School Fees: देश में प्राइवेट इंग्लिश मीडियम स्कूलों की संख्या ही नहीं बढ़ती जा रही, उन की फीस भी हर साल बढ़ रही है. पिछले सालों में दिल्ली में राज्य सरकार ने इस वृद्धि को रोकने के लिए कुछ कोशिश की थी कि यह वृद्धि पेरैंट्स, मैनेजमैंट कमेटी और शिक्षा विभाग की सहमति से हो. लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में स्पष्ट किया है कि जो भी कानून बना उस में शिक्षा विभाग को सूचित करना ही पर्याप्त है, उस की अनुमति आवश्यक नहीं है.
यह एक विडंबना है कि जब अपने बच्चे को प्रवेश दिलाना हो तो प्राइवेट स्कूलों की हर मांग पेरैंट्स पूरी करने को तैयार ही नहीं रहते बल्कि भारी फीस के अतिरिक्त छिपी रकम भी देने को तैयार रहते हैं. एक बार प्रवेश मिल जाए तो उन्हें एहसास होने लगता है कि यह स्कूल तो बहुत पैसा ले रहा है.
जब प्राइवेट स्कूलिंग एक व्यवसाय बन गई है. पेरैंट्स खुद चाहते हैं कि स्कूल का लौन हराभरा हो, विशाल बिल्ंिडगें विभिन्न रंगों से सजी हों, स्कूलबसें नई हों, क्लासरूम में एयरकंडीशनर लगे हों, बड़ा सा हौल हो, स्पोर्ट्स फैसिलिटी हो, बड़ी कंप्यूटर व साइंस लैब हों. ऐसे में फिर पैसे खर्चने में उन्हें दिक्कत क्यों है?
जब बच्चे और उस के परिवार की औकात उस के स्कूल के नाम से जानना आवश्यक हो गया हो और बच्चे से मिलने पर पहला सवाल ही यह हो कि वह कौन से स्कूल में पढ़ता है तो फीस से डरना क्या? कोई भी स्कूल बड़ी फीस तभी ले सकता है जब उस ने अपना खासा नाम कमा लिया हो चाहे भव्य भवन बना कर या चाहे बहुत अच्छे टीचर्स रख कर या अच्छी पढ़ाई करा कर. जब मैनेजमैंट जानता हो कि फीस चाहे जो भी हो कोई पेरैंट अपने बच्चे को निकाल कर सस्ते स्कूल में नहीं डाल सकता, तो वह मनमानी फीस क्यों न लेगा?
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