याद है तुम्हें कितना गुस्सा हुए थे तुम

जब पलट कर देखना बंद कर दिया मैं ने

चुप रहने लगी थी अपनेआप में बंदबंद

तुम्हें देख कर भी अनदेखा कर देती थी

खिड़की जानबूझ कर बंद कर ली थी

कि तुम्हें देख न सकूं

हालांकि अपनी हर कोशिश के बाद

भर आता था मन

आंखों में चुभन से सने हुए आंसू लिए

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