सरकार को चारों तरफ से घेरने की अग्र जिम्मेदारी जिन मीडिया चैनलों पर थी, वे पहरेदार बन उस का बचाव करने में जुटे हैं. टीवी न्यूज चैनलों द्वारा किसानों की समस्याएं, बेरोजगारी, महंगाई जैसी दिक्कतों को छिपाने के भरसक प्रयास और गैरजरूरी मुद्दे उठाए जाना एक सोचेसम?ो षड्यंत्र का हिस्सा है. अधिकांश चैनलों द्वारा असल मुद्दों को धूल की तरह कारपेट के नीचे छिपाया जा रहा है. आज पूरे विश्व में हिटलर और उस की दहशत के बारे में कौन नहीं जानता.

ऐसा क्रूर शासक जिस के बारे में प्रचलित किस्सेकहानियां आज भी दिल दहला देती हैं, सोचने को मजबूर कर देती हैं कि क्या लोकतंत्र के दमन का ऐसा भी कोई शासन चलाया जा सकता था? इस प्रश्न का जवाब यदि हिटलर युग में ढूंढ़ा जाता तो शायद न मिलता लेकिन आज इस का जवाब जोसेफ गोएबल्स के रूप में मिलता है. जोसेफ गोएबल्स नाजी जरमनी का मिनिस्टर औफ प्रोपगंडा था. गोएबल्स का कहना था, ‘एक ?ाठ को अगर बारबार दोहराया जाए तो वह सच बन जाता है और लोग उसी पर यकीन करने लगते हैं.’ बात बिलकुल सही थी, इसलिए पूरे विश्व में हिटलर के राज और गोएबल्स के काज को मानने वाले संकीर्ण लोगों ने इसे तहेदिल से स्वीकार किया. अब गोएबल्स तो नहीं रहा लेकिन उस की कही बातें कइयों के मनमस्तिष्क में घर कर गई हैं.

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और आधुनिक तकनीकी युग में हमारे देश भारत में हर शाख पर गोएबल्स सरीखे खड़े कर दिए गए हैं जिन का काम सिर्फ सरकार या कहें मोदी की चाटुकारिता करना व देशवासियों को गुमराह करना है. भारत में यह जिम्मा सीधेतौर पर न्यूज चैनलों को भी दे दिया गया है. कहने को चैनल्स जन की आवाज हैं पर उन के असल रिंग मास्टर नरेंद्र मोदी हैं. यही कारण है कि उन के प्रधानमंत्रित्व वाली सरकार के कार्यकाल के दौरान चैनलों के लिए ‘गोदी मीडिया’ शब्द ईजाद हुआ. इस की कई वजहें हैं. पिछले साल की बात है, देशवासियों पर कोरोना के बढ़ते कहर का जितना असर पड़ा, उस से कहीं अधिक असर सरकार की बदइंतजामी का पड़ा. अच्छेखासे चलते व्यापार ठप पड़ गए, करोड़ों ने अपनी नौकरियां गंवाईं और शहरों में रहने वाले प्रवासी मजदूर सैकड़ों मील पैदल अपने गांव जाने को मजबूर हुए. किंतु न्यूज चैनलों ने इन समस्याओं पर सरकार से सवाल करने की जगह जनता से दीया, टौर्च जलाने और तालीथाली पीटने के बेवकूफीभरे कृत्य करने पर जोर दिया. यही नहीं, भाजपाई सरकार के शासन के बीते सालों में नोटबंदी, जीएसटी जैसी आर्थिक (कु)नीतियां थोपी गईं, जिन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को चौपट कर डाला. हैरानी यह है कि तब भी टीवी चैनल सरकार का बचाव करते दिखे.

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