सपने कांच के गिलासों की तरह

रोज टूटते हैं

कभी मन की अलमारी से निकालते

हाथ से छूट जाते

कभी धोने, पोंछने, संवारने में

फिसल कर टूट जाते

कोई दुख की गरम चाय

सह नहीं पाते हैं

कोई समय के हाथ के दबाव से

चटक जाते हैं

कोई वास्तविकता के फर्श पर

गिर चूर हो जाते

कोई कड़वी आलोचना के भार तले

दब जाते

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