Muslim Political Representation: भारत की राजनीति में मुसलमानों का जिक्र चुनाव के समय खूब होता है, लेकिन सत्ता और फैसले लेने वाली संस्थाओं में उनकी मौजूदगी लगातार कम होती है. प्रतिनिधित्व और टिकट घटने के बीच मुस्लिम समाज का एक बड़ा हिस्सा अब राजनीति से ज्यादा रोजगार, कारोबार, शिक्षा और आर्थिक सुरक्षा को प्राथमिकता देता दिख रहा है. लेकिन राजनीति से दूरी क्या इस समुदाय की आवाज को और कमजोर नहीं कर देगी?
भारत की राजनीति में मुसलमानों की मौजूदगी को केवल वोट बैंक के चश्मे से देखने की परंपरा है. चुनाव नजदीक आते ही मुस्लिम मतदाता अचानक राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ जाते हैं और चुनाव खत्म होते ही उसकी राजनीतिक हिस्सेदारी पर बात गायब हो जाती है. सवाल यह है कि जिस समुदाय की आबादी देश में करीब 14 फीसदी है, उसका संसद और विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व इतना कम क्यों है? और क्या इस लगातार घटते प्रतिनिधित्व के कारण ही मुस्लिम समुदाय देश की राजनीति से दूर होता जा रहा है?
2024 के लोकसभा चुनाव का आंकड़ों पर नजर डालें तो 543 सदस्यों वाली लोकसभा में केवल 24 मुस्लिम सांसद चुने गए थे. यानी करीब 4.4 फीसदी. 2019 में यह संख्या 27 थी और 1980 में 49 मुस्लिम सांसद लोकसभा पहुंचे थे.
यहां एक और महत्वपूर्ण तथ्य है. 2024 में भाजपा ने केवल एक मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दिया था. उसके सहयोगी जेडीयू ने भी एक मुस्लिम उम्मीदवार उतारा था. दूसरी तरफ कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आरजेडी, एनसीपी और सीपीआईएम जैसी प्रमुख विपक्षी पार्टियों ने मिलकर 78 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, जबकि 2019 में इन्हीं प्रमुख विपक्षी दलों ने 115 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था. यानी मुसलमानों की राजनीतिक हिस्सेदारी में कटौती सभी राजनीतिक पार्टियों ने की है. मगर इस समुदाय का वोट पाने के लिए सभी जुबान लपलपाते रहते हैं.
आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें
डिजिटल
सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं
- सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
- देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
- 7000 से ज्यादा कहानियां
- समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
डिजिटल + 24 प्रिंट मैगजीन
सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं
- सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
- देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
- 7000 से ज्यादा कहानियां
- समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
- 24 प्रिंट मैगजीन





