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अधपकी रोटियां: भाग 2- शकुन ने उन रोटियों को खाने से क्यों इनकार कर दिया?

लेकिन हां, उस की शकुन तो थी. वह उसे बताएगा कि उस के जैसी रोटी वह भी बना सकता है.  सुंदर शकुन का इंतजार इतनी बेताबी से करने लगा, जितनी शायद किसी बच्चे को अपना अच्छे वाला रिपोर्टकार्ड मां को दिखाने में भी न होती होगी.

एक शकुन ही थी, जिसे सुंदर इंप्रैस करने में लगा रहता. पर शकुन आसानी से इंप्रैस होने वालों में से न थी. चाहे वह 5-6 साल पहले मदर स्कूल की प्राइमरी सैक्शन की इंचार्ज के पद से रिटायर हो चुकी थी, लेकिन अभी भी उसे हर चीज बिलकुल सही चाहिए थी. आटा हो तो एमपी सेहोर के शरबती गेहूं का, और वो भी उस की आंखों के सामने पिसा हुआ. उन के यहां देशी घी केवल गाय के दूध से बना मदर डेयरी ब्रांड का लाया जाएगा, कोई दूसरी ब्रांड का नहीं. रात को सागसब्जी के साथ 2-2 रोटी खानी हैं, बस.

“इन्हीं सही आदतों के रहते हम दोनों अभी तक अपने पैरों पर खड़े हैं, नहीं तो कब के बिस्तर पर पड़े होते,” शकुन मौकेबेमौके सुंदर को याद दिलाती रहती.
सुंदर शकुन की समझदारी का कायल था. बस उस की यही समस्या थी कि शकुन उसे भी हर वक्त, हर काम में सही देखना चाहती थी. वह उस के एक ही शब्द “सुनो,” से घबरा जाता, जैसे उसे उस की बीवी ने नहीं, किसी थानेदार ने थाने में बुलाया हो. कहीं न कहीं जरूर उस से कोई भूल हुई है, तभी तो पेशी का समन आया है.
आज प्रातः भी ऐसा ही कुछ हुआ था.

“सुनो,” शकुन की आवाज बाथरूम से आई. वह तब नहाधो कर आरामकुरसी पर बैठा ‘आजतक’ के चैनल पर इजराइल और हमास के युद्ध की ताजा खबरें देख रहा था. उसे शकुन का सामना करने में कुछ पल लग गए. अपने कूल्हों पर हाथ टिकाए वह वाशबेसिन के नल के सामने सख्त अंदाज में खड़ी थी. नल से पानी की पतली सी धारा बह रही थी. शकुन उसे घूर रही थी और सुंदर अपराधी सा बना बहते पानी को देख रहा था. दोनों में से किसी ने भी नल को बंद करने का यत्न नहीं किया था.
“मैं तुम्हें सैकड़ों बार कह चुकी हूं…” शकुन के तीखे स्वरों की ऊर्जा से सुंदर हरकत में आया. उस ने नल बंद किया और फिर अपने कमरे की ओर जाने लगा. टीवी से उस के चहेते रिपोर्टर गौरव सावंत की आवाज आ रही थी.

“80 साल के होने जा रहे हो और अभी तक तुम में मैनर्स नाम की चीज नहीं है. यहां मैं बात कर रही हूं और लाटसाहब को टीवी देखने की पड़ी है. टीवी… टीवी… टीवी के सिवा कुछ नहीं. तुम्हारे पास इतना भी वक्त नहीं है देख सको बाथरूम का नल सही बंद हुआ भी है या नहीं.”

सुंदर मन मार कर इस प्रतीक्षा में खड़ा था कि कब शकुन उस पर अपनी बातों के बाणों  का प्रहार रोके और कब वह वहां से जाए. वह अस्पष्ट शब्दों में अपनी सही उम्र के विषय में बुदबुदाया.

“सफल दुकान से जो तुम सेब खरीद कर लाए थे, वो टोकरी में पड़ेपड़े सड़ रहे हैं. खाने नहीं थे तो लाए ही क्यों? इस तरह क्यों पैसा बरबाद करते हो?”
“तुम ने व्रत रखा था. मैं ने सोचा कि तुम खाओगी.”

“जैसे तुम्हें मेरी परवाह हो. कौन से तुम ने छीलकाट कर मुझे परोसे. कभी भी ऐसा किया तुम ने? अरे, मुझे छोड़ो. क्या तुम ने खुद अपने लिए काट कर खाए? अब तुम बच्चे तो हो नहीं कि मैं जबरदस्ती तुम्हारे मुंह में फल काटकाट कर डालूं. तुम्हारा ऐसा ही लापरवाह रवैया रहा, तो एक दिन बीमार पड़ जाओगे. मुझ से सेवाटहल की उम्मीद मत रखना. मेरे पास और भी बहुत से काम हैं. धोबी कभी का प्रैस किए हुए परदे दे गया है. वह बालकौनी में पड़े धूल चाट रहे हैं. मेरे घुटनों में दर्द न होता तो मैं खुद उन्हें टांग देती. तुम मेरे किसी काम के भी हो?”

“धोबी ने कल रात को ही तो परदे दिए थे. मैं उन्हें टांगने की सोच रहा था कि…”

“मुझ से फालतू की बहस मत करो, प्लीज. जाओ, जा कर टीवी देखो. और तुम करोगे भी क्या…?”

सुंदर अपने कमरे में चला आया. उसे शकुन की बातों पर गुस्सा तो आया, पर वह अपने गुस्से को निकाल नहीं पाया. उस ने टीवी बंद कर दिया और चुपचाप उदासी के घेरे में आरामकुरसी पर बैठ गया. इन गुमसुम घडियों में उसे लगा कि वह सचमुच कितना अकेला है. उसे याद आया कि कभी वक्त था, जब इसी घर में कितनी चहलपहल रहती थी.

“जाओ, पंजाबी की दुकान से सौ ग्राम पनीर ले आओ. फ्रोजन मटर का एक पैकट भी लेते आना,” शकुन की आवाज ने जैसे उस के जख्मों पर मरहम लगा दी हो. यह उस का दोनों के बीच सुलह का संकेत था.

सुंदर ने अपने खयालों में डूबे हुए ध्यान ही नहीं दिया था कि शकुन कब से उस की कुरसी की बगल में खड़ी थी. वह उठा और साइड टेबल पर पड़े वालेट को जेब में डालते हुए बोला, “कहो तो कुछ केलेवेले भी लेता आऊं?”

“मन है तो लेते आना, लेकिन दर्जनों नहीं. देख लेना कि केले कच्चे न हों और न ही ज्यादा पके हुए.”

सुंदर अभी दरवाजे तक ही पहुंचा था कि शकुन ने उसे आवाज दी, “थैला लेते जाओ. दुकानदार अब चीजें ले जाने के लिए पन्नी नहीं देते.”
वह किचन में गया और शौपिंग बैग ले कर मार्केट की ओर चल दिया.

फिर ले रहा गठबंधन आकार, क्या इस बार भी जाएगी कोशिश बेकार

राहुल गांधी की न्याय यात्रा का उत्तरप्रदेश में आखिरी पड़ाव आगरा था जहां की टेढ़ी बगिया में सुबह से ही सपा और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के आने का सिलसिला शुरू हो गया था. दोपहर होतेहोते इलाके में पांव रखने की भी जगह नहीं बची थी. चारों तरफ झंडे ही झंडे नजर आ रहे थे जिन से 22 जनवरी के अयोध्या इवेंट के दौरान लगाए भगवा झंडे ढकने या एक हद तक छिपने लगे थे. सपा और कांग्रेस के झंडों के साथ साथ दलितों वाले नीले झंडे एक नई जुगलबंदी की चुगली कर रहे थे जो अब बसपा से ज्यादा भाजपा के लिए चिंता की बात हो सकती है.

सपा प्रमुख अखिलेश यादव के सभा में पहुंचते ही नारेबाजी शुरू हो गई और सपा कार्यकर्ताओं की अखिलेश तक पहुंचने की होड़ में मंच की रैली टूट गई जो ऐसे आयोजनों में सफलता की निशानी मानी जाती है. आधे घंटे बाद राहुल और प्रियंका गांधी पहुंचे, राहुल और अखिलेश के गले मिलते ही यह साफ हो गया कि अब एक बार टूटने के बाद इंडिया गठबंधन फिर आकार ले रहा है. राहुल और अखिलेश के जयजयकार के नारों के दौरान भीमराव आंबेडकर की जय के भी नारे लगे जिस से जाहिर है कि बड़ी तादाद में दलित भी इस सभा में आए थे.

अखिलेश यादव ने माहौल देखते कहा, बाबा साहब के जिन सपनों को भाजपा ने बर्बाद किया है उन्हें पूरा करने के लिए हमें एक कसम खानी होगी. बीजेपी हटाओ, देश बचाओ, संकट मिटाओ. भाजपा ने दलितों पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को वह सम्मान नहीं दिया है जिस के कि वे हकदार हैं. गौरतलब है कि अखिलेश यादव का पूरा फोकस पीडीए यानी पिछड़े दलितों और अल्पसंख्यकों पर है जिस का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस के पास है. इसलिए दोनों के बीच सहमति इस बात पर बनी है कि उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 17 पर कांग्रेस लड़ेगी और बाकी 63 पर सपा और इंडिया ब्लौक के दूसरे सहयोगी भाजपा को टक्कर देंगे.

वोट शेयरिंग होगी क्या

बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के एक बार फिर पलटी मारने के बाद इंडिया गठबंधन बिखरता दिखाई दे रहा था. रालोद मुखिया जयंत चौधरी के भी भगवा गैंग ज्वाइन कर लेने के बाद हर कोई विपक्षी एकता की तरफ से निराश हो चला था लेकिन जिस तेजी से इंडिया गठबंधन में सीट शेयरिंग पर सहमति बन रही है वह बताती है कि जो होना था वह हो चुका है और गठबंधन छोड़ कर जो दल और नेता भाजपा के साथ गए हैं वे न केवल अपनी जमीन खो चुके हैं बल्कि उन का आत्मविश्वास और पौराणिकवादियों से जूझने का जज्बा भी ध्वस्त हो चुका है.

उत्तर प्रदेश के साथ साथ दिल्ली में भी सीटों का फार्मूला तय हो चुका है जिस के तहत आप 4 और कांग्रेस 3 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. दोनों ही जगह कांग्रेस को उस की राष्ट्रीय कद काठी के लिहाज से सम्मानजनक सीटें मिली हैं. बिहार में कचरा छंटने के बाद राजद और कांग्रेस खुद को ज्यादा कम्फर्ट महसूस कर रहे हैं. अब लोगों और भाजपा की निगाहें खासतौर से महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल पर है जहां सीटों का पेंच अभी भी फंसा है.

ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे भी बेहतर समझ रहे हैं कि अब वक्त कम बचा है. भाजपा लगातार आक्रामक हो रही है और तरहतरह से दबाब भी बना रही है. अगर उस से बचना है तो सीटों की जिद तो उन्हें छोड़ना पड़ेगी जिस से फायदे की तो कोई गारंटी नहीं लेकिन जो तयशुदा नुकसान दिख रहे हैं उन की भरपाई फिर किसी टोटके से नहीं होने वाली.

सीट शेयरिंग के मामले में अब कांग्रेस भी उदारता से काम ले रही है. यही मजबूरी क्षेत्रीय दलों की हो चली है. अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव ने नफेनुकसान का हिसाबकिताब वक्त पर लगा लिया इसलिए अब बेफिक्री से चुनाव प्रचार कर रहे हैं ताकि सीट की तरह वोट शेयरिंग पर भी काम किया जा सके. इसी तरह ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे भी जल्द कोई फार्मूला निकाल लें तो बात किसी हैरानी की नहीं होगी.

पर लाख टके का सवाल इन नेताओं के सामने यह मुंह बाए खड़ा है कि वोट शेयरिंग का फार्मूला कहां मिलेगा. जाहिर है अब लोकतंत्र की लड़ाई धर्म से है और सीधे तौर पर कहें तो सवर्ण बनाम गैरसवर्ण है जिस के बारे में आगरा में ही अखिलेश यादव की बातों को विस्तार देते राहुल गांधी ने कहा था कि देश में पिछड़ों दलितों और अल्पसंख्यकों की आबादी 88 फीसदी है लेकिन देश की बड़ीबड़ी कम्पनियों के मैनेजमेंट में इन वर्गों के लोग आप को नहीं मिलेंगे. ये लोग आप को मनरेगा कांट्रैक्ट लेबर की लिस्ट में मिलेंगे. हमें यही बदलना है और यही सामाजिक न्याय का मतलब है.

 

लेकिन धर्मांधता का इलाज क्या

पौराणिक वर्ण व्यवस्था की इस से आसान व्याख्या कोई और हो भी नहीं सकती लेकिन इस बात को लोगों के गले उतारना या उन्हें वोट देने की हद तक सहमत करना भी आसान काम नहीं है. भाजपा कोई 15 फीसदी सवर्ण वोटों के भरोसे ही नहीं इतरा रही बल्कि धर्म के नाम पर और मुसलमानों के खौफ के नाम पर उसे पिछले 2 लोकसभा चुनाव में इफरात से दलितों आदिवासियों और पिछड़ों के भी वोट मिले हैं. इसलिए वह इन दोनों मुद्दों को नहीं छोड़ रही.

वह लगातार मंदिरों की ताबड़तोड़ राजनीति कर रही है. जब अखिलेश और राहुल लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की दुहाई आगरा में दे रहे थे ठीक उसी वक्त में नरेंद्र मोदी द्वारिका के समुद्र में डुबकी लगाते एक दिव्य अनुभव ले रहे थे. उन के हाथ में मोर पंख और साथ में कैमरा मेन और सिक्योरटी गार्ड भी थे. ईश्वर में अनास्था और अविश्वास का इस से बड़ा उदाहरण कोई और हो भी नहीं सकता कि आप सुरक्षा के लिए बजाय उपर वाले के नीचे वालों की मदद लें.

यही धर्मांधता उन्होंने देशभर में फैला रखी है. सवर्ण तो इस से कोई समझौता करने को तैयार नहीं हैं जिन्हें न महंगाई सताती है, न बेरोजगारी और न ही भ्रष्टाचार से कोई सरोकार है. मुख्यधारा पर काबिज यह वर्ग एक जूनून के तहत जी रहा है जो आगे चल कर उसी के लिए घातक साबित होगा लेकिन वह धर्म और उस की राजनीति ही क्या जो लोगों को उन के भविष्य के बारे में सोचने दे. वह तो एक पूरे वर्ग का वर्तमान नष्ट करती है जिस से भविष्य तो एडवांस में चौपट हो जाता है.

इस खेल में भाजपा इतनी अंधी हो चुकी है कि नीतीश कुमार और जयंत चौधरियों जैसों को भी हाथोंहाथ ले रही है जिन के अपना कोई ईमान धर्म नहीं. भगवा गैंग इस हकीकत को भी समझती है कि नीतीश या जयंत का जो थोड़ा बहुत वोट बैंक है उस का पूरा हिस्सा उसे नहीं मिलने वाला लेकिन जो भी मिले वह उस से भी नहीं चूक रही.
हैरानी या अफसोस की बात यह है कि भाजपा का कोर वोटर भी इन भगोड़ों से परहेज नहीं करता क्योंकि उसे मालूम है कि किस छलकपट से महाभारत का युद्ध पांडवों ने जीता था. कर्ण, भीष्म, अश्वथामा और अभिमन्यु जैसे महारथी उस ने साजिश रचते ही मारे थे. अगर यही धर्म है तो इस की हकीकत आम लोगों तक पहुंचाना न राहुल गांधी के बस की बात है न अखिलेश यादव के और न ही ममता बनर्जी या अरविंद केजरीवाल के बूते की बात है.

लेकिन यह लोकतंत्र है जिस में आज नहीं तो कल जनता होश में आती ही है पर तब तक उस का और देश का जो नुकसान हो चुका होता है. उस की भरपाई में सालोंसाल लग जाते हैं. क्योंकि इस दौरान सामाजिक तानाबाना भी तहसनहस हो चुका होता है. ठीक वैसे ही जैसे मुगलों के आने और उन से भी पहले हुआ करता था.

मौजूदा समाज के एक बड़े वर्ग की पौराणिक मानसिकता लाइलाज नहीं है लेकिन यह मर्ज अकसर एडवांस स्टेज पर आ कर ही ठीक होता है. यह अनुभव या सबक भी इतिहास से ही मिलता है. यह जरुर देश का सौभाग्य होगा कि लोग वक्त रहते संभल और समझ जाएं नहीं तो हालफिलहाल उन का कुछ बिगड़ता नहीं दिख रहा.

रही बात इंडिया गठबंधन की तो उसे इस हकीकत से लोगों को रूबरू कराना होगा लेकिन यह जिम्मेदारी जिस मीडिया और बुद्धिजीवियों की है उन में से अधिकतर नीलाम हो चुके हैं या गिरवी रखा चुके हैं तो कोई क्या कर लेगा. यह लोकसभा चुनाव सीटों से ज्यादा वोट फीसदी के लिहाज से ज्यादा अहम साबित होगा जो यह भी साबित करेगा कि देश के कुल कितने फीसदी लोग वर्ण व्यवस्था की वापसी चाहते हैं और कितने फीसदी खुली हवा में सांस लेना चाहते हैं.

पति कब मांग सकता है गुजारा भत्ता, इंदौर की फैमिली कोर्ट ने कह दी यह बात

इंदौर में फैमिली कोर्ट ने ब्यूटी पार्लर चलाने वाली पत्नी को आदेश दिया कि वह 12वीं पास पति को हर महीने 5 हजार रुपए का गुजारा भत्ता देगी. 23 साल के विजय और 22 साल की दीपा का तलाक और गुजारा भत्ते को ले कर मुकदमा इंदौर फैमिली कोर्ट में चल रहा था. इन की दोस्ती अपने एक मित्र के जरिए हुई थी. पहले दोनों में बातचीत हुई इस के बाद प्यार और शादी की तरफ मामला बढ़ गया. विजय के मुताबिक दीपा उस को पसंद करने लगी थी इसलिए उस ने ही प्रपोज किया.

विजय उस से शादी नहीं करना चाहता था लेकिन दीपा ने धमकी दी कि अगर शादी नहीं की तो वह जान दे देगी. इस दबाव में आ कर विजय ने दीपा के साथ साल 2021 में आर्य मंदिर में शादी कर ली. विजय की शादी से उस के परिवार वाले खुश नहीं थे. विजय मजबूरी और डर में घुटघुट कर दीपा के साथ रह रहा था. दीपा से परेशान विजय एक दिन उसे छोड़ कर भाग गया और अपने परिजन को पूरी बात बताई. इस के बाद विजय ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और कोर्ट में भरण पोषण के लिए केस भी दायर किया.

विजय के केस दर्ज करवाने के बाद दीपा ने भी विजय पर घरेलू हिंसा का केस दर्ज करा दिया. कोर्ट में दीपा ने बताया कि वो कामकाजी नहीं है. उस ने विजय से भरण पोषण की भी मांग की. विजय ने कोर्ट को बताया कि वो 12वीं पास है और दीपा की वजह से उस की पढ़ाई छूट गई. वह उसे बहुत प्रताड़ित करती थी इसलिए वह घर से भाग गया.
विजय ने कोर्ट को बताया कि जब पत्नी दीपा ने पुलिस में उस की गुमशुदगी दर्ज कराई तब उस ने पुलिस को बताया था कि वह ब्यूटी पार्लर चलाती है. इस से दीपा का झूठ पकड़ा गया. इस के बाद कोर्ट ने पत्नी दीपा को आदेश दिया कि वह हर महीने 5 हजार रुपए भरणपोषण अपने पति विजय को देगी.

पति भी मांग सकता है गुजारा भत्ता

जब पतिपत्नी के बीच तलाक का मुकदमा चल रहा हो तो सेक्शन 25 के तहत भरणपोषण के लिए पति द्वारा गुजारा भत्ता की मांग कर सकता है. आमतौर पर पत्नी को गुजारा भत्ता मांगने के मामले ज्यादा होते हैं. यह समझना जरूरी है कि पति किन हालातों में गुजारा भत्ता के लिए मांग कर सकता है. तलाक के लिए शादी से बाहर यौन संबंध, शारीरिक-मानसिक क्रूरता, दो सालों या उस से ज्यादा वक्त से अलग रहना, गंभीर यौन रोग, मानसिक अस्वस्थतता, धर्म परिवर्तन कुछ प्रमुख वजहें होती हैं. असल में यह नियम नहीं होने चाहिए.

इस के अलावा पति अगर बलात्कार या अप्राकृतिक यौन संबंध बनाता हो, पहली पत्नी से तलाक लिए बगैर दूसरी शादी की हो या फिर युवती की शादी 18 वर्ष के पहले कर दी गई हो तो भी शादी अमान्य की जा सकती है. पतिपत्नी में से जो भी तलाक ले रहा हो उस से वजह पूछनी जरूरी न हो. इस से बदनामी होती है. बाद का जीवन मुश्किल हो जाता है.

पति के मामले में यदि पति बेरोजगार है, जबकि उस की पत्नी के पास कमाई का साधन है तो वह भत्ते की मांग कर सकता है. इसी प्रकार, यदि पति शारीरिक या मानसिक रूप से कमाने में असमर्थ है, और उस की पत्नी कार्यरत है, तो वह वित्तीय सहायता का अनुरोध कर सकता है. इस के अलावा, यदि पति के पास अपनी पत्नी के साथ अदालती मामले के दौरान कानूनी फीस को कवर करने के लिए धन की कमी है या यदि वह बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा है तो वह वित्तीय सहायता मांग सकता है.

देश में तलाक के 2 तरीके हैं, एक तो आपसी सहमति से तलाक और दूसरा एक तरफा अर्जी लगाना. पहले तरीके में दोनों की राजीखुशी से संबंध खत्म होते हैं. इस में वादविवाद, एकदूसरे पर आरोपप्रत्यारोप जैसी बातें नहीं होती हैं. इस वजह से इस के जरिए तलाक मिलना अपेक्षाकृत आसान होता है. आपसी सहमति से तलाक में कुछ खास चीजों का ध्यान रखना होता है. आपसी सहमति से तलाक लेने के लिए पतिपत्नी दोनो को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 ख के तहत कोर्ट में एक एप्लीकेशन देनी होती है.

आपसी सहमति से तलाक की अपील तभी संभव है जब पतिपत्नी सालभर से अलगअलग रह रहे हों. पहले दोनों ही पक्षों को कोर्ट में याचिका दायर करनी होती है. दूसरे चरण में दोनों पक्षों के अलगअलग बयान लिए जाते हैं और दस्तखत की औपचारिकता होती है. तीसरे चरण में कोर्ट दोनों को 6 महीने का वक्त देता है ताकि वे अपने फैसले को ले कर दोबारा सोच सकें. कई बार इसी दौरान मेल हो जाता है और घर दोबारा बस जाते हैं. 6 महीने के बाद दोनों पक्षों को फिर से कोर्ट में बुलाया जाता है. अगर किसी तरह से शादी नहीं चलने वाली होती है तो कोर्ट अपना फैसला सुनाती है और रिश्ते के खत्म होने पर कानूनी मुहर लग जाती है.

महंगा है तलाक लेना

आपसी रजामंदी से तलाक में वकील की फीस 10 हजार से ले कर 1 लाख तक हो सकती है. विवादित मामलों में यह 50 हजार से 5 लाख तक हो सकती है. अब ज्यादातर मामलों में वकील एक बार में ही फीस लेते हैं. कोर्ट में एप्लीकेशन लगाते समय ही 75 हजार से 1 लाख तक पहले ले लेते हैं. आपसी सहमति वाला मुकदमा भी 1 साल तक चल जाता है. जिन में विवाद होते हैं वह अभी भी सालोंसाल चलते हैं. जल्दी निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ता है जहां के वकील की फीस 5 लाख से शुरू होती है. लोवर कोर्ट में फैसला लटका रहता है.

अमीरों के मामलों में पैसा खर्च करने में कोई दिक्कत नहीं होती इसलिए मामले जल्दी निपट जाते है. वह हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के वकीलों की फीस देने में पीछे नही रहते. बड़ेबड़े वकील उन के लिए खड़े हो जाते हैं. गरीब के लिए हाई कोर्ट तक पंहुचना ही मुश्किल होता है. उसे गुजारा भत्ता देना ही पड़ता है. ऐसे में वह लंबे खर्च में पड़ जाता है. इन के मुकदमें भी लंबे चलते हैं.

तलाक को ले कर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि अब तलाक के लिए 6 महीने इंतजार करने की जरूरत नहीं रहेगी बल्कि इस से पहले भी विवाहित दंपति अलगअलग हो सकते हैं. अगर कोर्ट को लगता है कि रिश्ते इतने खराब हो चुके हैं कि रिश्ता नहीं सुधरने वाला, तलाक हो कर ही रहेगा तो इस 6 महीने के इंतजार को खत्म किया जा सकता है.

अगर कोर्ट को लगता है कि 6 महीने के लिए सुलह का समय देना चाहिए तो वह ऐसा कर सकता है. इस फैसले से उम्मीद की एक किरण दिखी है. असली सुधार तक होगा जब बिना किसी अधिक समय के कम से कम समय में तलाक मिलने लगे.

सरल हो तलाक लेना

पति पत्नी में से एक अगर आर्थिक तौर पर दूसरे पर निर्भर है तो तलाक के बाद जीवनयापन के लिए सक्षम साथी को दूसरे को गुजारा भत्ता देना होता है. इस भत्ते की कोई सीमा नहीं होती है, ये दोनों पक्षों की आपसी समझ और जरूरतों पर निर्भर करता है. कोई समस्या होने पर कोर्ट को इस में दखल देना पड़ता है. यदि पतिपत्नी के बच्चे होते हैं तो बच्चों की कस्टडी किसे मिले ? यह भी विवाद का विषय होता है. इसी तरह से अगर शादी से बच्चे हैं तो बच्चों की कस्टडी भी एक अहम मसला है. चाइल्ड कस्टडी शेयर्ड यानी मिलजुल कर या अलगअलग हो सकती है. कोई एक पेरैंट भी बच्चों को संभालने का जिम्मा ले सकता है लेकिन अगले पक्ष को उसकी आर्थिक मदद करनी होती है.

असल में गुजारा भत्ता और बच्चों की कस्टडी दो ऐसे बड़े मामले हैं जिन के जरिए तलाक के मामले लंबे समय तक चलते रहते हैं. ऐसे में जरूरी है कि तलाक जल्दी मिले. जिस से दोनों ही अपने तरह से अपना जीवन गुजार सके. तलाक की प्रताड़ना से शादी सजा लगने लगती है. पतिपत्नी दोनों में से जो भी तलाक मांगे उसे मिल जाना चाहिए.
शादी के बाद अगर बच्चा हो गया है तो उस की देखरेख के लिए अच्छी रकम मिलनी चाहिए. क्योंकि बच्चे के पैदा होने में उस की कोई सहमति नहीं होती है. इस के उलट जब लड़कालड़की शादी करते हैं तो उन की आपसी सहमति होती है. ऐसे में तलाक के जिम्मेदार दोनों होते हैं. शादी करने का मतलब यह नहीं होता कि जिदंगीभर पत्नी की जिम्मेदारी निभाई जाए.

सरल हो आगे का जीवन

आज समाज में पतिपत्नी दोनों कमाने वाले होते हैं. लड़कियों को भी नौकरी करनी चाहिए. जिस से वह अपनी आजीविका चला सके. कोई किसी पर निर्भर न रहे. जब तक साथ है तब तक भी आपसी खर्च मिल बांट कर करें. जिस से अलग होने पर किसी तरह की बेचारगी का भाव न रहे. यदि कोई पत्नी अपनी कमाई से अपना भरण पोषण करने में सक्षम है तो वह भरणपोषण का अनुरोध नहीं कर सकती. इस के अतिरिक्त यदि वह स्वेच्छा से बिना किसी वैध कारण के अपने पति से अलग रहती है, यदि वे आपसी सहमति से अलग रह रहे हैं, या यदि वह शादी के बाद किसी अन्य रिश्ते में शामिल है तो वह भरणपोषण के लिए गुजारा भत्ता की मांग नहीं कर सकती है.

तलाक का मुकदमा अगर आपसी सहमति और बिना किसी लंबी बहस के मिल जाए तो बहुत सारे पतिपत्नी विवाद खत्म हो जाएं. एकदूसरे के खिलाफ कई तरह के मुकदमें लिखाते हैं. संबंध खराब होते हैं. पत्नी मारपीट, घरेलू हिंसा, बलात्कार जैसी धाराओं में मुकदमा पति पर प्रभाव डालने के लिए लिखाती है तो जवाब में पति जेवर चोरी, अवैध संबंध जैसे आरोपों में मुकदमा लिखाता है. यह एकदूसरे पर दबाव के लिए डालने के लिए लिखाए जाते हैं.

अगर आसानी से तलाक मिल जाए तो तलाक के बाद भी आपसी संबंध खराब नहीं होंगे. दिक्कत यह है कि फैमिली कोर्ट हो, हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट, सभी सोचते हैं कि हिंदू विवाह संस्कार है जिस में औरत को कोई हक नहीं है और वह पति को परमेश्वर मान कर सेवा करे. वे कोशिश करते हैं कि विवाह को तोड़े नहीं चाहे दोनों पक्ष रोते रहें. यह संस्कार और संस्कृति पुरुष पर भी भारी है, औरतों का तो कहना ही क्या.

सवाल: सुरैया की खुशी बनी अनवर के लिए परेशानी का सबब

सुरैया को यह जान कर कि वह मां बनने वाली है, ऐसा लगा मानो उस के वजूद को एक मजबूती मिल गई है. लेकिन यह जान कर कि उस की यह खुशी अनवर के लिए परेशानी का सबब है, वह सकते में आ गई.

फाइनैंशियल इन्फ्लुएंसर कराएं इन्वैस्टमैंट, तो समझो बज गया बैंड

जैसे गधे के सिर से सींग गायब होते हैं वैसे ही सोशल मीडिया से रवि सुन्तजानी कुमार गायब हैं. 25 साल की उम्र छू रहे इस स्मार्ट युवा को कोई और जाने न जाने पर वे लोग अच्छी तरह जानने लगे थे जो इस के वित्तीय शिष्य बन गए थे. यानी, पैसा डबल, ट्रिपल और ज्यादा मल्टीप्लाई करने के लालच व चक्कर में वे लोग रवि को किसी सिद्धपुरुष से कम नहीं मानते थे.

रवि सुन्तजानी इस नए दौर के फाइनैंशियल इन्फ्लुएंसर में से एक था जो निवेशकों को टिप्स देता था कि वे कब, कैसे, कहां और कितना पैसा अपनी गाढ़ी कमाई का निवेश करें कि उस का रिटर्न रेन यानी बरसात होने लगे. अगर उस की कलई न खुलती तो मुमकिन है उसे रवि सुन्झुन वाला कहा जाने लगता.
रवि एक घंटे के ज्ञान के 50 हजार रुपए तक चार्ज करने लगा था. उस की शोहरत के आलम के बारे में तो कहा जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई दिग्गज भाजपा नेता उसे सोशल मीडिया पर फौलो करते थे. कुछ बात तो थी इस स्मार्ट लड़के में जो एक दफा उस का बनाया वीडियो केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने भी पोस्ट किया था.
इस वीडियो में रवि बता रहा है कि आप यूपीआई के जरिए एटीएम से पैसे कैसे निकाल सकते हैं. सितंबर 2023 के पहले सप्ताह में मुंबई में फाइनैंशियल टैक्नोलौजी इवैंट हुआ था जिस में रवि ने इस वीडियो का डेमो देते हर किसी को हैरान कर दिया था जिसे पीयूष गोयल ने भी रीपोस्ट किया था. देखते ही देखते यह वीडियो जम कर वायरल हो गया था.

मुझ को यारो माफ करना

सोशल मीडिया अकाउंट्स पर रवि की प्रोफाइल बेहद आकर्षक और इंप्रैसिव थी. उस ने इलाहाबाद से बीटैक की डिग्री ली थी. मैनेजमैंट की डिग्री उस ने एमडीआई गुड़गांव से ली थी. इस के बाद उस ने ओयो और जोमैटो कंपनियों में काम किया था. उस की प्रोफाइल में बड़े फख्र से यह जिक्र भी था कि वह उत्तरप्रदेश के एक छोटे से गांव से है और अपने सपने पूरे करने के लिए गांव से निकल लिया था. वह एकदो नहीं, बल्कि 30 क्रैडिट कार्ड इस्तेमाल करता था. बकौल रवि, उस का आईआईटियन बनने का सपना अधूरा रह गया लेकिन अब वह आईआईटी और आईआईएम के स्टूडैंट्स को पढ़ाता है.

पर जल्द ही रवि की हकीकत उजागर हो गई कि उस ने कोई डिग्री नहीं ली है. वह बस यों ही तंबू गाड़ कर दीक्षाएं देने वाले बाबाओं की तरह वित्तीय दीक्षाएं दे रहा था. यानी, लोगों को इन्फ्लुएंसर बन कर पैसा बढ़ाने की सलाह दे रहा था और खुद इस के एवज में तगड़ी कमाई कर रहा था.

जैसे भी खुली जब पोल खुली तो वह सोशल मीडिया के आभासी संसार से गायब हो गया. जातेजाते सारे अकाउंट डिलीट करते उस ने अपने चेलों से वादा यह पोस्ट करते किया कि ‘सौरी फ्रैंड्स, अभी एक ब्रेक लूंगा.’ उस की इस अदा से लगा ऐसा कि कोई बाबाजी अधूरी सिद्धि पूरी करने या नई सिद्धि हासिल करने या पुरानी को रिन्यू कराने के मकसद से हिमालय पर तपस्या करने जा रहे हों और जल्द लौटेंगे. तब तक भक्तगण दूसरा बाबा या गुरु कर इन्वैस्टमैंट करने का सिलसिला जारी रखें.

रवि के यों भागने के बाद अर्थजगत में बहस भी हुई. उसे चाहने वालों की दलील यह थी कि मुमकिन है उस की डिग्रियां फर्जी हों या वजूद में ही न हों लेकिन वह इन्वैस्टमैंट का अच्छा जानकार तो था. जबकि उस की मुखालफत करने वालों के तर्क जमीनी थे कि डिग्री पर किसी के भी झूठ बोलने पर उस की विश्वसनीयता पर तो सवाल खड़े होंगे. रवि के समर्थक दरअसल कहना यह चाह रहे थे कि नीम हकीम है तो क्या हुआ, अगर कोई झोलाछाप डाक्टर इलाज अच्छा करता है तो उसे प्रैक्टिस करने की छूट मिलना हर्ज की बात नहीं.

यह बहुत बड़े खतरे वाला तर्क और मानसिकता है, जिस की नाव पर कई ऐसे इन्फ्लुएंसर सवार हैं जो तकनीकी योग्यता और डिग्रियों को कागज का टुकड़ा करार देते हैं. ये लोग श्रुति और स्मृति वाले ज्ञान के हिमायती हैं जिस के चलते देश पिछड़ रहा है. लोग अतार्तिक और भाग्यवादी बन रहे हैं और इस से भी ज्यादा अहम चिंतनीय यह है कि बात अगर इन्वैस्टमैंट की हो तो अर्थशास्त्र को नहीं, बल्कि धर्मशास्त्रों को मानने लगते हैं. जो यह कहते हैं कि अगर भाग्य में लिखा है तो पैसा घर की छत से टपक पड़ेगा या फिर फर्श चीर कर बाहर आ जाएगा.

फिर ऐसे लुटते हैं लोग

रवि के चेहरे से वित्तीय प्रभावक होने का नकाब हटने के बाद शेयर बाजार को रैगुलेट करने वाली एजेंसी सेबी की आंखे खुलीं कि रवि जैसे सैकड़ोंहजारों नीमहकीम यानी फाइनैंशियल इन्फ्लुएंसर निवेशकों को उलटीसुलटी सलाह दे रहे हैं जो कि गैरकानूनी है.

म्यूचुअल फंड और शेयर खरीदनेबेचने की सलाह वही लोग दे सकते हैं जिन्हें सेबी ने मान्यता दे रखी हो और इसे हासिल करने के लिए पहले सेबी का इम्तिहान पास करना पड़ता है जो कि न रवि ने किया था और न ही उस के जैसे दूसरे गुरुघंटालों ने किया हुआ है और अगर वे सोशल मीडिया पर ज्ञान बांट रहे हों तो उन पर कानूनी कार्रवाई करना भी आसान नहीं.

कानून की सीमाएं तो तभी खुलेंगी जब कोई बड़ा घोटाला ठगी या फ्रौड हो जाए और उस की भी रिपोर्ट पीड़ित लिखाए. बात अकेले फंड्स या शेयरों की नहीं है बल्कि इन्फ्लुएंसर तो यूजर्स को जायदाद खरीदी की भी सलाह देता है और क्रिप्टोकरैंसी की भी व बजट बनाने की भी सलाह देता है. सेबी ने ऐसे ज्ञानियों को नया शब्द दे दिया है

‘FIN-FLUENCERS’.

घटना – एक – 21 फरवरी को कोलकाता का 58 वर्षीय एक शख्स ऐसे ही किसी इन्फ्लुएंसर के चक्कर में फंस कर 20 लाख रुपए गंवा बैठा. पीड़ित फेसबुक के जरिए इन ठगों यानी इन्फ्लुएंसर के चक्कर में आया था. जहां उसे फ्री औनलाइन स्टौक ट्रेडिंग कोर्स करने का लालच दिया गया था.

कुछ दिनों बाद उसे एक व्हाट्सऐप ग्रुप से जोड़ लिया गया. जब पीड़ित को ठगों पर भरोसा हो गया तो उसे ZOKSA नाम के ट्रेडिंग प्लेटफौर्म के बारे में जानकारी दी गई कि इस कंपनी में इन्वैस्ट करने से पैसा तुरंत बढ़ेगा. बढ़ा तो एक छदाम भी नहीं, उलटे, इन्वैस्ट किए गए 20 लाख रुपए भी डूब गए.

घटना – दो – कोलकाता वाले सज्जन तो मुंबई के न्यू पनवेल में रहने वाली 40 वर्षीया पीड़िता के मुकाबले सस्ते में ही निबटे कहे जाएंगे. इस महिला से इन्फ्लुएंसर ने हाई रिटर्न दिलाने का वादा किया था. ज्यादा पैसों के लालच में आई पीड़िता ने दिसंबर 2023 से फरवरी 2024 तक अपने नएनवेले वित्तीय गुरुजी की सलाह पर शेयरों की औनलाइन ट्रेडिंग के नाम पर 1 करोड़ 92 लाख रुपए उस के बताए बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिए.

कुछ दिनों बाद पीडिता को ज्ञान प्राप्त हुआ कि चिड़वा खेत चुग गया है और वह एक नहीं बल्कि 9 हैं. साइबर पुलिस में उस ने रिपोर्ट दर्ज कराई. अब पुलिस आईपीसी की धाराओं 420, 406 और 34 के अलावा आईटी एक्ट के प्रावधानों के तहत आरोपियों को ढूंढ रही है. इन्वैस्टमैंट के नाम पर तो महिला का तगड़ा पैसा वेस्ट गया यानी भाग्य नहीं चमका जो अगर अच्छा होगा तो मुमकिन है ये इन्फ्लूएंसर्स पकड़े जाएं और पैसा वापस मिल जाए.

फर्क इन्फ्लुएंसर्स का

पैसे को डबलट्रिपल करने वाले ये ठग हर कहीं मौजूद हैं और लालचियों के लिए औनलाइन भी उपलब्ध हैं.

– 18 फरवरी को मध्यप्रदेश के कटनी शहर की दुबे कालोनी की अनीता मिश्रा को एक गुरु और उस के चेले ने ऐसे चूना लगाया कि यह तय करना मुश्किल हो जाए कि असली गुरु कौन औफलाइन वाले या औनलाइन वाले. इन ठगों ने पहले राह चलती अनीता को 20 रुपए का नोट डबल करने का झांसा दिया.

अनीता इतनी प्रभावित हुई कि इन दोनों को घर ले गई. इन्हें चायनाश्ता कराया और दोगुने करने के लिए 30 हजार रुपए नकद व ढाई तोले के कान के अपने टौप्स भी दे दिए. गुरुजी ने हाथ का यह मैल कागज में बंधवाया और कोई मंत्र फूंक कर उसे वापस करते कहा कि इसे कल खोलना, सब डबल हो जाएगा.

कब कागज से माल ठगों ने उड़ा लिया, इस का पता अनीता को अगले दिन चला जब उस ने बेचैनी और उत्सुकता से उसे खोला तो वह मुंह चिढ़ा रहा था. गरीबी में गीला आटा वाली बात यह कि पुलिस उसे रिपोर्ट लिखाने को टरकाती रही. अनीता ने भोपाल सीएम हाउस से जोर लगवाया तब कहीं जा कर रिपोर्ट दर्ज हुई. इस के बाद पता चला कि कटनी में ये ठग कईयों को चूना लगा चुके हैं.

खुद ही संभलें तो बेहतर

इन तमाम ताजे मामलों में भी फसाद की जड़ लालच है. लोग रातोंरात टाटा, बिरला, अंबानी और अडानी बन जाना चाहते हैं. औनलाइन हों या औफलाइन, ये इन्फ्लुएंसर इसी चमत्कारी और लालची मानसिकता का फायदा उठाते हैं. गांवदेहातों से ले कर महानगरों तक लोगों की मानसिकता एक सी है, ऊपर बताए उदाहरण इस की पुष्टि भी करते हैं.

पैसा डबलट्रिपल और ज्यादा मल्टीप्लाई होता है, यह मानसिकता दरअसल धर्म ने लोगों को दी है जिस में ऐसे किस्सेकहानियों की भरमार है जिन में कोई रातोंरात अमीर हो गया. राजा नल और दयमन्ती रानी की कहानी के साथसाथ सत्य नारायण की कथा से होते सैकड़ों किस्से चलन में हैं जिन्हें सुन लगता है कि ऐसा चमत्कार होता होगा.
गड़ा धन, खजाना और जुआ-सट्टा ये सब इसी मानसिकता के देन हैं कि बिना मेहनत किए भाग्य के भरोसे भी पैसा कमाया जा सकता है. इस लिहाज से मुंबई, कोलकाता और कटनी के इन्फ्लुएंसरों ने नया कुछ नहीं किया था, बस, नए दौर के प्लेटफौर्म का इस्तेमाल किया था. ये ठग आदिकाल से हैं और आम लोगों के लालच के चलते वे अनंत काल तक रहेंगे भी. इस की गारंटी कोई भी दे सकता है.

ये पहले प्रिंट मीडिया के सुनहरे दौर में अखबारों और पत्रिकाओं में विज्ञापन दे कर पैसा बनाते थे कि यह वर्गपहेली भर कर भेजो, जो अगर सही हुई तो 500 रुपए की कीमत वाला रेडियो 50 रुपए में मिलेगा. अंकों वाली यह वर्गपहेली इतनी आसान होती थी कि 6ठी क्लास के बच्चे भी इसे हल कर लेते थे.

घर के बड़े इसी बताए गए पते, जो आमतौर पर बौक्स नंबर वाला होता था, पर भेज देते थे. लौटती डाक से उन्हें यह खुशखबरी मिलती थी कि बधाई हो, आप का नाम लकी विजेताओं में आ गया है. अब आप 50 रुपए भेज कर 500 रुपए वाला रेडियो ले सकते हैं. लालची लोग ख़ुशीख़ुशी 50 रुपए का मनीऔर्डर कर देते थे लेकिन वह रेडियो उन्हें नहीं मिलता था और जिन्हें मिला, वे आपबीती सुनाते कहते हैं कि एक बार पार्सल आया था लेकिन उस में कंकड़पत्थर और घासफूस भरा था.

ऐसे बहुत से तरीके 70-80 के दशक के इन्फ्लुएंसरों ने ईजाद किए, मसलन फिल्मी हीरो का आधा चेहरा पहचानो और ईनाम जीतो. अब दौर डिजिटल है तो ये लोग सोशल मीडिया पर नएनए हथकंडों के साथ हाजिर हैं. तब शेयर्स और फंड नहीं थे और लोगों के पास ज्यादा पैसा भी नहीं था, इसलिए ये लोग छोटामोटा हाथ मार पाते थे. अब लाखोंकरोड़ों का चूना मक्खन बता कर लगा जाते हैं.

ज्योतिषियों और तांत्रिकों ने भी पैसा बनाया. वे अब भी हैं. लेकिन हैं तो वे लोग भी इन्फ्लुएंसर ही जो रोज रात को टीवी के परदे पर और मोबाइल पर भी श्री यंत्र, लक्ष्मी यंत्र और कुबेर यंत्र सहित धनवर्षा यंत्र बेच रहे हैं और लोग इन यंत्रों में पैसा लगाते अमीर बनने का मुगालता पाले बैठे हैं. यह प्रोत्साहन और लालच विरासत में मिला है जो अब बहुत बड़े धंधे की शक्ल ले चुका है तो इस से बचा स्वयं के विवेक से ही जा सकता है, कानून की तो अपनी सीमाएं हैं.

सोशल मीडिया पर ही बताया जाता है कि इन्फ्लुएंसर्स से ऐसे बचें, वैसे बचें. यानी, उन की प्रोफाइल और हिस्ट्री जांच लें, सेबी में उन का रजिस्ट्रेशन हो तभी उन की सलाह पर गौर करें वगैरहवगैरह लेकिन इन में सब से अहम यह है कि यह याद रखें कि पैसा कहीं भी निवेश करें वह वंदेमातरम ट्रेन की रफ्तार की तरह नहीं बढ़ सकता. वह बढ़ेगा तो पैसेंजर ट्रेन की गति से ही, इसलिए अपने अंदर के लालच को काबू में रखें.

बिना ऐक्सरसाइज के मैं पीठ दर्द से कैसे छुटकारा पाऊं?

सवाल

2 साल से मुझे पीठदर्द की समस्या है. उम्र मेरी 24 साल है. यह दर्द गरदन से होते हुए पीठ के निचले हिस्से तक पहुंच जाता है. ज्यादा देर बैठने, खड़े रहने, चलने आदि से पीठ में बहुत दर्द होता है. गरमी में इस दर्द को मैं सहन कर लेता हूं लेकिन ठंड के मौसम में असहनीय हो जाता है. लेटने पर आराम मिलता है. लेकिन हर वक्त लेट नहीं सकता. कृपया मुझे बताएं क्या करूं?

जवाब

ठंड में हड्डियों और जोड़ों का दर्द बढ़ जाता है. हालांकि कम उम्र के लोगों को यह समस्या कम परेशान करती है लेकिन लाइफस्टाइल की गलत आदतों के कारण युवा भी इस समस्या के शिकार बनते हैं. आप को अपने लाइफस्टाइल में बदलाव लाने की जरूरत है. अच्छा खानपान, अच्छी नींद, उठनेबैठने का सही पोस्चर, सही पोस्चर में काम करना, ऐक्सरसाइज आदि करने से इस समस्या से बचा जा सकता है.

हालांकि, आप की समस्या गंभीर है, इसलिए आप के लिए डाक्टर से संपर्क करना आवश्यक है. पहले यह जानने की कोशिश करें कि कहीं आप सर्वाइकल का शिकार तो नहीं हैं. इस के लिए आप को प्रौपर ऐक्सरसाइज और फिजियोथेरैपी की सलाह दी जाएगी. इस के अलावा हर दिन धूप में कम से कम आधा घंटा बैठें. गरम कपड़े पहनें रहें और पीठ की सिंकाई करें. मल्टी विटामिन टैबलेट्स के सेवन से भी दर्द में राहत मिल सकती है.

शुक्रिया श्वेता दी: भाग 3

Writer- डा. कविता कुमारी

सासससुर ड्राइंगरूम में थे. सास सीरियल देख रही थी. उस ने जल्दी से  वह कागज निकाला और बिना सांस लिए पढ़ने लगी.

‘प्रिय अंकिता,

‘अब तक तुम्हें सम?ा में आ गया होगा कि हमारे ऊपर पहरा है. इसलिए सब से छिपा कर किसी तरह लिख रही हूं. जितना लिखूं, उस से ज्यादा सम?ाना. तुम ने गलत लड़के से शादी कर ली. यहां हर आदमी दो चेहरे रखता है जो बहुत बाद में सम?ा में आता है. मेरी शादी धोखे से हुई.

इन लोगों का सारा खर्च और ठाटबाट मेरे पापा के पैसों से चलता है. ये लोग हमेशा मारपीट कर के मु?ा से पैसे मंगवाते हैं. मैं कब तक पापा से पैसे मांगूंगी और वे कब तक दे पाएंगे. तुम्हें फंसाने के लिए दीपेन ने शराफत का ढोंग रचा. अब धीरेधीरे उस का रंगरूप देखना. तुम्हारे साथ भी यही सब होगा. जल्दी ही वह यहां आ जाएगा. यह घर भी इन लोगों का अपना नहीं है, किराए का है. मैं इस नर्क में फंस गई हूं लेकिन अभी तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ा है, तुम यहां से निकल जाओ. अपने हिस्से का नर्क मु?ो भोगना ही है, तुम अपने हिस्से का स्वर्ग बचा लो.

‘-श्वेता दी.’

अंकिता के पांवतले की जमीन खिसकने लगी. दीपेन अपनी शराफत का नकाब धीरेधीरे उतार रहा था, इस का  एहसास उसे होने लगा था. प्यार का भूत उस के सिर से जाने कब उतर गया था. पता नहीं कब उस का बचपन चला गया और वह मैच्योर हो गई. अब उसे एहसास होने लगा, क्यों श्वेता दी से बात करने से उसे हमेशा रोका जाता है, क्यों उस पर साए की तरह नजर रखी जाती है? जितना सोचती उतना दर्द होता. पापा, भैया सब ने कितना सम?ाया था उसे लेकिन…

मौका मिलते ही उस ने मम्मी को फोन किया, ‘मम्मी, कोई सवाल मत करना अभी. बस, किसी बहाने मु?ो यहां से बुला लो. वहां आ कर ही बातें होंगी.’

मांपापा सम?ा गए, बेटी बड़ी मुसीबत में है. उसी दिन पापा ने समधी को फोन किया, ‘अंकिता की मम्मी की तबीयत अचानक खराब हो गईर् है. वह हौस्पिटल में है, उसे ले कर आइए, प्लीज.’

सासससुर सोच भी नहीं पाए कि उन की करतूतों की भनक किसी को लग सकती है. नई बहू को अकेले कैसे भेजते. सास ने कहा, ‘अंकिता को वहां पहुंचा दीजिए. विपिन आएगा तो उसे ले आएगा.’

दूसरे दिन अंकिता ने कुछ कपड़े बैग में डाले, जेवर सास के पास थे. उन्होंने यह कह कर रखा था कि अभी तुम नहीं संभाल पाओगी, बाद में लौकर में डाल देना. ऐसे मौके पर वह मांग भी नहीं सकती थी.  वैसे उस का मकसद किसी तरह वहां से निकलना था. जाते समय वह श्वेता दी के गले लग कर खूब रोई. रास्तेभर उन की सूनीसूनी डबडबाई आंखें उस का पीछा करती रहीं. उसे लगा वे उस की जेठानी नहीं, उस की बड़ी बहन हैं, कोई मददगार हैं उस के लिए.

मां अपने कमरे में बीमार की मुद्रा में लेटी थी. भले ही उन्होंने बीमारी का नाटक किया था लेकिन बेटी की चिंता ने एक दिन में ही उन्हें सचमुच बीमार बना दिया था. वह गहरी मानसिक वेदना से गुजर रही थीं. अभीअभी बेटी की शादी से इतनी खुश थीं. 2 महीने भी नहीं गुजरे थे, अभी शादी की खुमारी भी नहीं उतरी थी और…

अंकिता के ससुर उसे पहुंचा कर लौट गए, कह गए कि दीपेन आने वाला है, वह तुम्हें आ कर ले जाएगा. मां ने कहा, ‘समधीजी, अभी इसे यहीं रहने दीजिए, मेरा सहारा हो जाएगा.’

अब? सारी बातें सुनसम?ा कर मांपापा की चिंता बढ़ गई. दूसरे दिन छुट्टी ले कर भैयाभाभी आ गए. दीदीजीजाजी ने फोन पर मैंटली सपोर्ट किया. सब ने तय किया कि अंकिता वहां नहीं जाएगी. भैया ने इलाहाबाद जा कर 2-3 दिनों तक खाक छानी. पता लगा कि श्वेता दी ने जो कुछ कहा, सब सही था. जीजाजी ने बेंगलुरु के अपने कुछ दोस्तों से दीपेन के बारे में पता लगाने को कहा. चौंकाने वाली असलियत सामने आई. दीपेन वहां किसी और के साथ रिलेशनशिप में था. उस ने औफिस में यह कहा कि अंकिता से उस की शादी नहीं हुई. उस के पिता और भाई तैयार नहीं हुए. वह शराबसिगरेट का भी शौकीन निकला.

आह, अंकिता का दिल तारतार हो गया. उस के दोहरे चरित्र का कैसे उसे पता नहीं चला. क्या उस ने सब सोचीसम?ा साजिश के तहत किया था? उस ने ठंडे दिमाग से सोचा, यदि शादी के पहले उस के घर के लोग उस के बारे में पता लगाते, तब भी वह शायद ही उन पर यकीन कर पाती. वह सोचती, दीपेन दूसरी जाति का है, इसलिए ऐसा कह रहे हैं. सच है प्यार में विवेक नहीं खोना चाहिए. घर के सभी लोगों ने उस के जख्मों को भरने की पूरी कोशिश की. अभी किसी ने ताना नहीं दिया, किसी ने कुछ नहीं कहा. उसे परिवार के संबल ने टूटने नहीं दिया. उसे बारबार श्वेता दी याद आती. उन से कोई रिश्ता ठीक से जुड़ा भी नहीं था. जेठानी हो कर, खुद लाख गम खा कर, उन्होंने उस के लिए जो कुछ किया, कौन करता है भला.

आजकल दीपेन के फोन कुछ ज्यादा आते. अब वह उस से कम बात करती. उस के सामने यह जाहिर न करती कि उसे सब पता चल गया है. वह कुछ ऐसा नहीं करना चाहती थी जिस से श्वेता दी पर कोई आंच आए. काश, वह श्वेता दी के लिए कुछ कर पाती.

मम्मी के इलाज के बहाने वे लोग अचानक बेंगलुरु पहुंच गए. एकाएक सब को वहां देख दीपेन सकपका गया. उस की गर्लफ्रैंड भी वहां मौजूद थी. बहुत बड़ा तमाशा क्रिएट हुआ. दीपेन ने सफाई देने की खूब कोशिश की. बारबार माफी मांगने लगा. उस के मम्मीपापा से भी फोन पर बात हुई. वे लोग बेटे की गलती पर परदा डालने लगे.

एक बार माफ कर देने की गुजारिश भी की लेकिन सारी असलियत जान कर आंख मूंदने का वक्त नहीं था. फैसला पहले ही हो चुका था. खुद अंकिता भी उस नर्क में दोबारा नहीं जाना चाहती थी. आते समय उस ने बड़ी दृढ़ता से कहा, ‘हम अंतिम बार कोर्ट में मिलेंगे तलाक

के पेपर पर हस्ताक्षर करने

के लिए.’

गाड़ी के हौर्न की आवाज से उस की तंद्रा टूटी. मम्मीपापा आ गए थे शायद. बारिश रुक गईर् थी. वह बुदबुदाई, ‘शुक्रिया श्वेता दी…’ और दरवाजा खोलने के लिए उठ गई.

शुक्रिया श्वेता दी: भाग 1

Writer- डा. कविता कुमारी

बालकनी में अकेली बैठी अंकिता की टेबल पर रखी कौफी ठंडी हो रही थी. हलकी बूंदाबांदी अब मूसलाधार बारिश में बदल गई थी. वह पानी की मोटीमोटी धारों को एकटक निहार रही थी लेकिन उस का दिमाग कहीं और था. मम्मीपापा वकील से बात करने गए थे, घर में वह अकेली थी. उस की नजरों के सामने बारबार श्वेता दी का चेहरा आ रहा था.

श्वेता दी… उस की जेठानी. कहने को उन दोनों का रिश्ता देवरानीजेठानी का था लेकिन श्वेता ही सही माने में उस की बड़ी बहन साबित हुई. अगर वह न होती तो न जाने क्या होता उस के साथ. उन्होंने उसे उस नर्क से निकाला जहां वह स्वर्ग की तलाश में गई थी.

हां, स्वर्ग से भी सुंदर अपना घर बसाने की चाहत में उस ने दीपेन का साथ चुना था. दोनों एक ही औफिस में काम करते थे. दोनों में दोस्ती हुई जो धीरेधीरे प्यार में बदल गई. यह कब, कैसे हुआ, अंकिता को पता ही न चला. हर प्रेमी जोड़े की तरह वे साथ जीनेमरने की कसमें खाते, हाथों में हाथ डाले मौल में घूमते, लंचडिनर साथ में करते. दीपेन उस के आगेपीछे डोलता रहता. उस की खूब केयर करता. अंकिता उस के इसी केयरिंग नेचर पर फिदा थी.

उसे याद है, औफिस का वाटर प्यूरीफायर खराब हो गया था. गरमी इतनी थी कि एयरकंडीशंड औफिस में भी गला सूख रहा था. उस ने कहा, ‘दीपेन, मैं प्यास से मर जाऊंगी. मु?ो प्यास कुछ ज्यादा ही लगती है और नौर्मल पानी सूट नहीं करता.’

‘यह बंदा किस दिन काम आएगा, अभी पानी की बोतल ले कर आता

हूं, यार.

‘3-4 किलोमीटर जाना होगा यार. शहर से इतनी दूर, ऐसी साइट पर हमें जौइन ही नहीं करना चाहिए था.’

‘मैडम, एक दिन पानी क्या नहीं मिला, आप ने नौकरी छोड़ने का प्लान बना लिया. बंदे को सेवा का मौका तो दीजिए…’ अदा से ?ाक कर उस ने ऐसे कहा जैसे प्रपोज कर रहा हो और तीर की तरह निकल गया. अंकिता खिड़की के पास आ कर, उस का मोटरसाइकिल स्टार्ट कर के जाना देखती रही. जब आंखों से ओ?ाल हो गया, उस ने मुसकरा कर हौले से सिर हिलाया ‘पागल’ और टेबल पर आ कर काम निबटाने लगी.

मम्मीपापा शादी की बात चलाने लगे थे. एक दिन अंकिता ने मां को फोन पर दीपेन के बारे में बताया. मां अचकचा गई, ‘यह क्या कह रही हो? अपने पापा को नहीं जानती? एक तो लड़का तुम्हारी पसंद का, उस पर जाति भी अलग. तुम जितना आसान सम?ा रही हो, उतना आसान नहीं है.’

‘मम्मी जातिवाति से कुछ नहीं होता. दिल मिलना चाहिए, बस. और मैं पहली लड़की नहीं जो दूसरी जाति के लड़के संग ब्याह रचाऊंगी. कितनी शादियां हो रही हैं समाज में. वह कितना अच्छा और केयरिंग है, तुम लोग एक बार मिल लो, फिर पता चल जाएगा.’

पापा नहीं माने. वह जिद पर अड़ गई. मां दोनों के बीच थी. बड़ी बहन और भाई की शादी हो चुकी थी. उन लोगों ने भी पापा को सम?ाया. मां निश्ंिचत थीं कि उस में कोई उस से छोटा नहीं था कि उस की शादी के बाद किसी तरह की परेशानी होगी. कुछ वक्त लगा. पापा थोड़ेथोड़े नरम पड़े. दीपेन से मिलने को तैयार हुए.

5-6 दिनों तक वे लोग बेंगलुरु के होटल में रुके. अंकिता गर्ल्स होस्टल में रहती थी. उस ने औफिस से छुट्टी ले ली. दीपेन मांपापा को भा गया. लंबा, इकहरा, गोरागोरा दीपेन खूब बातें करता और दिल खोल कर हंसता. सचमुच इतना केयरिंग न उन का बेटा था, न दामाद ही. मम्मी के हाथ में एक छोटा पैकेट भी देखता तो ?ाट ले लेता- ‘अरे आंटी, बेटे के होते आप सामान क्यों ढो रही हैं?’

रास्ते में सब का खयाल रखता. छोटीछोटी बातों का भी उसे ध्यान रहता. किसी चीज की जरूरत तो नहीं, प्यास लगी है क्या, थकावट हो रही होगी, आराम कर लें…

उस के बाद 2-3 बार वे लोग दीपेन से और मिले. वह हर बार हंसतामुसकराता एनर्जी से भरपूर मिला. आखिर पापा ने शादी के लिए हां कर दी. जब उस के मम्मीपापा से मिलने की बारी आई, उस ने कहा कि आप लोग इतनी दूर कहां जाइएगा, मम्मीपापा पटना जाने वाले हैं, वहीं उन से मिल लीजिएगा. उस का अपना घर इलाहाबाद था. उन लोगों को आइडिया ठीक लगा.

बूआ के बेटे की शादी थी. सब लोग

पटना आए. दीपेन के मम्मीपापा,

भाईभाभी और उन के दोनों बच्चे. सभी खुशमिजाज और मिलनसार थे. हां, सुंदरसलोनी भाभी बात कम कर रही थीं. शांत स्वभाव की थीं शायद. अंकिता का रिश्ता वहीं पक्का हो गया. पंडितजी ने दिन, मुहूर्त भी निकलवा दिया. दानदहेज की बात नहीं हुई. दीपेन के पापा ने मजाक में कहा, ‘समधीजी, अंकिता आप  की सब से छोटी और लाड़ली बेटी है. इस के लिए आप ने बहुतकुछ जोड़ कर रखा ही होगा. अब और आप को करना भी क्या है?’

‘भला यह भी कहने की बात है? शादी में समधीजी दिल खोल कर

खर्च करेंगे. यह शादी शानदार होगी,

क्यों समधीजी?’ दीपेन की मां ने हंस

कर कहा.

शादी के दस दिन पहले दीपेन के पापा का फोन आया, ‘समधीजी, दीपेन बड़बोला लगता है लेकिन अंदर से संकोची है. उस की चाहत थी एक गाड़ी अंकिता के लिए आप उसे देते. खुद की गाड़ी खरीदने में तो काफी वक्त लग जाएगा. वैसे, वह आप से कहने को मना कर रहा था लेकिन मैं ने कहा कि इच्छा को इतना क्या दबाना. आप गाड़ी के लिए रुपए ही भेज दीजिए, दीपेन को यहां एक गाड़ी पसंद आ गई है, साढ़े दस लाख की है. लेकिन शोरूम हमारे जानपहचान वालों का है, वे डिस्काउंट दे रहे हैं. दस लाख तक में मिल जाएगी.’

पापा से कुछ कहते नहीं बना. भैया ने सुना तो ताव खा गया, ‘अरे, यह तो सरासर दहेज है. इतनी जल्दी हम कहां से लाएंगे. वे लोग लालची लग रहे हैं.’

अंकिता को बुरा लगा. एक गाड़ी मांग रहा है, वह भी मेरे लिए. भैया वह भी देना नहीं चाहता. शादी के बाद वह बदल गया है. बहन की खुशी कोई माने नहीं रखती. शादी के दिन बहुत कम बचे थे. सारी तैयारी हो चुकी थी. पैसे भी काफी खर्च हो चुके थे. मानमर्यादा की बात थी. सिर्फ इस बात के लिए शादी तोड़ना मूर्खता थी. फिर अंकिता कहां मानने वाली थी. किसी तरह रुपयों का इंतजाम कर के उन लोगों को देना ही पड़ा.

उस के बाद शादी के दिन तक बड़े सलीके से कभी चेन, कभी अंगूठी, कभी सोफा कम बैड और कभी जाने क्याक्या सामानों की डिमांड की गई. अंकिता प्यार में इस तरह अंधी थी, उसे सम?ा में नहीं आ रहा था कि यह डिमांड ही दहेज है. भाई, पापा सम?ाना चाहते तो उसे लगता, ये लोग आज भी दीपेन को दिल से स्वीकार नहीं कर रहे. मां ठीक से सम?ा नहीं पा रही थी कि क्या करे. बेटी का दिल भी नहीं तोड़ना चाहती थी और पति व बेटे के तर्क भी सही लग रहे थे.

…और अंकिता शादी के बाद इलाहाबाद आ गई. बेहद खुश थी वह. घर ज्यादा बड़ा नहीं था. तीन छोटेछोटे कमरे थे. छोटा सा ड्राइंगरूम, किचन और बाथरूम. वह सोचती, यहां रहना कितने दिन है. उसे बेंगलुरू जाना है.

जब आसपास के लोगों का स्तर आपसे कम हो

वीणा ने जब देखा उनके पड़ोस में नए दंपत्ति आये हैं,राकेश और  सुनीता,उनकी एक छोटी बच्ची सुमि,वीणा उनसे मिलने गयी,फौरन ही महसूस हो गया कि राकेश और सुनीता के पास अभी गृहस्थी का सामान भी पूरा नहीं है पर उन दोनों का सरल स्वभाव वीणा को बहुत अच्छा लगा. दोनों के स्तर में कहीं से भी समानता नहीं थी  पर वीणा ने देखते ही देखते अपने स्वभाव की  उदारता से सुनीता की  हेल्प ऐसे की  कि सुनीता को जरा भी एहसान ही नहीं लगा कभी,वह जब भी सुनीता को अपने यहाँ कुछ खाने पीने बुलाती,पता नहीं कितनी ही चीजें उसके साथ ऐसे बाँध देती कि जैसे सुनीता ले जाएगी तो वीणा ही खुश होगी,वीणा कहती,देखो,सुनीता,जब दीदी कहती हो तो मेरा घर तुम्हारा ही हुआ,अब ये बताओ,थोड़ा सामान ले जाओगी तो मेरा सामान हल्का होगा,मैं ढंग से सफाई कर पाऊँगी,बेकार में ले लेकर रखने की गलती कर रखी है तो बस अब तुम ले जाओ और मेरी अलमारी में जगह बनाओ ,”वीणा ऐसे हस हस कर कहती कि किसी को भी बुरा न लगता.

वीणा ने जब देखा सुनीता के पास खाना खाने की प्लेट्स भी बहुत कम हैं तो अगली बार जब सुनीता से मिलने गयी तो अपनी नयी क्रॉकरी पैक करके ले गयी.वीणा का यही सोचना था कि अलमारियों में बंद सामान किसी के काम आये तो उससे अच्छी बात क्या हो सकती है.  आज इस बात को पच्चीस साल बीत गए हैं,सुमि पढ़ लिख कर अच्छी पोस्ट पर है,घर की काया पलट तो कब की हो गयी,दोनों आजकल अलग अलग शहरों में भी हैं पर सुनीता और वीणा के सम्बन्ध आज भी बहुत ही मधुर हैं,सुनीता आज तक नहीं भूली कि उनके घर आने वाली सबसे पहली  ढंग की प्लेट्स वीणा की दी हुई थीं ,सुनीता के जीवन का स्तर बढ़ा तो समय के साथ वीणा का और बढ़ा पर जीवन के नीचे के दौर में वीणा ने जैसे साथ दिया था,उससे अजनबी भी अपने हो गए.

सरला ने एक कॉलोनी में एक प्लाट लेकर छोड़ दिया था,जब सालों बाद उस प्लाट पर अपनी कोठी बनाकर रहने आयी तो उसे लगा उसके आसपास के लोगों का स्तर उससे कम है,कोठी के दोनों और मध्यमवर्गीय परिवार थे ,आसपास के बाकी लोग भी उसके जितने धनी नहीं थे,सरला,उसके पति अनिल और उनकी एक ही युवा बेटी कोमल ही उस बड़े से घर में  रहते,अनिल तो बिज़नेस में व्यस्त रहते पर माँ बेटी आसपड़ोस में किसी से भी बात करना गवारा न समझतीं,न किसी से बोलना,न किसी के घर किसी भी मौके पर जाना, न किसी को कभी अपने घर बुलाना. धीरे धीरे आसपास के लोगों ने भी एक दूरी बनानी शुरू कर दी,अब न कोई उन्हें कभी बुलाता न उनसे बात करने की कोई कोशिश करता,दो साल ऐसे ही बीत गए,उनके यहाँ कोई उन्ही की हैसियत का को मेहमान आता तो घर के लोग उनके साथ कभी कहीं आते जाते दिख जाते. एक  दिन कुछ फल खरीदते हुए भारी भरकम शरीर वाली सरला का बैलेंस बिगड़ गया,वे रोड पर ही गिर गयीं,इतने दिन से अपमान झेल रहीं साथ खड़ी महिलाओं ने किसी भी तरह की हेल्प का हाथ नहीं बढ़ाया,सब उनकी तरफ से नजरें बचा कर अपने घर चली गयीं,सब्जी वाला ही उन्हें घर छोड़ कर आया,इसके बाद वे जल्दी ही उस जगह से कहीं और रहने चली गयीं क्योंकि उनका मन इस जगह लगा ही नहीं.

मेघा जब नयी नयी सोसाइटी में आयी तो उसने भांप लिया कि उसकी बिल्डिंग में रहने वाले कुछ लोगों का स्तर उससे कम है तो उसने आसपास की महिलाओं के सामने और भी डींगें मारना शुरू कर दिया,साल में एक बार मेघा अपने पति और बच्चों के साथ विदेश घूमने जाया करती थी,जो महिलाएं कभी विदेश नहीं गयीं थीं उनके सामने डींगें मारने में मेघा को अलग ही ख़ुशी मिलती. पहले तो किसी का ध्यान नहीं गया पर जब सबने नोट किया तो उसकी पीठ पीछे उसका खूब मजाक बनने लगा. हर समय अपने घमंड में चूर मेघा किसी से भी बात करती तो ऐसे जैसे उस पर एहसान कर रही हो,धीरे धीरे उसका सोशल बायकॉट होने लगा,यहाँ तक कि उसके बच्चों के साथ महिलाएं अपने बच्चों को खेलने भी न देतीं,उसके बच्चे ही उस पर गुस्सा होने लगे कि आपकी वजह से हमारे दोस्त नहीं बन पाते,पति के सहयोगियों की पत्नियां  भी एक दूरी रखती.

मेघा के बिलकुल उलट सरिता अपने आसपास के लोगों से खूब घुल मिल कर रहती,जब पता चल जाता कि  सामने वाले इंसान का लाइफ स्टाइल अपने जैसा नहीं है तो भी सरिता उससे बहुत अपनेपन के साथ व्यवहार  करती ,सबको जैसे एक भरोसा सा रहता कि कोई भी जरुरत होगी,सरिता साथ देगी,सब उसकी खुले दिल से पीठ पीछे भी तारीफ़ करते,पर कभी कभी उसका छोटा मोटा नुकसान भी हो जाता जिसे आसपास के रिश्ते में कटुता न आने देने के लिए वह इग्नोर कर देती,एक बार उसने देखा कि पड़ोस की रेखा को पत्रिकाएं पढ़ने का बहुत शौक है पर वह इतनी  खरीद नहीं पाती,सरिता को पत्रिकाएं पढ़ने का बहुत शौक था,वह हर महीने खूब पत्रिकाएं खरीदती,उसने रेखा से कहा ,”तुम्हे पढ़ने का शौक है तो मुझसे ले कर पढ़ लिया करो. ”

रेखा खुश हो गयी,अब वह हर महीने सरिता से पत्रिकाएं तुरंत ले जाती,यह भी न देखती कि सरिता ने भी खुद अभी पढ़ी है या नहीं और जब वापस करती,वे फटी मुचड़ी हालत में होतीं,अपनी एक एक पत्रिका हमेशा संभाल कर रखने वाली सरिता के लिए यह बहुत अजीब सी स्थिति होती,कुछ कहना भी ठीक न लगता पर फटी पत्रिका हाथ में लेकर पढ़ने में उसे बहुत दुःख होता,कभी वह मिक्सर मांग कर ले जाती,सरिता कभी मना न करती,कई कई दिन तक बिना मांगे वापस न करती,अचानक सरिता को जरुरत पड़ती,वह ही लेने भागती पर फिर भी उसने हमेशा इस बात का ध्यान रखा कि अगर किसी आसपास वाले के काम आ सकती है तो जरूर आये.

विपिन जब अविवाहित था उसने अपनी नयी नौकरी लगते ही जिस एरिया में घर लिया,वहां मकान मालिक के जीवन का स्तर उसकी नयी नयी सुविधाओं से भरी लाइफ से कम था,मकान मालिक को जिस भी चीज की जरुरत होती,वह अपने पोरशन की चाभी ही दे जाता,नए शहर  में नयी नौकरी में वह   काफी व्यस्त रहता,धीरे धीरे उसके नम्र स्वभाव के चलते वह उनकी फॅमिली मेंबर जैसा ही हो गया,यहाँ तक कि जब वह शादी के बाद अपनी वाइफ को लेकर आया,उनकी लाइफ की हर जरुरत के समय मकान मालिक का पूरा परिवार हाजिर रहता,दोनों में से कोई भी कभी बीमार हो जाता,उन्हें कोई परेशानी नहीं होती,उनके काम आने वाले कई लोग हाजिर रहते.जब उनका ट्रांसफर हो गया,वे परिवार की ही तरह अलग हुए और जब भी कभी फिर उस शहर में आये,मकान मालिक से मिले बिना  कभी नहीं गए.

पुणे की दीपा जो एक पॉश सोसाइटी में रहती हैं,वे अपने दिल की बात कुछ इस तरह शेयर करते हुए कहती हैं,”अगर मेरे आसपास कोई मुझसे कम स्तर वाले के साथ मेरा मिलना होता है तो मैं बहुत आराम,सहजता महसूस करती हूँ क्योंकि फिर मुझ पर कपड़ों,गहनों की नुमाइश का प्रेशर नहीं रहता,मैं स्वभाव से बहुत सिंपल हूँ,मुझसे बड़ी बड़ी बातें नहीं होतीं,न मुझे कोई पार्टीज या कभी किटी पार्टीज का शौक  रहा,मैं अपने पति की ऑफिस की पार्टीज में भी ज्यादा मिक्स नहीं होती क्योंकि उन लेडीज का सोचना मुझसे बहुत अलग होता है,मैं पढ़ना लिखना पसंद करती हूँ,वे कुछ और बातें करती हैं जो मेरे इंटरेस्ट की नहीं होती इसलिए मैं अपने से कम स्तर वालों के साथ बहुत अच्छा,फ्री महसूस करती हूँ.”

अपने आसपास के स्तर का बच्चों पर कुछ अलग ही प्रभाव पड़ता है,मुंबई की रीता का कहना है,”जिन लोगों का स्तर आपसे कम हो,उन बच्चों के साथ खेलते हुए आपसे बच्चों पर कुछ अलग असर होता है,कम स्तर वाले घरों के  बच्चे ऐसे माहौल में पल बढ़ रहे होते हैं जिनका सोचना हमारे से बिलकुल अलग होता है,हमारे बच्चों के ऊपर बड़ी बड़ी कोचिंग क्लास ,उनके हाई फाई करियर का प्रेशर होता है,हमारे बच्चों की बातें अलग होती हैं,उनकी अलग. ऐसे में हमारे बच्चों का सोचना हमारे लाइफस्टाइल से अलग न हो,इसकी टेंशन तो रहती है. ” कड़वा ही सही पर सच है यह.

कई बार ऐसा भी होता है कि बेहतर लाइफ स्टाइल वाली फॅमिली को साधारण स्तर वाले लोग उतनी खुशदिली से नहीं अपनाते जबकि बेहतर स्तर की फॅमिली में न कोई घमंड होता है न दिखावा,मेरठ में थापर नगर में जब संजना का अति समृद्ध परिवार रहने आया तो वह जितना आसपास वालों से मिलने जुलने की कोशिश करती,हर बार कोई न कोई उसे चुभता हुआ कुछ कह देता,उनकी बेटी एक मल्टी नेशनल कंपनी में काम करती थी,बड़ी पोस्ट पर थी ,वह अक्सर लेट होती,कोई कलीग उसे छोड़ने आ जाता तो आसपास की खिड़कियों से कई जोड़ी नजरें ऐसे घूरतीं कि उन्हें बहुत अजीब लगता,यहाँ आसपास का आर्थिक  स्तर तो मेल मिलाप में दीवार बनता ही,मानसिक स्तर भी एक दूरी बनाये रखता.मानसिक स्तर पर जो आपस में अंतर होता है,वह भी उतना ही समस्याएं खड़ी कर देता है जितना आर्थिक स्तर पर अंतर करता है.

आसपास के लोगों का स्तर अगर आपसे कम है तो सबसे पहले इस बात का ध्यान जरूर रखें कि कभी भी भूल कर भी डींगें न मारें,यह बहुत छोटी बात होगी,इससे भले ही आपके पास पैसा हो,आप  नीचे ही दिखेंगें,डींगें मारना,घमंड करना ,सामने वाले का अपमान करना आपकी सारी खूबियों को ख़तम कर सकता है. आजकल वैसे भी समाज में नफ़रतें बढ़ती ही जा रही हैं,धर्म  और जाति को लेकर दिलों में दीवारें खड़ी की जा रही हैं,ऐसे में कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि आसपास प्यार और सद्भावना का माहौल बनाने  में मदद करें,आसपास के लोगों को आपकी किसी भी तरह की जरुरत हो,उनके काम आएं,अपनी हेल्प ऑफर करें.

हम साथ-साथ हैं: कुनिका को अपनी कौन सी गलती का पछतावा हो रहा था

‘‘क्या बात है, पापा, आजकल आप अलग ही मूड में रहते हैं. कुछ न कुछ गुनगुनाते रहते हैं. पहले तो आप को इस रूप में कभी नहीं देखा. इस का कोई तो कारण होगा,’’ कुनिका के इस सवाल पर कुछ पल मौन रहे. फिर ‘‘हां, कुछ तो होगा ही’’ कह राजेशजी चाय का घूंट भरते हुए अखबार ले कर बैठ गए.

इकलौती लाड़ली कुनिका कब चुप रहने वाली थी, ‘‘कोई ऐसावैसा काम न कर बैठना, पापा. अपनी उम्र और हमारी इज्जत का ध्यान रखना.’’

क्या यह उन की वही नन्ही बिटिया है जिसे पत्नी के गुजर जाने के बाद मातापिता दोनों का लाड़ दिया. तब बेटी और नौकरी बस 2 ही तो लक्ष्य रह गए थे. पर जब 19 वर्षीया कुनिका, असगर के साथ भाग गई थी तब भी बिना किसी शिकायत और अपशब्द के बेटी की इच्छा को पूरी तरह मान देने की बात, अखबारों में अपील कर के प्रसारित करवा दी. 4 दिन बाद कुनिका, असगर को छोड़ वापस आ गई थी और अपने इस गलत चुनाव के लिए पछताई भी थी.

तब शर्मिंदगी से बचने व बेटी के भविष्य के लिए उन्होंने अपना तबादला भोपाल करा लिया. अब समय का प्रवाह, उन्हें 65 बसंत के पार ले आया था. जीवन यों ही चल रहा था कि पिछले 1 वर्ष से पार्क में सैर करते हुए रेनूजी से परिचय हुआ. उन की सादगी, शालीनता, बातचीत में मधुरता देख उन के प्रति एक अलग सा मोह उत्पन्न हो रहा था. रेनूजी, यहां छोटे बेटेबहू के साथ रह रही थीं. बड़ा बेटा परिवार सहित अमेरिका में रह रहा था.

‘‘अपने बारे में कुछ सोचती हैं कभी?’’ एक दिन बातों ही बातों में राजेशजी ने कहा.

‘‘अपने बारे में अब सोचने को रहा ही क्या है? हाथपांव चलते जीवन बीत जाए,’’ कहते हुए रेनूजी का चेहरा उदास हो उठा था.

कुछ दिनों बाद, राजेशजी ने जीवनभर का साथ निभाने का प्रस्ताव रेनूजी के समक्ष रख दिया, ‘‘क्या आप मेरे साथ बाकी का जीवन बिताना चाहेंगी? अकेलेपन से हमें मुक्ति मिल जाएगी.’’

‘‘इस उम्र में यह मेरा परिवार, आप का परिवार, समाज, हम…’’ शब्द गले में ही अटक गए थे.

‘‘एक विधवा या विधुर को जीवन बसाने की तमन्ना करना क्या गुनाह है? हम ने अपने कर्तव्य पूरे कर लिए हैं. अब कुछ अपने लिए तलाश लें तो भला गलत क्या है? तुम्हारी स्वीकृति हम दोनों को एक नया जीवन देगी.’’

‘‘हां, यह सच है कि अकेलापन, मन को पीडि़त करता है. पर जीवन तो बीत ही गया, अब कितना बचा है जो…’’ कंपित स्वर था रेनूजी का, ‘‘अब मैं चलती हूं,’’ तेजी से वे चली गईं.

इधर, 10-12 दिनों से वे घर से नहीं निकलीं. उस दिन माला, रोहन से कह रही थी, ‘‘आजकल मम्मी घूमने नहीं जातीं. गुमसुम बैठी रहती हैं. मातम जैसा बनाए रखती हैं चेहरे पर.’’

‘‘कोई बात नहीं. अपनेआप ठीक हो जाएगा मूड. तुम टाइम से तैयार हो जाना. लंच पर रमेश के घर जाना है.’’

बेटे के इस उत्तर पर, रेनूजी की आंखें भर आईं. न जाने क्या सोच कर राजेशजी को मोबाइल पर नंबर लगा दिया. उधर से राजेशजी का मरियल स्वर सुन वे घबरा गईं, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘कुछ नहीं, 8 दिनों से तबीयत थोड़ी खराब चल रही है. बेटीदामाद लंदन गए हुए हैं. 2-4 दिनों में ठीक हो जाऊंगा,’’ और हलकी सी हंसी हंस दिए वे.

उस दिन 2 घंटे बाद, रेनूजी दूध, फल आदि ले राजेशजी के घर पहुंच गईं. तब राजेशजी के चेहरे की खुशी व तृप्ति, रेनूजी को अपने अस्तित्व की महत्ता दर्शा गई. आज का दिन उन की ‘स्वीकृति’ बन गया.

2 हफ्तों बाद, एकदूसरे को माला पहना, जीवनसाथी बन, रेनूजी के चेहरे पर संतोष के साथसाथ दुश्चिंता केभाव भी स्पष्ट थे. दोनों परिवारों के बच्चों से सामना करने का संकोच गहराता जा रहा था.

‘‘मुझे तो घबराहट व बेचैनी हो रही है कि बच्चे क्या कहेंगे? आसपास के लोग क्या कहेंगे? पांवों में आगे बढ़ने की ताकत जैसे खत्म हो रही है.’’

‘‘सब ठीक होगा. मैं हूं न तुम्हारे साथ. हर स्वीकृति कुछ समय लेती है. अब हमारे कदम रुकेंगे नहीं पहले मेरे घर चलो.’’

छोटी बिंदी और मांग में सिंदूरभरी महिला को पापा के साथ दरवाजे पर खड़ा देख कुनिका के अचकचा कर देखने पर परिचय कराते हुए राजेशजी बोले, ‘‘बेटी, ये तुम्हारी मां हैं. हम ने आज ही विवाह किया है. और…’’

‘‘यह क्या तमाशा है, पापा? शादी क्या कोई खेल है जो एकदूसरे को माला पहनाई और बन गए…’’

‘‘पहले पूरी बात तो सुनो, अगले माह कोर्टमैरिज भी होगी,’’ बीच में ही राजेशजी ने जवाब दे डाला.

‘‘कुछ भी हो, यह औरत मेरी मां नहीं हो सकती. इस घर में यह नहीं रह सकती,’’ वह उंगली तानते हुए बोली.

‘‘पर यह घर तो मेरा है और अभी मैं जिंदा हूं. इसलिए तुम इन्हें रोक नहीं सकतीं.’’

तभी रेनूजी ने आगे बढ़ते हुए कहा, ‘‘सुनो तो, बेटी.’’

‘‘मैं आप की बेटी नहीं हूं. मत करिएयह नाटक,’’ कुनिका पैर पटकती अंदर चली गई.

‘‘आओ रेनू, तुम भीतर आओ,’’ रेनूजी का उतरा चेहरा देख, राजेशजी ने समझाते हुए कहा, ‘‘हमारे इस फैसले को ये लोग धीरेधीरे अपनाएंगे. थोड़ा सब्र करो, सब ठीक हो जाएगा.’’

चाय बनाने के लिए रेनूजी के रसोई में घुसते ही, कुनिका ‘हुंह’ के साथ लपक कर बाहर निकल आई. पीछेपीछे राजेशजी भी वहीं पहुंच गए.

‘‘मेरे बच्चे भी न जाने क्याकुछ कहेंगे, कैसा व्यवहार करेंगे,’’ उन के पास जाने की सोच कर ही दिल बैठा जा रहा है,’’ चाय कपों में उड़ेलते हुएरेनूजी कह रही थीं, ‘‘मैं ने रोहन को बता दिया है मैसेज कर के. बस, अब बच्चों को एहसास दिलाना है कि हम उन के हैं, वे हमारे हैं. हम अलग रहेंगे पर सुखदुख में साथ होंगे. कोशिश होगी कि हम उन पर बंधन या बोझ न बनें और उन की खुशी…’’

तभी कुनिका की दर्दभरी चीख सुन सीढि़यों की तरफ से आती आवाज पर दोनों उस ओर लपके. वह कहीं जाने के लिए निकली ही थी कि ऊंची एड़ी की सैंडिल का बैलेंस बिगड़ने से 4 सीढि़यों से नीचे आ गिरी. रेनूजी व राजेशजी ने सहारा दिया और उस के कक्ष में बैड पर लिटा दिया. पहले तो दर्दनिवारक दवा लगाई फिर रेनूजी जल्दी से हलदी वाला गरम दूध ले आईं. कुनिका का पांव देख रेनूजी समझ गईं कि मोच आई है. राजेशजी से मैडिकल बौक्स ले कर उस में से पेनकिलर गोली दी. साथ ही, पांव में क्रेपबैंडेज भी बांध दिया.

‘‘परेशान न हो, कुनिका. कुछ ही घंटों में यह ठीक हो जाएगा,’’ कहते हुए रेनूजी ने पतली चादर उस के पैरों पर डाल उस के माथे पर हाथ फेर दिया.

धीरेधीरे दर्द कम होता गया. अब कुनिका आंखें बंद किए सोच रही थी, ‘सच में ही इस औरत ने पलक झपकते ही यह स्थिति सहज ही संभाल ली. अकेले पापा तो कितने नर्वस हो जाते.’ कुछ बीती घटनाओं को याद करते हुए वह सोचने लगी, ‘पापा वर्षों से अकेलेपन में जीते आए हैं. अब उन्हें मनपसंद साथी मिला है तो मैं क्यों चिढ़ रही हूं?

‘‘बेटी, अब कैसा लग रहा है?’’ माथे पर रेनूजी का गुनगुना स्पर्श, मन को ठंडक दे गया.

‘‘मैं ठीक हूं, आप परेशान न हों,’’ एक हलकी मुसकान के साथ कुनिका का जवाब पा रेनूजी का मन हलका हो गया.

अगले दिन रेनूजी अपने द्वार की घंटी बजा, राजेशजी के साथ दरवाजा खुलने की प्रतीक्षा में खड़ी थीं. दरवाजा खुला, माला ने दोनों को एक पल देखा और बिना कुछ कहे भीतर की ओर बढ़ गई. सामने लौबी में रोहन चाय पी रहा था. वह न तो बोला, न उस ने उठने का प्रयास किया और न इन लोगों से बैठने को कहा. राजेशजी स्वयं ही आगे बढ़ कर बोले, ‘‘हैलो बेटे, मैं राजेश हूं. तुम्हारी मां का जीवनसाथी. हम जानते हैं कि हमारा यह नया रिश्ता तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा पर तुम्हें अब अपनी मां की चिंता करने की जरूरत नहीं होगी. हम दोनों…’’

‘‘बेकार की बातें न करें. हमारे बच्चे, समाज, आसपास के लोगों के बारे में कुछ तो सोचा होता. इतनी उम्र निकल गई और अब शादी रचाने की इच्छा जागृत हो गई आप लोगों की. क्या हसरत रह गई है अब इस उम्र में? मेरी मां तो ऐसा स्वप्न में भी नहीं सोच सकती थीं. यह सब आप का फैलाया जाल है. क्या इस वृद्धावस्था में यह शोभा देता है? आखिर, कैसे हम अपने रिश्तेदारों में गरदन उठा पाएंगे?’’ क्रोध और तनाववश रोहन का चेहरा विदू्रप हो उठा था.

तभी रेनूजी सामने आ गईं, ‘‘कौन से रिश्तेदारों की बात कर रहा है. जब मैं 2 छोटे बच्चों के साथ मुसीबतों से जूझ रही थी तब तो कोई अपना सगा सामने नहीं आया. तुम्हारे पापा की मृत्यु के साथ जैसे मेरा अस्तित्व भी समाप्त हो गया था. पर मैं जिंदा थी. सच पूछो तो मुझे स्वयं पर गर्व है कि मैं ने अपना कर्तव्य पूरी तरह निभाया, तुम बच्चों को ऊंचाई तक पहुंचाया.’’

तभी पास रखी कुरसी खींच, उस पर बैठते हुए राजेशजी बोले, ‘‘तुम्हारा कहना कि हमारी उम्र बढ़ गई है, तभी तो यह रिश्ता हसरतों का नहीं, साथ रहने व संतुष्टि पाने का है. बेटे, एक बार हमारी भावना, संवेदना पर गौर करना, सोचना और हमें अपना लेना. हम तो तुम्हारे हैं ही, तुम भी हमारे हो जाना. तुम्हारा छोटा सा साथ, हमें ऊर्जा व खुशी से लबालब रखेगा. अब हम चलते हैं.’’

उसी शाम कुनिका को भी फोन कर दिया, ‘‘आज गौरव भी भारत आ जाएगा. परसों रविवार की सुबह तुम लोग, साकेत वाले फ्लैट पर आ जाना. और हां, रेनूजी का परिवार भी निमंत्रित है. तुम सब की प्रतीक्षा होगी हमें.’’ फोन डिसकनैक्ट करने ही वाले थे कि उधर से आवाज आई, ‘‘पापा, हम जरूर आएंगे. बायबाय.’’ राजेशजी के चेहरे पर मुसकराहट छा गई.

वर्षों पूर्व छुटी एक ही रूम में सोने की आदत, अपनाने में असहजता व कुछ अजीब सा लग रहा था राजेशजी व रेनूजी को. फिर भी बातें करतेकरते एक सुकून के साथ कब वे दोनों नींद की आगोश में समा गए, पता ही न लगा. गहरी नींद में सोई हुई रेनूजी, अलार्म की घंटी पर, हलकी सी चीख के साथ जाग पड़ीं, ‘‘क्या हुआ? कौन है?’’

‘‘अरे, कोई नहीं. यह तो घड़ी का अलार्म बजा है.’’

‘‘अभी तो शायद 4 या साढ़े 4 ही बजे होंगे और यह अलार्म?’’

‘‘हां, मैं इतनी जल्दी उठता हूं, फिर फ्रैश हो कर सैर करने के लिए निकल जाता हूं. तुम चलोगी?’’ राजेशजी के पूछने पर, ‘‘अरे नहीं, मैं आधी रात के बाद तो सो पाई हूं कि…’’ परेशानी युक्त स्वर में जवाब आया.

‘‘क्यों? क्या तुम्हें नींद न आने की समस्या है?’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है. असल में नई जगह पर नींद थोड़ी कठिनाई से आ पाती है.’’

जीवन में कई ऐसी बातें होती हैं जिन पर गौर नहीं किया जाता, खास महत्त्व नहीं दिया जाता. और फिर अचानक ही वे महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं, जैसे कि राजेशजी को चटपटी सब्जी, एकदम खौलती हुई चाय, मीठे के नाम पर बूंदी के लड्डू बहुत पसंद हैं. इस के विपरीत रेनूजी को सादा, हलके मसाले की सब्जी और बूंदी के लड्डू की तो गंध भी पसंद नहीं आती. पर अब वे दोनों ही एकदूसरे की पसंद पर ध्यान देने लगे हैं, एकदूसरे की खुशी का ध्यान पहले करते हैं.

रविवार की दोपहर, राजेशजी व रेनूजी के घर में दोनों परिवारों के बच्चे एकदूसरे से परिचित हो रहे थे. रोहन और माला चुपचुप थे पर कुनिका और गौरव बातों में पहल कर रहे थे. तभी राजेशजी की आवाज पर सब चुप हो गए.

‘‘बच्चों, हम कुछ कहना चाहते हैं. हमारी इस शादी से किसी के परिवार पर भी आर्थिक स्तर पर कोई दबाव नहीं होगा. प्रौपर्टी बंट जाएगी या ऐसी ही कुछ और समस्या का सामना होगा, ऐसा कुछ भी नहीं होगा. हम दोनों ने कोर्ट में ऐफिडेविट बनवा कर निश्चय किया है कि हम पतिपत्नी बन कर एकदूसरे की चलअचल संपत्ति पर हक नहीं रखेंगे. अपनी इच्छा से अपनी संपत्ति गिफ्ट करने की स्वतंत्रता होगी. अपनीअपनी पैंशन अपनी इच्छा से खर्च करने की मरजी होगी. खास बात यह कि तुम्हारी मां अपनी पैंशन को हमारे घर के खर्च पर नहीं लगाएंगी. यह खर्च मैं वहन करूंगा. आर्थिक सहायता नहीं, पर भावनात्मक या कभी साथ की जरूरत हुई तो हम बच्चों की राह देखेंगे. हम तो तुम्हारे हैं ही, बस, तुम्हें अपना बनता हुआ देखना चाहेंगे. और भी कुछ जिज्ञासा हो तो आप पूछ सकते हैं,’’ इतना कह राजेशजी, प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में चुप हो गए.

‘‘हम आप के साथ हैं, आप की खुशी में हम भी खुश हैं,’’ दोनों परिवारों के सदस्यों ने समवेत स्वर में कहा. तभी राजेशजी ने रेनूजी का हाथ धीरे से थामते हुए कहा, ‘‘शेष जीवन, कटेगा नहीं, व्यतीत होगा.’’

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