सुप्रीम कोर्ट में चला यह दिलचस्प मुकदमा है जिस में प्रशांत भूषण को 1 रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई गई या फिर 3 महीने की कैद भुगतने को कहा गया. इस मुकदमे ने कई मिथक तोड़े हैं तो कई गढ़े भी हैं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट की लाचारी और भी ज्यादा हैरान कर देने वाली है जो अपने ही बिछाए जाल में फंसा नजर आ रहा है. पेश है अदालतों की बदहाली की पड़ताल करती खास रिपोर्ट.

‘प्रशांत भूषण के कंटैंप्ट औफ कोर्ट से पहले आप मेरे कंटैंप्ट औफ क्लाइंट मुद्दे पर मेरी पीड़ा सुनिए, क्योंकि मैं एक सभ्य शहरी हूं और 10 वर्षों से तलाक के लिए अदालतों की चौखट पर एडि़यां रगड़ते न्याय पाने के लिए तरस रहा हूं. मैं पूरे होशोहवास में बिना किसी दबाव या प्रलोभन के कह रहा हूं कि अदालत मुझे न्याय नहीं दे पा रही है. मेरी जवानी और कैरियर दोनों बरबाद हो गए हैं. मैं पूछ रहा हूं, क्या हमारी अदालतें और न्याय व्यवस्था इतनी अपाहिज, लाचार और कमजोर हैं कि सालोंसाल तक तलाक के एक मुकदमे का फैसला न कर पाएं, क्या यह अवमानना के दायरे में नहीं आना चाहिए?’

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यह कहना है भोपाल के जानेमाने पत्रकार योगेश तिवारी का जो अब

44 साल के हो चुके हैं. उन का अपनी पत्नी से 16 नवंबर, 2010 को तलाक हो गया था. उन की शादी 13 जून, 2006 को हुई थी. जल्द ही पतिपत्नी दोनों में मतभेद उभरना शुरू हो गए तो वे तलाक के लिए अदालत गए. दोनों पक्षों को सुनने के बाद क्रूरता के आधार पर जिला अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 (ए) के तहत विवाहविच्छेद यानी तलाक की डिक्री पारित कर दी.

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