और विचारों की आजादी संकुचित और इकतरफा होती जा रही है. यह विवाद तब शुरू हुआ जब नरेंद्र मोदी की सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या विदेशी संबंधों को प्रभावित करने की आशंका का निराधार हवाला देते हुए सिनेमेटोग्राफ अधिनियम 1952 के नाम पर 19 फिल्मों को ‘सैंसर छूट’ देने से इनकार कर दिया. किसी भी इंटरनैशनल फिल्म महोत्सव में विदेशी फिल्मों के प्रदर्शन के लिए सैंसर छूट अनिवार्य होती है. केरल सरकार की आपत्ति के बाद इन में से 13 को पारित किया गया लेकिन आखिरकार 6 फिल्में प्रदर्शित न की जा सकीं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा, सिनेमा जैसे सशक्त माध्यम पर सरकारी अंकुश लगाने और फिल्म मीडिया से जुड़े संस्थानों में सरकार के हस्तक्षेप को ले कर सवाल उठ खड़े हुए हैं. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार हर इंसान को मिला है. यह हक हर फिल्म निर्माता, लेखक व निर्देशक को भी है.
सिनेमाई स्वतंत्रता पर प्रतिबंध केवल तभी लगाया जा सकता है जब वह वास्तव में हिंसा भड़काए, न कि केवल इसलिए कि वह सरकार की विचारधारा से मेल नहीं खाती हो. लेकिन अब ज्यादातर मामलों में सरकार की तरफ से ब्यूरोक्रैट्स संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत ‘उचित प्रतिबंधों’ (जैसे, राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता और नैतिकता) के प्रावधान का गलत ढंग से इस्तेमाल कर सैंसरशिप को सही ठहराते हैं. इसी मसले पर कई साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने एक निर्णय देते हुए साफसाफ कहा था कि, ‘सैंसरशिप तब वैध हो सकती है जब प्रतिबंध तर्कसंगत हों, न कि मनमाने ढंग से लगाए गए हों. देश की सुरक्षा के लिए जो खतरे सरकार बताए वह दूर के या काल्पनिक नहीं, बल्कि सीधे और स्पष्ट होने चाहिए. सरकारी अधिकारी जानते हैं कि जब तक नागरिक सुप्रीम कोर्ट से कोई फैसला लाएंगे, महोत्सव हुए बरसों बीत चुके होंगे.
सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का गाइड और अभिव्यक्ति का सब से सशक्त माध्यम है. अफसोस की बात यह है कि ऐसे सशक्त माध्यम पर अंकुश लगाने के लिए ‘नैतिकता’ और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा‘ जैसे शब्दों का हाल के कुछ वर्षों में नौकरशाही और धार्मिक नेताओं द्वारा गलत ढंग से उपयोग किया जाने लगा है.
राष्ट्रीय सुरक्षा के बहाने राजनीतिक रूप से संवेदनशील या असुविधाजनक विषयों वाली फिल्मों को लक्षित किया जाता है, भले ही उन का देश की सुरक्षा से सीधा संबंध न हो. अकसर, सत्ता की आलोचना करने वाली फिल्मों को ‘देशविरोधी’ कह कर दबा दिया जाता है.
वर्तमान समय में तो यदि किसी आम इंसान के घर या उस के कंप्यूटर पर कोई सरकार को अप्रिय लगने वाली किताब या सामग्री उपलब्ध हो, भले ही उस इंसान ने उस सामग्री को न पढ़ा हो और न ही उस का प्रचारप्रसार किया हो, तो भी उसे दोषी कह कर जेल में ठूंसा जा रहा है.
वास्तव में नैतिकता बहुत ही ज्यादा व्यक्तिपरक शब्द है और इस का उपयोग अकसर उन विषयों को दबाने के लिए किया जाता है जो सत्तावादी या बहुसंख्यकवादी विचारधारा के अनुरूप नहीं होते. जबकि नैतिकता इस कदर व्यक्तिपरक होती है. एक इंसान के लिए जो एक कला है, वह दूसरे के लिए आपत्तिजनक हो सकती है. सरकार को यह तय करने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि वयस्क नागरिक क्या देखें अथवा क्या न देखें.
‘नैतिकता’ और ‘देश की सुरक्षा’ के नाम पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा केरल के फिल्म समारोह की फिल्मों पर लगाए गए प्रतिबंध को सभी फिल्मकारों ने एकजुटता के साथ कलात्मक स्वतंत्रता पर धर्म के रंग में डूबी नौकरशाही और राजनीति का अंकुश माना, जोकि लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध है.
सरकार सदैव सिनेमा जैसे सशक्त माध्यम पर अंकुश रखने का प्रयास करती रहती हैं. इस के लिए वह मोरैलिटी/नैतिकता की बात करती है. जबकि मोरैलिटी/नैतिकता के नाम पर नग्नता सहित कई चीजों को फिल्मों में दिखाने पर रोक लगाती है. इस के लिए पैनल कोड है. नग्नता को दिखाने या नग्नता का प्रचारप्रसार करने को ले कर आपराधिक कानून बने हुए हैं. इस कानून के तहत फिल्म के निर्माता, लेखक, निर्देशक और सिनेमाघर के मालिकों पर फिल्म के प्रदर्शन के बाद भी कार्रवाई की जा सकती है. लेकिन ऐसा करने के बजाय सरकार सीधे सिनेमा पर पहले से ही अंकुश लगाने का प्रयास करती है.
वास्तव में सरकार नैतिकता की आड़ में अपना पौलिटिकल एजेंडा चलाती है.
सभी को पता है कि भारत सहित पूरे विश्व के सभी देशों में इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में सैंसर बोर्ड से फिल्म पारित करवाए बिना फिल्में प्रदर्शित होती हैं, जो महोत्सव में विदेशी फिल्मों के प्रदर्शन के लिए अनिवार्य होती है. पर फिल्मों के नाम भेज कर इस की अनुमति केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से लिया जाना होता है. इसी आधार पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सब से पहले केरल राज्य चलचित्र अकादमी द्वारा 30वें केरल इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में 197 फिल्में दिखाने की जो सूची भेजी थी उस में से 100 से अधिक फिल्मों को प्रदर्शित न करने के लिए कहा.
केरल सरकार द्वारा विरोध जताने पर केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 19 फिल्मों को छोड़ कर अन्य फिल्मों को हरी झंडी दे दी. सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या विदेशी संबंधों को प्रभावित करने की आशंका का हवाला देते हुए सिनेमेटोग्राफ अधिनियम 1952 के तहत छूट देने से इनकार कर दिया. लेकिन केरल सरकार ने घोषणा की कि वह सैंसरशिप छूट से इनकार का विरोध करेगी और आयोजकों को निर्धारित सभी फिल्मों का प्रदर्शन करने का निर्देश दिया. यह अलग बात है कि फिल्म समारोह के आयोजकों ने कुछ फिल्मों का प्रदर्शन रद्द कर दिया. हालांकि यह दावा किया गया कि छूट से इनकार प्रक्रियात्मक कारणों से किया गया था लेकिन व्यापक रूप से यह माना जाता है कि यह राजनीतिक रूप से प्रेरित था, जिस की केरल के मुख्यमंत्री पिनारयी विजयन ने कड़ी आलोचना की.
वास्तव में राज्य सरकार द्वारा केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की बात न मानने के आदेश के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फिल्म फैस्टिवल आयोजकों को नोटिस भेज कर कहा है कि यदि उस के निर्देश का उल्लंघन किया जाता है तो सिनेमेटोग्राफिक अधिनियम के अन्य प्रावधान लागू होंगे और मुकदमा चलाया जाएगा. इसी वजह से 6 फिल्में नहीं दिखाई गईं. इसे केवल फिल्मों की हार नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि हकीकत में यह संघीय ढांचे और सांस्कृतिक स्वायत्तता की हार है.
यह अलग बात है कि इस पूरे प्रकरण पर केरल राज्य चलचित्र अकादमी के अध्यक्ष रसुल पुकुट्टी ने कहा- “मैं ने झुकने का फैसला इसलिए किया क्योंकि हम अवज्ञा का माहौल नहीं बनाना चाहते थे. हम नहीं चाहते थे कि इस से अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर असर पड़े. वैसे, केंद्र सरकार ने इन 6 फिल्मों को सैंसर से छूट देने से इनकार करने का कोई कारण नहीं बताया है.” फिल्म जगत में कई लोग रसूल पुकुट्टी की बातों से असहमत होते हुए दबी जबान कटाक्ष कर रहे हैं- ‘‘हम एक ऐसे देश की ओर बढ़ रहे हैं जहां कला ‘सरकारी मंजूरी’ की मुहताज होगी तथा सोचने व समझने से पहले इस की भी अनुमति लेनी पड़ेगी?”
फेसबुक पर कुछ लोगों ने लिखा है- ‘‘इस के पीछे वर्तमान में केंद्रीय सरकार में बैठे वे लोग हैं जिन्हें नागपुरिया विश्वविद्यालय में दीक्षित किया गया है. इस विवि ने पिछले 10-11 सालों में इसी देश में एक ऐसी आबादी पैदा कर दी है जो पूरी निष्ठा से वह सब कर रही है जो भारत के भविष्य के लिए भले ही सर्वनाशी हो, पर नागपुरिया हिंदुत्ववादियों के लिए उन की शिक्षाओं के अनुकूल हो.
“चिंता की बात यह कि इस जमात में शामिल अधिकांश आबादी बहुजनों की है जो पहले भी इस्तेमाल की गई और आज भी की जा रही है. दूसरी ओर, इन को हांकने वाले गड़ेरिए वही पुराने पुरोहितों के खानदानी हैं, जिन को कभी बुद्ध ने अपने क्रांतिकारी आंदोलन से पटरी पर ला दिया था. अफसोस अब न बुद्ध हैं और न गांधी.’’
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने विदेश नीति की आड़ में ‘यस’, ‘ईगल्स औफ द रिपब्लिक’, ‘क्लैश’, ‘फ्लेम्स’, ‘पोएट अनकंसील्ड और ‘औल दैट्स लेफ्ट औफ यू’ पर पूर्ण प्रतिबंध लगाते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा और दूसरे देशों के साथ संबंधों का हवाला दिया. जबकि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की इस बात के आलोचकों का कहना है कि महोत्सव के दर्शकों के पास फिल्म देखने और समझने की पर्याप्त परिपक्वता होती है.
इन सभी मुद्दों के आधार पर देखा जाए, तो केरल सरकार द्वारा केंद्र के आदेश को चुनौती देते हुए फिल्म फैस्टिवल के दौरान फिल्मों का प्रदर्शन जारी रखने का निर्णय एक साहसिक कदम था, लेकिन कानूनी पेचीदगियों और विदेश मंत्रालय की चेतावनियों के कारण केरल राज्य चलचित्र अकादमी को कुछ फिल्मों को हटाना पड़ा. इस से एक बात साफतौर पर उभर कर आई कि 2025 में भी सिनेमा जैसे स्वतंत्र माध्यम को नौकरशाही की संकीर्ण व्याख्याओं और राजनीतिक एजेंडे से जूझना पड़ रहा है. कला को केवल ‘सुरक्षा’ के चश्मे से देखना उस के मूल उद्देश्य, संवेदना और संवाद को समाप्त करने के अलावा कुछ नहीं है.
कला के क्षेत्र में यह कदम ‘वैचारिक आपातकाल’ जैसा है. हम सभी जानते हैं कि एक प्रतिबंधित फिल्म ‘बैटलशिप पोटेमकिन’ को हर फिल्म इंस्टिट्यूट में पाठ्यक्रम की तरह पढ़ाया जाता है. दुनियाभर के फिल्म स्कूल इस फिल्म को सिनेमा के व्याकरण की बुनियाद मानते हैं
पहले जिन फिल्मों को स्क्रीनिंग से वंचित रखा गया था, उन में कुछ फिलिस्तीनी फिल्में भी शामिल थीं, जिस से यह संदेह पैदा होता है कि क्या उन्हें फिलिस्तीनी होने के कारण ही भेदभाव का सामना करना पड़ा. पहले फिलिस्तीन केंद्रित ‘पैलेस्टाइन 36’, ‘वन्स अपौन अ टाइम इन गाजा’ और ‘वाजिब’ जैसी फिल्मों को भी रोका गया, जिस से भारत की विदेश नीति और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन पर बहस छिड़ गई.
‘संतोश’ (पुलिस बर्बरता और जातिवाद पर आधारित), ‘टिम्बकटू’, ‘बमाका’ और ‘क्लैश’ जैसी फिल्में भी इस सूची में थीं. क्रांतिकारी सक्रियता पर आधारित अर्जेंटीना की 1968 में बनी राजनीतिक डाक्यूमैंट्री फिल्म ‘द औवर औफ द फर्नेसेस’ के साथ ही महज नाम के आधार पर स्पैनिश फिल्म ‘बीफ’ को भी रोका गया. मजेदार बात यह है कि स्पैनिश फिल्म ‘बीफ’ हिपहौप संस्कृति और विरोध पर आधारित है. इतना ही नहीं, चार्ली चैप्लिन की जरमनी के तानाशाह अडोल्फ़ हिटलर पर बनी क्लासिक फिल्म ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ को भी रोका गया. जबकि ये फिल्में कई इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल का हिस्सा रह चुकी हैं. क्या नौकरशाहों को लग रहा था कि यह फिल्म लोगों को देह में बढ़ती तानाशाही के खिलाफ खड़े होने को प्रेरित कर सकती है.
यदि कोई फिल्म देश की सुरक्षा और अखंडता को प्रभावित करती है, कानूनव्यवस्था को बिगाड़ती है, या दूसरे देशों के संगसंबंधों पर असर डालती है, तो सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के पास ऐसी फिल्म को सैंसरशिप से छूट देने से इनकार करने का अधिकार है. मगर इस बार जिन फिल्मों को रोका गया, उन्हें इस आधार पर अस्वीकार करने का मसला बनता ही नहीं है.
फिल्म ‘बीफ’ को रोकना विपक्ष द्वारा शासित राज्य में लोकप्रिय सांस्कृतिक कार्यक्रम को बाधित करने की शरारती इच्छा के अलावा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है और संकीर्ण सोच का संकेत मात्र माना जा सकता है. वहीं कुछ लोग मानते हैं कि यह वर्तमान सरकार द्वारा अपना पौलिटिकल एजेंडा चलाने का मसला है. यों तो केरल राज्य चलचित्र अकादमी के रसूल पुकुट्टी ने कहा- ‘‘आईएफएफके में 6 फिल्मों पर प्रतिबंध लगाने के पीछे राजनीतिक नहीं, बल्कि नौकरशाही कारण है.’’ आखिरकार जिन फिल्मों को सैंसरशिप से छूट नहीं मिली है, वे हैं ‘ईगल्स औफ द रिपब्लिक’, ‘क्लैश’ और ‘ए पोएट’ (मिस्र), ‘औल दैट्स लेफ्ट औफ यू’ (फिलिस्तीन), ‘यस’ (इजराइल) और भारतीय फिल्म ‘फ्लेम्स’.
वर्तमान समय में राम मंदिर, कुंभ मेले में गंगा नदी में डुबकी लगाने और केदारनाथ जा कर पूजापाठ करने को प्रचारित कर सरकार टिकी हुई है. इन दिनों हर तरफ एक ही तरह की बातें की जा रही हैं. सरकार के मन के विपरीत बात कहना गुनाह हो गया है.
जिस देश में नैरेटिव पर अंकुश लगाया जा रहा हो, उस देश में सिनेमा पर अंकुश न लगे, ऐसा कैसे हो सकता है. पर सरकार और ब्यूरोक्रेट्स यह भूल जाते हैं कि हर देश का सिनेमा ही उस देश का सांस्कृतिक राजदूत होता है. लेकिन वर्तमान सरकार ने तो अपने प्रयासों से एक राज्य की सांस्कृतिक छवि के साथ देश की सांस्कृतिक छवि को ही तहसनहस करने वाला काम किया है. लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या प्रोपेगैंडा सिनेमा से ही किसी देश की संस्कृति का विकास होता है?
केरल इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल सहित सभी फिल्म महोत्सव दुनियाभर की विविध सोच को एक सार्थक मंच देते हैं. वैसे, केरल इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल अपने राजनीतिक रूप से जागरूक प्रोग्रामिंग के लिए जाना जाता है. ऐसे में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की कार्रवाई से यह बाधित हुआ, जिस से आयोजकों और फिल्मप्रेमियों में निराशा फैली. जब सरकार इन महोत्सव की फिल्मों को प्रतिबंधित करती है, तो यह वैश्विक स्तर पर भारत की ‘लोकतांत्रिक छवि’ को नुकसान पहुंचाता है. यह कलाकारों के भीतर ‘खुद को सैंसर करने’ का डर पैदा करता है, जो रचनात्मकता के लिए घातक है. इतना ही नहीं, ऐसे प्रतिबंध 2 देशों के बीच सांस्कृतिक आदानप्रदान को भी बाधित करते हैं.
सब से बड़ा व अहम सवाल यह है कि क्या अब भारतीय वयस्क नागरिकों के पास यह स्वतंत्रता भी नहीं है कि वे क्या देखें और क्या सोचें?
6 प्रतिबंधित फिल्मों की संक्षिप्त जानकारी:

01. क्लैश (मूल शीर्षक: एश्तेबक):
यह मोहम्मद दीब द्वारा निर्देशित मिस्र की फिल्म है. जून 2013 की राजनीतिक घटनाओं के ठीक बाद की पृष्ठभूमि पर आधारित यह फिल्म पूरी तरह से एक पुलिस वैन के भीतर फिल्माई गई है, जिस में मुसलिम ब्रदरहुड के सदस्य और सेना समर्थक, साथ ही इन दोनों गुटों से संबंधित न होने वाले अन्य लोग भी मौजूद हैं. फिल्म अरब स्प्रिंग के 2 साल बाद मिस्र में हिंसा और राजनीतिक उथलपुथल का वर्णन करती है, जहां अलगअलग पृष्ठभूमि के हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों को एकसाथ रहने के लिए मजबूर किया जाता है.
इसे 2016 के कांस फिल्म महोत्सव में आधिकारिक तौर पर चुना गया था और यह उस वर्ष महोत्सव के अन सर्टेन रिगार्ड सैक्शन की ओपनिंग फिल्म थी. इसे 89वें अकादमी पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के लिए मिस्र की प्रविष्टि के रूप में चुना गया था, लेकिन इसे नामांकित नहीं किया गया था. 2016 में 21वें आईएफएफके में इसे कई पुरस्कार मिले थे, जहां इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए सुवर्ण चकोरम (गोल्डन क्रो फीजेंट) और औडियंस चौइस अवार्ड से सम्मानित किया गया था. टौम होन्क्स भी इस फिल्म की तारीफ कर चुके हैं.

02. ईगल्स औफ द रिपब्लिक:
2025 में बनी एक मिस्र की अरबी भाषा की राजनीतिक थ्रिलर फिल्म है, जिसे तारिक सालेह ने लिखा और निर्देशित किया है. यह उन की काहिरा त्रयी की अंतिम कड़ी है, जो द नाइल हिल्टन इंसिडेंट (2017) और बौय फ्रौम हेवन (2022) के बाद आई है. इस में फारेस ने जौर्ज फहमी का किरदार निभाया है, जो एक अभिनेता है जिस पर एक प्रचार फिल्म में अभिनय करने का दबाव डाला जाता है. मिस्र के सब से प्रसिद्ध अभिनेताओं में से एक जौर्ज फहमी को उस फिल्म से बाहर करवा दिया जाता है जिस की वे शूटिंग कर रहे थे और उन पर एक नई प्रचारात्मक फिल्म में राष्ट्रपति की भूमिका निभाने का दबाव डाला जाता है. वे मजबूरन स्वीकार करते हैं, फिर शूटिंग के दौरान क्या क्या होता है, वही इस फिल्म की कहानी है.
फिल्म का विश्व प्रीमियर 19 मई, 2025 को कांस फिल्म महोत्सव के मुख्य प्रतियोगिता खंड में हुआ था, जहां इसे पाल्मे डीओर के लिए नामांकित किया गया था. इसे 98वें अकादमी पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर फिल्म के लिए स्वीडिश प्रविष्टि के रूप में चुना गया था, लेकिन इसे नामांकित नहीं किया गया.

03. औल दैट्स लेफ्ट औफ यू:
चेरियन डाबिस द्वारा लिखित व निर्देशित यह 2025 में बनी एक सशक्त फिलिस्तीनी महाकाव्य फिल्म है. यह फिल्म इजरायलफिलिस्तीनी संघर्ष के बीच एक फिलिस्तीनी परिवार की 3 पीढ़ियों की कहानी बयां करती है. यह एक फिलिस्तीनी परिवार के लचीलेपन, विस्थापन और संघर्ष की बहुपीढ़ीगत कहानी बयां करती है, जो 1948 के नक्बा से ले कर आज तक की घटनाओं को दर्शाती है. यह फिल्म आघात, अस्तित्व और प्रतिरोध के रूप में कहानी कहने पर केंद्रित है, जिस में सालेह बकरी, मारिया ज़्रेइक और एडम बकरी जैसे कलाकार हैं.
यह जौर्डन की औस्कर के लिए भेजी गई फिल्म थी. इस का विश्व प्रीमियर 25 जनवरी, 2025 को सनडांस फिल्म फैस्टिवल में हुआ था. इसे 98वें अकादमी पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर फिल्म के लिए जौर्डन की प्रविष्टि के रूप में चुना गया था और दिसंबर की शौर्टलिस्ट में जगह बनाई थी.
फिल्म की कहानी के अनुसार एक फिलिस्तीनी किशोर के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से उस की मां अपने परिवार के इतिहास को बयां करती है, जिस की शुरुआत 1948 में जाफा से हुए विस्थापन से होती है, और यह बेदखली के स्थायी प्रभाव को उजागर करती है.
यह फिल्म अंतरपीढ़ीगत आघात, पहचान, गरिमा, कहानी कहने के माध्यम से प्रतिरोध और अपनी आवाज को संरक्षित करने की सार्वभौमिक मानवीय आवश्यकता का अन्वेशण करती है.
04. यस (हिब्रू):
नादव लैपिड लिखित और निर्देशित 2025 में बनी यह एक ड्रामा फिल्म है, जिस में एरियल ब्रोंज, एफ़्रैट डोर, नामा प्रीस, अलेक्सी सेरेब्रियाकोव और शेरोन अलेक्जैंडर ने अभिनय किया है. फिल्म का विश्व प्रीमियर 22 मई, 2025 को कांस फिल्म महोत्सव के डायरैक्टर्स फोर्टनाइट सैक्शन में हुआ और इसे 17 सितंबर को लेस फिल्म्स डू लोसांगे द्वारा फ्रांस में सिनेमाघरों में रिलीज किया गया.
7 अक्टूबर के हमलों के बाद पियानोवादक और हास्य कलाकार वाई अपने कैरियर को आर्थिक रूप से सफल बनाने के लिए संघर्ष कर रहा होता है, तभी उसे एक नए राष्ट्रगान के लिए संगीत तैयार करने का काम सौंपा जाता है.

05. फ्लेम्स:
रवि शंकर कौशिक द्वारा निर्देशित और सुपन एस वर्मा द्वारा प्रस्तुत यह सर्वाइवल थ्रिलर फिल्म है. जिस में एक निम्न जाति के प्रवासी मजदूर की कहानी है. भारत के हरियाणा के समृद्ध लेकिन जातिग्रस्त कृषि क्षेत्रों में एक मूक प्रवासी खेतिहर मजदूर महेश को अपने अस्तित्व के लिए एक भयावह यात्रा पर निकलने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जब उस के 10 वर्षीय बेटे पर हत्या का आरोप लगता है. अपनी पत्नी की हत्या के बाद महेश जीवनयापन के लिए संघर्ष करता है. इस ने जोगजानेटपैक एशियन फिल्म फैस्टिवल में दर्शकों को प्रभावित किया. इस फिल्म में वाजिद अली, कलावती देवी, विक्रम कोचर की अहम भूमिकाएं हैं.

06. ए पोएटः
2025 में बनी एक ट्रैजिक कौमेडी फिल्म है, जिसे साइमन मेसा सोटो ने लिखा, सहनिर्मित किया और निर्देशित किया है. कोलंबिया, जरमनी और स्वीडन के बीच एक अंतर्राष्ट्रीय सहनिर्माण वाली इस फिल्म में उबेइमार रियोस, रेबेका एंड्रेड, गुइलेर्मो कार्डोना, एलिसन कोरिया, मार्गरीटा सोटो और हंबर्टो रेस्ट्रेपो ने अभिनय किया है.
फिल्म का विश्व प्रीमियर 19 मई, 2025 को कांस फिल्म महोत्सव के अन सर्टेन रिगार्ड सैक्शन में हुआ, जहां इस ने सैक्शन का जूरी पुरस्कार जीता. इसे 28 अगस्त, 2025 को ओटीएएच द्वारा कोलंबिया में सिनेमाघरों में रिलीज किया गया था. इसे 98वें अकादमी पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर फिल्म के लिए कोलंबियाई प्रविष्टि के रूप में चुना गया था, लेकिन इसे नामांकित नहीं किया गया.
फिल्म की कहानी के केंद्र में कहानी कवि औस्कर रेस्ट्रेपो हैं. औस्कर रेस्ट्रेपो का कविता के प्रति जनून उन्हें कोई प्रसिद्धि नहीं दिला पाया है. उम्रदराज और अनियमित स्वभाव के कारण वह गुमनाम कवि की छवि में ढल चुका है. जब उस की मुलाकात युरलेडी नाम की एक किशोरी से होती है, तो वह उस की प्रतिभा को निखारने में मदद करता है. Government Bans on Cinema





