Iran US Conflict: ईरान का अमेरिकीइजराइली हमले के जवाब में पश्चिमी एशिया के तेल के पैसों से लबालब भरे इसलामी देशों के आर्थिक केंद्रों पर हमला एक जख्मी शेर की अच्छी नीति साबित हो रही है. ये सारे सुन्नी इसलामी देश अमेरिका के साथ हैं और इजराइल के फिलिस्तीनियों पर किए जा रहे जुल्मों पर अपने व्यावसायिक हितों के कारण चुप ही रहते थे. उन्हें यह भी मालूम है कि उन के पास चाहे पैसा भरपूर हो पर वे इजराइल-अमेरिका जैसी तकनीक खुद पैदा नहीं कर सकते जो उन्हें सुरक्षा दे सके.

ईरान ने अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या के बाद पश्चिमी एशिया में बने अमेरिकी सैनिक अड्डों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया और तटस्थता से सुरक्षित मानने वाले कतर, यूएई, सऊदी अरब के एयरपोर्टों व उद्योगों, पैट्रोल रिफाइनरियों पर भी हमले शुरू कर दिए. ईरान कभी दूध का धुला नहीं था. वास्तव में तो उस का शासन क्रूर, दंभी, कट्टर इसलामी लोगों के हाथों में ही था जो अपने लोगों पर भी जुल्म करते थे और बाहर के देशों, खासतौर पर इजराइल, को धमकियां देते रहते थे. ईरान से किसी को हमदर्दी नहीं हो सकती लेकिन उस की रणनीति कामयाब साबित हो रही है.

अमेरिका जैसे वियतनाम और अफगानिस्तान में हारा था, कुछ वैसा ही ईरान में हो, तो कोई बड़ी बात नहीं. ईरानी सेना बेवकूफों की भीड़ नहीं है क्योंकि ईरान का इतिहास न केवल पुराना है बल्कि वह गोरों के शासन से भी बचा रहा है. वह बेहद अंधविश्वासी है पर वहां का कल्चर और शिक्षा ठीकठाक है, दूसरे अरब देशों से कहीं बेहतर है. ईरान पर गलत लोगों का राज लंबे समय से रहा है पर फिर भी वहां की जनता ने हार मानना नहीं सीखा है. इस युद्ध में ईरान अपने सस्ते हथियारों से अमेरिका और इजराइल के महंगे हथियारों को नष्ट कर रहा है. छापामार गुरिल्ला युद्ध वियतनाम और अफगानिस्तान में जम कर काम आया था और कोई वजह नहीं कि इस बार काम नहीं आएगा.

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