‘किसान फैक्टर’ जिस तरह से 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में अपनी छाप छोड़ने में सफल हुआ है, उससे अब राजनीतिक दलों को सर्तक हो जाना चाहिये. जाति और धर्म के नाम पर जिस तरह से किसानों को अब तक धोखा दिया जाता था, अब किसान उससे बाहर आ गये हैं. बहुत सारे प्रयासों के बाद भी किसान भाजपा के धार्मिक एजेंडे का हिस्सा नहीं बने. मोदी से लेकर योगी तक हर नेता ने उनको राम से लेकर हनुमान के नाम तक भरमाने की पूरी कोशिश की. किसानों की एकजुटता अब सरकारों को उनके हित में काम करने के लिये मजबूर करेगी.

किसान को यह समझ आ चुका था कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान की भाजपा सरकारों को बचाने के लिये उनको बरगलाया जा रहा है. केन्द्र सरकार ने स्वामीनाथन कमेटी लागू नहीं की और किसानों की आय दोगुनी नहीं हुई, खर्च दोगुना हो गया. ऐसे में किसानों की बात करने वाली कांग्रेस को सत्ता सौंप दी. उसी कांग्रेस को तेलंगाना में सत्ता से दूर रखा और वहां पर नये दल को सत्ता दे दी. किसानों ने भाजपा को सबक देते हुये कांग्रेस को भी चेतावनी दी है कि अगर किसानों से किया गया वादा पूरा नहीं हुआ तो यही हाल तय है.

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मिजोरम और तेलंगाना के विधानसभा चुनावों में एक सबसे खास बात देखने को आई कि चुनाव परिणाम के बाद किसानों की भूमिका पर बातें हुई. सभी राजनीतिक जानकारों ने इस बात को माना कि किसानों ने इन चुनाव परिणामों को बेहद प्रभावित किया. किसानों ने जिस पार्टी को वोट दिया वह ही सत्ता में आई. विधानसभा चुनावों में किसानों का प्रभाव सबसे अधिक मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना में देखने को आया.

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान के किसानों ने भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बाहर किया और कांग्रेस पर भरोसा दिखाया. तेलंगाना में कांग्रेस से अधिक किसानों से टीआरएस यानि तेलंगाना राष्ट्र समिति पर भरोसा किया. टीआरएस क्षेत्रीय दल है किसानों के सबसे करीब है. ऐसे में किसानों ने सबसे अधिक भरोसा उस पर किया.

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के पहले पंजाब के विधानसभा चुनावों में भी किसानों ने एकजुटता का प्रदर्शन कर भाजपा के मुकाबले कांग्रेस को जितवाया था. किसान अपने मुद्दों पर तमाम बार वोट देकर सत्ता में उठापटक करता रहा है. राजनीतिक दल इससे सबक नहीं लेते और जीत हार का विश्लेषण करते समय किसानों को केन्द्र बिंदु में नहीं रखते हैं. वोट लेने के समय किसानों की बात होती है और सरकार बनाने के बाद किसानों को भूल जाते हैं. अब किसान अपने को भूलने वाले दलों को दरकिनार करने में देरी नहीं लगा रहा है.

2014 के आम चुनाव में भाजपा ने किसानों के लिये स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशें लागू करने, किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया. सरकार बनाने के बाद इस दिशा में कोई काम नहीं हुआ. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में वोट लेने के लिये किसानों का कर्ज माफ करने का वादा किया, पर उसको सही से पूरा नहीं किया. सभी किसानों का लोन माफ नहीं हुआ. मंहगाई का बढ़ता प्रभाव किसानों पर भी पड़ता है.

नोटबंदी और बैंकों की लालफीताशाही कम होने का नाम नहीं ले रही. किसानों को बैकों के ज्यादा चक्कर लगाने पड़ रहे हैं. बैकों की तमाम सेवाओं के लिये उनको पैसे देने पड़ रहे हैं. पहले केवल लोन लेने वाले किसान ही बैंक जाते थे, अब हर किसान को जाना पड़ता है. ऐसे में बैंको की सेवाओं के पैसे उनको परेशान करने लगे हैं. सरकार इस तरफ ध्यान नहीं दे रही. किसानों के तमाम आंदोलनों पर केन्द्र सरकार ने चुप्पी साध ली. जिसके बाद किसानों ने भाजपा की तीनों सरकारों को सत्ता से बाहर कर दिया. किसान अब जागरुक है. वादा नहीं निभाया गया तो वह वोट नहीं देगा.

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