न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी की तर्ज पर सरकार की खीझ भोंपू न्यूज़ चैनल्स के बाद अब पुलिस के जरिए भी तरह तरह से व्यक्त हो रही है. इनमे से एक है 10 अक्तूबर के सीजेपी के धांसू प्रोटेस्ट के मद्देनजर दिल्ली के 57 मेट्रो स्टेशंस के प्रवेश और निकास द्वार टेम्परेरी तौर पर बंद कर देना. दिल्ली पुलिस के ट्रांसपोर्ट रेंज के जॉइंट कमिश्नर राजेंद्र गुप्ता ने दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन के प्रबंध निदेशक विकास कुमार को एक पत्र लिखते यह निर्देश दिए हैं.
यह तो होना ही है कि सरकार ज्ञानेश कुमार के बचाव में जायज नाजायज जो भी हो करे. यह दलितों के लिए मंदिर के दरवाजे बंद कर देना या उन्हें कुए तालाबों से पानी लेने से रोकने लठेतों की तैनाती कर देने जैसा ही है. लेकिन वह अपनी मंशा में कामयाब हो पाएगी ऐसा लग नहीं रहा. वजह बहुत साफ़ है कि काकरोच और जेन जी तू डाल डाल मैं पात पात की तर्ज पर जुलाई अगस्त में भी सरकार को मात दे चुके हैं. उनके पास एडवांस ब्रेन है जबकि प्रशासन के पास पौराणिक और परम्परागत हथकंडे हैं. इस शह का जबाब काकरोच कैसे देते हैं यह देखना उनके प्रोटेस्ट को देखने से कम रोमांचक और दिलचस्प नहीं होगा.
दिल्ली के इस यानी काकरोच वर्सेज गवर्नमेंट मेच के स्लाग ओवर्स फिकने में हालाँकि अभी कुछ घंटे बाकी हैं लेकिन भीड़ स्टेडियम की तरफ दौड़ना शुरू हो गई है. जिसे रोकने में सरकार को पसीने आ रहे हैं. 9 अक्तूबर को पुलिस ने सेंट्रल रेलवे के इटारसी जंक्शन की एक ट्रेन से कुछ प्रदर्शनकारियों को जबरन उतारा था. इस दौरान कुछ युवतियों से अभद्रता भी पुलिस ने की थी. ऐसे में अभिजीत दिपके का यह आरोप गलत नहीं लग रहा कि सरकार काकरोचों को गिरफ्तार कर रही है. विरोध का उनका क़ानूनी हक गैरक़ानूनी ढंग से छीन रही है.
आखिर क्यों सरकार इस विरोध से इतना डर रही है यह सवाल अब भक्तों को भी परेशान करने लगा है जो अपने भगवान का टेंशन देख और झेल नहीं पा रहे. वजह अब भगवान के भगवान होने की पोल खुलने लगी है. दिल्ली की इतनी किलेबंदी और घेराबंदी तो कभी मुगलों और अंग्रेजों ने भी नहीं की थी जितनी यह चुनी गई देसी सरकार कर रही है.
दिल्ली और देश का गर्माता माहौल देख तो बुद्धिजीवियों को इमरजेंसी लग जाने का डर या अंदेशा कुछ भी कह लें सताने लगा है. वजह प्रोटेस्ट एक ऐसे ही मुद्दे को लेकर है कि यह सरकार क्या वाकई ईमानदारी से सभी के वोटों से चुनी गई थी या उन वोटों के जरिए जो सरकार की नजर में वोटर होने लायक फिट हैं. दिल्ली मेट्रों के 57 स्टेशन आंशिक रूप से बंद कर देने भर से काम नहीं चलने बाला क्योंकि प्रोटेस्ट जेन जी के लिए सूफियाना इश्क सरीखा है जो यह गुनगुनाता है कि लंबी दीवारें चुनवा दो, लाख बिठा दो पहरे, रस्ते में बिछा दो ऊँचे पर्वत सागर गहरे …

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