Government Bans on Cinema : दिसंबर में 30वें केरल अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफके) में केंद्र सरकार द्वारा कुछ फिल्मों की स्क्रीनिंग पर प्रतिबंध लगाने का फैसला फिल्मकारों, केरल राज्य चलचित्र अकादमी की कलात्मक स्वतंत्रता पर नरेंद्र मोदी की सरकार का हमला और जनता के मामलों में अनुचित हस्तक्षेप है.
भारत में कला, संस्कृति और विचारों की आजादी संकुचित और इकतरफा होती जा रही है. यह विवाद तब शुरू हुआ जब नरेंद्र मोदी की सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या विदेशी संबंधों को प्रभावित करने की आशंका का निराधार हवाला देते हुए सिनेमेटोग्राफ अधिनियम 1952 के नाम पर 19 फिल्मों को ‘सैंसर छूट’ देने से इनकार कर दिया. किसी भी इंटरनैशनल फिल्म महोत्सव में विदेशी फिल्मों के प्रदर्शन के लिए सैंसर छूट अनिवार्य होती है. केरल सरकार की आपत्ति के बाद इन में से 13 को पारित किया गया लेकिन आखिरकार 6 फिल्में प्रदर्शित न की जा सकीं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा, सिनेमा जैसे सशक्त माध्यम पर सरकारी अंकुश लगाने और फिल्म मीडिया से जुड़े संस्थानों में सरकार के हस्तक्षेप को ले कर सवाल उठ खड़े हुए हैं. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार हर इंसान को मिला है. यह हक हर फिल्म निर्माता, लेखक व निर्देशक को भी है.
सिनेमाई स्वतंत्रता पर प्रतिबंध केवल तभी लगाया जा सकता है जब वह वास्तव में हिंसा भड़काए, न कि केवल इसलिए कि वह सरकार की विचारधारा से मेल नहीं खाती हो. लेकिन अब ज्यादातर मामलों में सरकार की तरफ से ब्यूरोक्रैट्स संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत ‘उचित प्रतिबंधों’ (जैसे, राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता और नैतिकता) के प्रावधान का गलत ढंग से इस्तेमाल कर सैंसरशिप को सही ठहराते हैं. इसी मसले पर कई साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने एक निर्णय देते हुए साफसाफ कहा था कि, ‘सैंसरशिप तब वैध हो सकती है जब प्रतिबंध तर्कसंगत हों, न कि मनमाने ढंग से लगाए गए हों. देश की सुरक्षा के लिए जो खतरे सरकार बताए वह दूर के या काल्पनिक नहीं, बल्कि सीधे और स्पष्ट होने चाहिए. सरकारी अधिकारी जानते हैं कि जब तक नागरिक सुप्रीम कोर्ट से कोई फैसला लाएंगे, महोत्सव हुए बरसों बीत चुके होंगे.
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