धरती की देह पर उगे पेड़
जो सदा मौन हैं
हर पेड़ में नजर आया मुझे तुम्हारा चेहरा
इन पेड़ों की छाया तले
बुजुर्गों के लगे ठहाके
मनचलों की ताश की बिसातें बिछीं
बालकों को शाखों पे चढ़ते देखा
किशोरियों ने झूला डाला
प्रेमी जोड़ों ने खाल को छील, दिल बनाए

किंतु इन पेड़ों के चेहरों पर
कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखी
ठीक तुम्हारी तरह
और अब जैसे आदी हो गई हूं
इस मौन की, पेड़ों की भी और तुम्हारी भी

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