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कैसे और कौन बन सकता जामा मसजिद का शाही इमाम, कितनी मिलती है सैलरी

शब ए बरात के दिन दिल्ली की जामा मसजिद को नया शाही इमाम मिल गया. शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने दस्तारबंदी (पगड़ी पहनाने की रस्म) समारोह में अपने बेटे सैयद शाबान बुखारी को जामा मसजिद का नया इमाम घोषित किया है. इस से पहले 29 वर्षीय सैयद शाबान बुखारी जामा मसजिद के नायब इमाम थे.

शाबान को 2014 में नायब इमाम की जिम्मेदारी मिली थी. उस के बाद से ही वे देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी धर्म से जुड़ी ट्रेनिंग ले रहे थे. शाही इमाम के पद पर होने के लिए इसलाम से जुड़ी तमाम तरह की जानकारी होना जरूरी होता है.

एमिटी यूनिवर्सिटी के छात्र रहे सैयद शाबान बुखारी की दस्तारबंदी होने के साथ ही वे जामा मसजिद के 14वें इमाम बन गए हैं. उन के परिवार ने 13 पीढ़ियों से जामा मसजिद की अध्यक्षता की है. गौरतलब है कि जामा मसजिद का निर्माण वर्ष 1650 में मुगल बादशाह शाहजहां द्वारा शुरू करवाया गया था. इस को बनने में 6 साल लगे और 1656 में यह पूरी तरह बन कर तैयार हुई थी. तब शाहजहां ने बुखारा (जो अब उज्बेकिस्तान में है) के शासकों को इस मसजिद के लिए एक इमाम की जरूरत बताई थी. उस के बाद इसलामिक धर्मगुरु सैयद अब्दुल गफूर शाह बुखारी को भारत भेजा गया था. उन को 24 जुलाई, 1656 को जामा मसजिद के शाही इमाम का खिताब दिया गया.

तब से आज तक उन्हीं के परिवार से दिल्ली की जामा मसजिद में इमाम बनते रहे हैं. इन्हें आज भी शाही इमाम का दर्जा हासिल है. ‘शाही’ का मतलब होता है ‘राजा’ और ‘इमाम’ वह होते हैं जो मसजिद में नमाजियों को नमाज अदा कराने के नेतृत्व करते हैं. इस तरह शाही इमाम का अर्थ होता है राजा की ओर से नियुक्त किया गया इमाम.

वर्तमान इमाम शाबान बुखारी

सैयद शाबान बुखारी का जन्म 11 मार्च, 1995 को दिल्ली में हुआ था. उन्होंने एमिटी यूनिवर्सिटी से सोशल वर्क में मास्टर डिग्री हासिल की है. इस के अलावा इसलामी धर्मशास्त्र में आलमियत और फाजिलियत भी की है. सैयद शाबान बुखारी ने इसलाम की बुनियादी तालीम के साथसाथ धर्म से संबंधित व्यापक अध्ययन मदरसा जामिया अरबिया शम्सुल उलूम, दिल्ली से हासिल किया है.

शाबान सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय रूप से भाग लेते हैं और विभिन्न समुदायों के बीच शांति व सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए भी काम करते हैं. चूंकि शाबान युवा हैं, ऐसे में वे युवा वर्ग को शिक्षा और धर्म से जोड़ने में काफी मददगार साबित हो सकते हैं. वे जामा मसजिद के अब तक के सब से युवा शाही इमाम हैं.

13 नवंबर, 2015 को शाबान बुखारी ने गाजियाबाद की एक हिंदू लड़की से शादी की. शुरुआत में उन का परिवार इस शादी के लिए राजी नहीं था लेकिन शाबान की मोहब्बत को देखते हुए बाद में पूरा परिवार शादी के लिए राजी हो गया और 13 नवंबर, 2015 को धूमधाम से उन की शादी हुई. शादी के बाद 15 नवंबर को महिपालपुर के एक फार्महाउस में ग्रैंड रिसैप्शन दिया गया, जिस में कई राजनीतिक हस्तियां शामिल हुई थीं. शाबान के फिलहाल 2 बच्चे हैं और निकाह के बाद उन की पत्नी का नाम शबानी रखा गया है.

कैसे बनते हैं शाही इमाम

उत्तराधिकार संबंधी किसी भी अप्रिय विवाद से बचने के लिए जामा मसजिद के इमाम अपने जीवनकाल में ही अपने उत्तराधिकारी की घोषणा कर देते हैं. मौजूदा इमाम सैयद अहमद बुखारी को वर्ष 2000 में नायब इमाम घोषित किया गया था जब उन के पिता सैयद अब्दुल्ला बुखारी गंभीर रूप से अस्वस्थ थे. बाद में उन का एम्स में निधन हो गया था. इस बार, नायब इमाम के पद के लिए इमाम सैयद अहमद बुखारी के 2 भाइयों के नाम भी चर्चा में थे, लेकिन दस्तारबंदी सैयद शाबान बुखारी की हुई और वे सर्वसम्मति से शाही इमाम घोषित किए गए.

शाही इमाम के कार्य

जो व्यक्ति मसजिद में नमाज पढ़ाता है उसे इमाम कहा जाता है. इमाम आम तौर पर एक पुरुष धार्मिक नेता होता है जो इस्लामी शिक्षाओं का जानकार होता है और प्रार्थना में मंडली का नेतृत्व करने के लिए जिम्मेदार होता है. सामूहिक प्रार्थनाओं का नेतृत्व करने के अलावा, इमाम समुदाय को धार्मिक मार्गदर्शन और शिक्षा भी प्रदान कर सकता है और विवाह एवं अंतिम संस्कार जैसे धार्मिक कर्तव्यों का पालन कर सकता है.

कुछ देशों में, एक महिला केवल महिलाओं वाली मसजिद या समुदाय में इमाम के रूप में काम कर सकती है, लेकिन कई मुसलिम देशों और समाजों में यह आम बात नहीं है. भारत में तो शायद ही कोई महिलाओं की मसजिद हो जहां महिला इमाम हो.

मुगलकाल में जामा मसजिद के शाही इमाम के 2 प्रमुख काम थे- मुगल सम्राटों का राज्याभिषेक करवाना और जामा मसजिद में नमाज के सुचारु संचालन को देखना. जामा मसजिद के पहले इमाम सैयद गफूर बुखारी ने बादशाह औरंगजेब का राज्याभिषेक किया था. मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर का राज्याभिषेक 30 सितंबर, 1837 को जामा मसजिद के 8वें इमाम मीर अहमद अली शाह बुखारी की सरपरस्ती में हुआ था.

खैर, अब राजशाही तो खत्म हो गई है, इसलिए जामा मसजिद के इमाम का मुख्य काम नमाज अदा करवाना ही रह गया है. कई बार वे राजनीतिक मामलों में भी अपनी राय रखते हैं. चुनावी दौर में मुसलिम वोटों के लिए राजनेता इन के आगेपीछे रहते हैं. इमाम अहमद बुखारी के पिता अब्दुल्ला बुखारी अलगअलग मुसलिम दलों को अपना समर्थन दे चुके हैं.

अहमद बुखारी के पिता ने 1977 में जनता पार्टी और 1980 में कांग्रेस को भी समर्थन दिया था. उस के बाद से देश की अलगअलग पार्टियां शाही इमाम का समर्थन लेने जामा मसजिद के दर पर आने लगीं. इन में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ ही सोनिया गांधी के भी नाम शामिल हैं.

वर्ष 2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई को भी शाही इमाम के समर्थन की जरूरत पड़ी थी. तब बुखारी ने मुसलमानों से भाजपा को समर्थन देने की अपील की थी. वर्तमान समय में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से भी शाही इमाम के अच्छे संबंध हैं और केजरीवाल सरकार की तरफ से दिल्ली की मसजिदों के इमामों को आर्थिक मदद दी जाती है, जिस पर अन्य राजनीतिक दलों, खासकर भारतीय जनता पार्टी, को घोर आपत्ति है और इस संबंध में मामला अदालत में लंबित भी है.

कौन उठाता है मसजिद का खर्च

मसजिद के रखरखाव, रंगरोगन, बिजलीपानी और इमामों को सैलरी वक्फ बोर्ड द्वारा जाती है. सुप्रीम कोर्ट ने 1993 में अखिल भारतीय इमाम संगठन के अध्यक्ष मौलाना जमील इलियासी की याचिका पर सुनवाई करते हुए वक्फ बोर्ड को उस के मैनेजमैंट वाली मस्जिदों में इमामों को वेतन देने का निर्देश दिया था.

दिल्ली, हरियाणा और कर्नाटक में मसजिदों के इमाम को वक्फ बोर्ड सैलरी देता है. कई राज्यों में वक्फ बोर्ड कुछ मसजिदों के इमाम को काफी पहले से ही सैलरी दे रहा था, खासकर उन मस्जिदों के इमाम को जिन की पुरातत्व विभाग देख रेख करता है और जो ऐतिहासिक मसजिदें हैं.

मुसलिम पर्सनल लौ बोर्ड के सदस्य सैयद कासिम रसूल इलियास कहते हैं कि वक्फ बोर्ड सभी मसजिदों के इमाम को सैलरी नहीं देता है बल्कि अपनी ही मसजिदों के इमामों को सैलरी देता है, बाकी मसजिदों के इमामों को मसजिद कमेटियां तनख्वाह देती हैं. वक्फ की जो भी संपत्तियां हैं, वो सभी मुसलिमों की हैं. ऐसे में वक्फ की आय को सिर्फ मुसलिमों पर ही खर्च किया जा सकता है. इसीलिए वक्फ बोर्ड अपनी मसजिदों के इमामों से ले कर गरीबों-यतीमों तक को मदद देने का काम करता है.

दिल्ली में वक्फ प्रौपर्टी काफी प्राइम लोकेशन पर हैं, जिन के किराए वसूले जाएं तो सरकार जितना फंड देती है, वह रकम उस से कई गुना ज्यादा होगी. वक्फ बोर्ड अपनी संपत्तियों के किराए या फिर दरगाह से होने वाली आमदनी से अपने कर्मचारियों और अपनी मसजिदों के इमाम-मुअज्जिन को सैलरी देता है.

इस के अलावा बोर्ड यतीमों और गरीबों को पैंशन के तौर पर आर्थिक मदद देता है. कुछ राज्यों की सरकारें वक्फ संपत्तियों के संरक्षण के लिए फंड देती हैं, जिसे बोर्ड कई जगह मदद में खर्च करता है. दिल्ली सरकार लगभग 62 करोड़ रुपए का अनुदान प्रतिवर्ष वक्फ बोर्ड को देती है जबकि वक्फ बोर्ड की अपनी खुद की आय सालाना 4 करोड़ रुपए से ज्यादा है. सरकार द्वारा दिया गया फंड वक्फ संपत्तियों के संरक्षण के लिए होता है. बोर्ड इस फंड को अलगअलग मद में खर्च करता है.

वक्फ का फाइनैंस मौडल

वक्फ बोर्ड की आय का स्रोत अपनी वक्फ संपत्तियां हैं. यह आय मसजिदों में बनी दुकानें-प्रौपर्टी के किराए, दरगाह और खानकाह के जरिए होती है. वक्फ की जिस संपत्ति से आय होती है उस संपत्ति की स्थानीय कमेटी 93 फीसदी को अपने पास रखती है, सिर्फ 7 फीसदी आय को राज्य वक्फ बोर्ड को देती है, जिस में एक फीसदी सैंट्रल वक्फ काउंसिल को जाता है. स्थानीय कमेटी 93 फीसदी को वहां के रखरखाव पर खर्च करती है जबकि राज्य वक्फ बोर्ड 7 फीसदी में से कर्मचारियों और प्रबंधन पर पैसा खर्च करता है.

उदाहरण के तौर पर बहराइच की दरगाह में सालाना 7 करोड़ रुपए आय होती है, जिस में करीब साढ़े 6 करोड़ रुपए दरगाह के रखरखाव पर खर्च होते हैं और और 49 लाख रुपए स्टेट वक्फ बोर्ड को जाते हैं. स्टेट बोर्ड 49 लाख में से 7 लाख रुपए सैंट्रल वक्फ काउंसिल को देता है. ऐसे ही दिल्ली की निजामुद्दीन दरगाह, महरौली दरगाह से होने वाली आय का हिस्सा वक्फ बोर्ड को मिलता है. वक्फ बोर्ड इसी आय में से अपनी मसजिदों के इमामों और मोअज्जिनों को सैलरी देता है.

किसकिस राज्य में इमाम को सैलरी

दिल्ली ही नहीं, बल्कि देश के लगभग सभी राज्यों में वक्फ बोर्ड अपनी मसजिदों के इमामों को सैलरी देते हैं. तेलंगाना में जुलाई 2022 से इमामों और मुअज्जिनों को हर महीने 5,000 रुपए मानदेय दिया जा रहा है. मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड इमाम को 5,000 रुपए महीना और मुअज्जिनों को 4,500 रुपए महीना देता है.

हरियाणा में वक्फ बोर्ड अपनी मसजिदों के 423 इमामों को प्रतिमाह 15,000 रुपए का वेतन देता है. बिहार में साल 2021 से सुन्नी वक्फ बोर्ड अपनी मसजिदों के इमाम को 15,000 और मोअज्जिनों को 10,000 रुपए मानदेय दे रहा है. हालांकि, बिहार स्टेट शिया वक्फ बोर्ड 105 मसजिदों के इमाम को 4,000 और मोअज्जिनों को 3,000 रुपए मानदेय दे रहा है.

कर्नाटक वक्फ बोर्ड ने पंजीकृत मसजिदों के इमाम को सैलरी देने का स्लैब बना रखा है, जिस में बड़े शहरों में इमाम को 20,000, नायब इमाम को 14,000, मोअज्जिन को 14,000, खादिम को 12,000 और मुअल्लिम को 8,000 रुपए देने का प्रावधान है. ऐसे ही शहर की मसजिद के इमाम को 16,000, कसबे या नगर की मसजिद के इमाम को 15,000 और ग्रामीण मसजिद के इमाम को 12,000 रुपए दिए जाते हैं. इसी तरह पंजाब में भी वक्फ बोर्ड की मसजिद के इमाम को सैलरी दी जाती है.

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड वक्फ बोर्ड अपनी मसजिदों के इमाम और मुअज्जिन को सैलरी नहीं देते. उत्तर प्रदेश में कुछ चुनिंदा मस्जिदों के इमाम को सैलरी दी जाती है, जो खासकर पुरातत्व विभाग के अधीन हैं. इन में ताजमहल मसजिद, लखनऊ में राजभवन की मसजिद, फतेहपुर सीकरी जैसी मसजिद के इमाम को सैलरी यूपी वक्फ बोर्ड देता है. वहीं, बाकी मसजिदों के इमाम को स्थानीय मसजिद कमेटी द्वारा सैलरी दी जाती है.

दिल्ली सहित कुछ राज्य सरकारें भी आर्थिक मदद करती हैं. बिहार सरकार सालाना 100 करोड़ रुपए का फंड वक्फ बोर्ड को अनुदान के तौर पर देती है. पश्चिम बंगाल की सरकार ने साल 2012 से ही इमामों को हर महीने 2,500 रुपए देने का ऐलान किया था और तब से यह सिलसिला जारी है.

मंदिर के पुजारी को क्यों नहीं मिलती सैलरी

यह विवाद और मांग काफी समय से जारी है कि जब मसजिद के इमाम को सैलरी मिलती है तो मंदिर के पुजारियों को क्यों सैलरी नहीं दी जाती है. हालांकि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने अब मंदिर के पुजारियों के लिए भी सैलरी का प्रावधान किया है और मोदी सरकार भी देशभर के मंदिरों में पुजारियों की तैनाती व सैलरी की योजना पर काम कर रही है.

पश्चिम बंगाल में ममता सरकार पुजारियों को सैलरी देती है, जो कि जनता के टैक्स से दिया जाता है. हालांकि मंदिर के पुजारियों को सैलरी न दिए जाने के पीछे कई कारण हैं. मंदिरों में प्रतिदिन जितनी दानदक्षिणा पुजारियों को मिलती है, उतना पैसा न तो मसजिद के इमाम को मिलता है और न चर्च के पादरी को.

गौरतलब है कि बड़ी संख्या में दानपात्रों की व्यवस्था मंदिरों में होती है और पूजा के लिए जाने वाला प्रत्येक मनुष्य उस में अपनी हैसियत के अनुसार पैसा डालता ही है. इस के अलावा मंदिर में फलमिठाई भी खूब चढ़ाया जाता है और दक्षिणा के रूप में पुजारियों को नए कपड़े व पैसे देने का भी चलन है. दक्षिण के मंदिरों में तो लोग सोनेचांदी के आभूषण तक चढ़ाते हैं. इन में से बहुत बड़ा हिस्सा वहां के पंडितों के पास जाता है.

वक्फ संपत्तियों के तहत आने वाली मसजिदों की देखरेख वक्फ बोर्ड करता है, जो एक स्वायत्त संस्था है और स्टेट सरकार के अधीन आती है. वक्फ संपत्तियों से होने वाली आय वक्फ बोर्ड को जाती है, जिस के जरिए वक्फ अपनी मसजिदों के इमाम को सैलरी देता है. वहीं, मंदिर के पुजारियों को सैलरी इसलिए सरकार द्वारा नहीं दी जाती, क्योंकि मंदिर और आश्रम का संचालन निजी ट्रस्ट द्वारा किया जाता है.

मंदिरों से होने वाली आय को ट्रस्ट अपने पास रखता है और उस से अपने मंदिरों के पुजारियों को सैलरी देता है. इतना ही नहीं, कई जगह पर धर्मार्थ विभाग हैं, जो मंदिरों के लिए ही पैसा खर्च करते हैं. उत्तराखंड में मंदिरों को सरकार ने अपने अधीन लेना चाहा तो पुजारियों ने विरोध कर दिया था, क्योंकि इस से उन को होने वाली असीमित आय का खुलासा हो जाता.

शाहरुख खान के बेटे को पुलिस ने नहीं छोड़ा तो मैं क्या चीज हूं: Ajaz Khan

Ajaz Khan:गंभीर आवाज, अच्छी कदकाठी के अभिनेता और रिऐलिटी शो बिग बौस 7 के पूर्व कंटैस्टेंट एजाज खान धारावाहिक ‘रक्तचरित्र’, ‘रहे तेरा आशीर्वाद’ आदि में भूमिका निभा कर चर्चित हुए हैं. इस के अलावा उन्होंने हिंदी फिल्मों और वैब सीरीज में भी काम किया है.

एजाज खान का जन्म गुजरात, अहमदाबाद में हुआ. कालेज के समय से उन की अभिनय करने की इच्छा हुई. इस के बाद वे मौडल बने और कई विज्ञापनों में काम किया. उन की जर्नी में उन की पत्नी और 2 बेटे हैं, जो क्रिकेट और फुटबौल खेलते हैं.

एजाज ने काम भले ही अधिक न किया हों लेकिन उन का नाता कंट्रोवर्सी से हमेशा रहा है. इस की वजह के बारे में उन का कहना है, “पहले मैं स्पष्टभाषी था, जो सामने दिखता उसे कह दिया करता था लेकिन अब नहीं कहता, समय के अनुसार चलने की कोशिश करता हूं.”

उन की वैब सीरीज ‘अमावस्या’ रिलीज पर है, जो अंधविश्वास के जाल में फंसे इंसान की दुर्दशा को बताती है. इस के अलावा एजाज एक म्यूजिक वीडियो भी करने वाले हैं. वे कहते हैं, “’अमावस्या’ में मैं ने आईपीएस पुलिस औफिसर की मुख्य भूमिका निभाई है. मेरे कई आईपीएस दोस्त हैं, उन से मैं ने अभिनय की बारीकियां सीखी हैं. ढाई साल के बाद मैं ने कैमरा फेस किया था, इसलिए मेहनत अधिक करनी पड़ी. जेल में रहते हुए मेरा वजन भी काफी बढ़ गया था, जिसे कम करना पड़ा.”

फिर से किए काम शुरू

एजाज ने 26 महीना आर्थर जेल में बिताए हैं. उन्हें मन में विश्वास था कि उन्होंने कोई जुर्म नहीं किया है, उन्हें आजादी मिलेगी. वे उस वक्त बहुत मायूस हुए, लेकिन मजबूत बने रहे. वे कहते हैं, “जेल में रहते हुए मैं ने अपने मन में सोचा कि मैं ने कोई गलत काम नहीं किया है और मुझे आजादी मिली. इस दौरान मैं ने खुद को अधिक मजबूत बनाया. जिस औफिसर ने मुझे जेल में डाला था, आज उस पर भी केस चल रहा है. उस ने मुझ पर झूठा केस डाला था. वह सैलिब्रिटी को झूठे आरोप में डाल कर सब से पैसे लेता था, जो बाद में सब को पता चला. अब उस की बारी जेल जाने की है. इन 26 महीनों को मेरी पत्नी और बच्चों ने बहुत मुश्किल से झेला है. मेरा सब काम छूट गया. मेरे सारे प्रोजैक्ट बंद हो गए थे. लेकिन मैं ने हौसला नहीं छोड़ा और अब फिर से काम करना शुरू कर दिया है. मैं ने देखा है कि जेल में बिना जुर्म किए, बहुत सारे लोग सजा पा रहे होते हैं, मायूस हो कर कुछ तो पंखे से लटक कर अपनी जान तक दे देते हैं. मेरा भी एक बुरा समय था, जो बीत गया. मेरे परिवार को भी पता था कि मैं ने कुछ किया नहीं है, वे हमेशा मेरे साथ मजबूती से खड़े रहे.”

कंट्रोवर्सी की वजह

एजाज बताते हैं, “फिल्म इंडस्ट्री के लोग पुलिस के सौफ्ट टारगेट होते हैं, क्योंकि उन्हें नाम और पैसा दोनों साथसाथ मिल जाते हैं. उस ने मुझे ही नहीं, शाहरुख खान के बेटे, अरमान कोहली, दीपिका पादुकोण, रणवीर सिंह आदि सभी के नामों को उछाला है. दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह के साथ भी मेरी अच्छी दोस्ती थी, उस के साथ मेरा घूमनाफिरना होता था. इसलिए कई वीडियोज उस के साथ मेरे थे, इसलिए मुझे भी पुलिस ने जबरदस्ती बुला लिया.
“मेरी थोड़ी बहस भी हो गई थी. जब शाहरुख खान के बेटे को पुलिस वालों ने नहीं छोड़ा, तो मैं क्या चीज हूं. बाद में शाहरुख खान का बेटा छूट गया, लेकिन मेरे पास न तो इतना पैसा है और न ही कोई बड़ा नेता मेरे पीछे है. मैं 26 महीने बाद छूटा हूं, केस अभी भी चल रहा है. सुप्रीम कोर्ट से मेरी बेल हुई है. इस के पीछे घरवालों की काफी मेहनत रही है. इस के अलावा मैं पहले बहुत ब्लंट था, सच अधिक बोल देता था. अब सच नहीं बोल सकते हो, तो झूठ भी मत बोलो, चुप रहो. इसी सिद्धांत पर चलने लगा हूं.”

मिली प्रेरणा

फिल्म इंडस्ट्री में आने की प्रेरणा के बारे में पूछे जाने पर एजाज कहते हैं, “कालेज में मुझे सभी कहते थे कि मैं अच्छा दिखता हूं, मेरी बौडी अच्छी दिखती है. कालेज के शो और थिएटर करते हुए इस क्षेत्र में आने की इच्छा जगी और ऐक्टिंग फील्ड में आ गया. यहां मैं ने एकता कपूर के शो से काम करना शुरू किया. बिग बौस में दूसरे नंबर पर था. फिर ‘खतरों के खिलाडी’ में भाग लिया. मैं ने विलेन के रूप में 28 फिल्में की हैं. साउथ के सभी बड़ेबड़े कलाकारों के साथ काम किया है. कैरियर बहुत अच्छा जा रहा था, तभी बीच में यह हादसा हो गया था. मेरा करीब ढाई से तीन साल का समय खराब हो गया.”

बिग बौस से मिला फायदा

बिग बौस में जाने से एजाज को बहुत फायदा मिला था. वे कहते हैं “मुझे उस रिऐलिटी शो में जाने से बहुत अधिक फायदा हुआ था, मेरी प्रसिद्धि बढ़ी, मेरे बैंक अकाउंट में वृद्धि हुई, लोगों का प्यार मिलने लगा, बड़ेबड़े इवैंट्स मिलने लगे. सफलता मिलने पर उसे संभालना बहुत आवश्यक होता है, जिसे सभी नहीं कर पाते.”
बिग बौस में फेवरिज्म के बारे में एजाज कहते हैं, “ऐसा कभी नहीं होता. फैन्स का प्यार, दर्शकों की वोटिंग और उस व्यक्ति के स्वभाव पर सब निर्भर करता है. मुनव्वर का जीतना बहुत सही था, उस ने बहुत अच्छा परफौर्मेंस दिया है.”

दर्शकों की पसंद को पकड़ना हुआ मुश्किल

फिल्म इंडस्ट्री बुरे दौर से गुजर रही है. इस की वजह आप क्या मानते हैं? इस सवाल के जवाब में वे कहते हैं, “दरअसल एक निर्देशक पूरी फिल्म को विजुअल कर सकता है. एक तरह की कहानी लगातार नहीं चल सकती. समाज में बुराइयां, हिंसा, चोरी, रेप आदि सब हो रहे हैं. साथ ही, देश को लूटा भी जा रहा है. निर्देशक हर तरह की स्टोरी कहना चाहता है और दर्शक की पसंद क्या है, इसे निर्देशक समझ नहीं पा रहे हैं, इसलिए फिल्में बन तो रही हैं, लेकिन चल नहीं रही हैं. एक जोनर की फिल्में चलने पर निर्माता, निर्देशक वैसी ही कई फिल्में बना लेते हैं और फिर वे चलती नहीं. साउथ के फिल्ममेकर दर्शकों की पसंद जानते हैं और उन की फिल्में चलती हैं. नई चीज सब को पसंद आती है.”

नहीं मिलता इंसाफ

एजाज कहते हैं, “मैं आगे निर्देशन में जाना चाहूंगा और जेल में मुझ पर जो बीती है, उस को मैं ने लिख लिया है और उसे फिल्म के रूप में सब को दिखाना चाहता हूं. वह एक अलग दुनिया है, वहां 20 प्रतिशत गुनाहगार और 80 प्रतिशत बेगुनाह होते हैं. उस दौरान उन के परिवार पर क्या बीतती है, वकील और जज उन्हें कैसे बेवकूफ बनाते हैं आदि सब मैं ने लिखा है. ‘तारीख पे तारीख’ के संवाद मैं ने बचपन में सुना था और अब मैं ने देख लिया है कि इंसाफ जल्दी नहीं मिलता, मिलती है तो सिर्फ तारीख.
“26 महीने तक मुझे सिर्फ तारीख ही मिली. अंत में मुझे इंसाफ मिला, जिसे मैं ने बड़ेबड़े वकील रख कर, काफी पैसे खर्च कर हासिल किया. ऐसे में गरीब व्यक्ति क्या कर सकेगा. वे जेल में सड़ रहे हैं और एक साल बाद उन के घर वाले भी उन्हें भूल जाते हैं. न्याय मिलने की देरी की बात की जाए तो इस की वजह जजों की कमी है. इस कमी से लाखों केस पैंडिंग पड़े रहते हैं. फास्ट केस सिर्फ नेताओं के चलते हैं, उन को न तो सजा होती है, न तो उन का कोई कुछ बिगाड़ सकता है.

Dashmi Movie Review: कहानी, ऐक्टिंग और डायरैक्शन में बेरंग फिल्म ‘दशमी’ (डेढ़ स्टार)

Dashmi Movie Review: आजकल हिंदी फिल्मों में धार्मिक शीर्षक रखने का ट्रैंड सा चल पड़ा है. फिल्म निर्मातानिर्देशकों को लगता है कि धार्मिक शीर्षक रखने से फिल्म के बारे में कंट्रोवर्सी पैदा होगी और दर्शकों में उत्सुकता जागेगी तो फिल्म अच्छी कमाई करेगी.

दूसरा यह कि आजकल हर फिल्म में धार्मिक पहचान, प्रतीक, संकेतों का जबरन इस्तेमाल करने का रिवाज सा चल पड़ा है. ऐसा फिल्म निर्माता इसलिए कर रहे हैं ताकि फिल्म गंभीर दिखाई दे और फिल्म में दिखाई गई कहानी को जस्टिफिकेशन मिल जाए.

‘दशमी’ फिल्म का शीर्षक भी यही सोच कर रखा गया है. दशमी को विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है. इस दिन रावण का संहार राम ने किया था. यह दिन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक बन गया.

‘दशमी’ फिल्म के जो पोस्टर लगाए गए हैं उन में राम, लक्ष्मण, सीता, रावण जैसे चरित्र दिखते हैं. होली से ठीक पहले रिलीज हुई इस फिल्म का विजयादशमी से कोई लेनादेना नहीं है. और न ही यह फिल्म दशहरे के त्योहार के बारे में है, न ही इस में रामचरित मानस वाले रावण की बात कही गई है.

इस में तो समाज के उन सारे रावणों को मारने की बात कही गई है जो मासूम बच्चियों को अपना शिकार बना कर उन का बलात्कार कर रहे हैं. ‘दशमी’ में एक नए रामराज्य को दिखाया गया है कि समाज में किस तरह नैतिक मूल्यों में गिरावट आ गई है. यह फिल्म समाज में होने वाले शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद करती है. इस में समाज में होने वाले यौनशोषण को दिखाया गया है.

समाज में घर कर चुकी बुराइयों को अंजाम देने वाले बुरे लोगों को चुनचुन कर मारने का सबक सिखाने का काम वैसे तो पुलिस प्रशासन का होता है मगर पुलिस और प्रशासन की जगह यह काम कुछ लोग करने लगें तो ऐसे लोगों की सराहना तो होती ही है. इस तरह के अच्छे काम करने वाले लोगों की कहानियों पर कई फिल्में बन चुकी हैं और सराही गई हैं. इसीलिए इस तरह के लोगों के प्रति दर्शकों की सहानुभूति रहती है. फिल्मों में इस तरह के लोगों को देख कर मन करता है कि ये लोग पुलिस के हत्थे न चढ़ें क्योंकि इन्होंने बलात्कारियों का खात्मा कर समाज से बुराई को दूर किया है.

फिल्म की कहानी जानीपहचानी है. कहानी स्वयं निर्देशक शांतनु तांबे ने लिखी है. फिल्म का शीर्षक ‘दशमी’ विजयादशमी के दिन होने वाले क्लाइमैक्स के अनुसार है. कहानी कमजोर है. कहानी एक ऐसे प्रदेश की है जहां पुलिस महानिदेशक नहीं है. बस, एक कमिश्नर ही पूरे प्रदेश को संभाल रहा है. पुलिस का एसीपी, जो हीरो है, उस का अधिकारक्षेत्र तय नहीं है. शुरू में यह किरदार नायक का सा लगता है, लेकिन उस का काम करने का तरीका दर्शकों की नजरों में उसे खलनायक बना देता है.
कहानी बेरंग और क्राइम पैट्रोल जैसी है. प्रदेश में एकएक कर नामी लोग किडनैप हो रहे हैं, मौलाना, महंत, प्रोफैसर, डाक्टर, नेता, समाजसुधारक यानी ऐसे लोग जिन पर समाज का भला करने का जिम्मा है, गायब हो रहे हैं. इन सभी पर बलात्कार का आरोप लगाया गया. हालांकि, ये लोग या तो जेल से छूट गए या इन्हें जमानत मिल गई.
इन में से एक का वीडियो सोशल मीडिया पर आता है, जिस में वह खुद पर लगे रेप के आरोप को कबूल करता है. उस के बाद एक के बाद एक वीडियो आते हैं. कौन कर रहा है यह? कल दशमी के दिन ऐसा क्या होने वाला है जिसे लाइव देखने के लिए कहा जा रहा है?

इंजीनियरिंग कालेज के कुछ छात्र इन बलात्कारियों को दशहरे के दिन जिंदा जला देने की योजना बनाते हैं. इन में वर्धन पुरी और गौरव सरीन मुख्य हैं. ये बारबार बलात्कार की पीड़ितों की पहचान वीडियो में उजागर करते रहते हैं. ये पढ़ेलिखे युवा क्यों यह सब कर रहे हैं, इस की वजह फिल्म के दूसरे हिस्से में उजागर होती है.

क्लाइमैक्स में रामलीला मंचन का सीन है जहां दशमी वाले दिन रावण को जलाया जाता है, साथ ही, बलात्कारियों को जलाया जाता है. मंच पर राम, लक्ष्मण और सीता द्वारा खूब भाषणबाजी की गई है. इसलिए यह क्लाइमैक्स काफी लंबा भी हो गया है जो उबाता भी है.

भले ही राममंदिर बन गया हो, लोगों को धर्म की ओर प्रेरित किए जाने का जबरन प्रयास हो, लेकिन बलात्कारियों की मानसिकता तो अपना मकसद पूरा करना होता है. फिल्म में अदालत से जमानत पाए मुलजिमों को उठाने और उन से गुनाह कबूलवाने का वीडियो दिखाया जाना यह सिद्ध करता है कि बलात्कारियों को न तो रामराज्य का भय है न राममंदिर की जयजयकार करती जनता का.

फिल्म लौजिकली करैक्ट साउंड नहीं करती. कुछकुछ साउथ फिल्म ‘अपरिचित’ जैसी सी महसूस होती है जिस में अन्याय करने वालों को कानून तोड़ते हुए सजा दी जाती है. भारत में जस्टिस सिस्टम इतना लचर है कि ऐसे कानून तोड़ कर दी जाने वाली सजाओं को दर्शक मजे से देखते हैं. ऐसी लचर फिल्में बौलीवुड में खूब बन चुकी हैं. इस के इतर फिल्म के अंत में ‘जय श्री राम’ के नारे जबरन ठूंसे गए लगते हैं. ऐसा कर फिल्म, बस, मौजूदा धार्मिक माहौल को ही भुनाने का काम करती है.

फिल्म के शीर्षक को और मजबूती से सत्यापित करने के लिए निर्देशक एक दशमी नाम की बच्ची को भी फिल्म में ले आया है. अभिनय के मामले में फिल्म काफी कमजोर है. एसीपी की भूमिका में आदिल खान अपने मातहतों की तफतीश करने के अलावा कुछ नहीं करता. बच्ची के किरदार में खुशी हजारे का काम अच्छा है. खराब बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म की सब से बड़ी कमजोरी है. तकनीकी दृष्टि से भी फिल्म कमजोर है. सिनेमेटोग्राफी और संपादन में भी फिल्म प्रभावित नहीं करती.

नौकरी को तरसते युवा, क्या रामधुन से दूर होगी बढ़ती बेरोजगारी ?

* 4-5 साल सरकारी नौकरी पाने के लिए इंतजार करना पड़ता है.
* 2 से 3 लाख रुपए शिक्षा और पुलिस विभाग में भरती के लिए कोचिंग खर्च आता है.
* सिपाही को 21 हजार, शिक्षक को 40 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन मिलता है.
* डाक्टरी और इंजीनियरिंग से ज्यादा कोचिंग संस्थान हैं सिपाही और शिक्षक के लिए.

उत्तर प्रदेश में पुलिस सिपाही की भरती के 60,244 पदों के लिए 48 लाख से ज्यादा अभ्यर्थियों ने आवदेन किया था. 43 लाख अभ्यर्थियों ने परीक्षा दी. इस के बाद पेपर लीक हो गया और परीक्षा निरस्त कर दी गई. अब 6 माह के बाद परीक्षा होगी. सरकार चुनाव के पहले सिपाही की भरती कर के वाहवाही करवाना चाहती थी. विपक्षी पेपर लीक को चुनावी मुद्दा बनाना चाहते हैं. चुनाव में इस का प्रभाव कम करने के लिए योगी सरकार अपनी तरफ से प्रयास कर रही है पाप और पुण्य का हिसाब रखने वाली सरकार के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने कहा कि ‘युवाओं के साथ अन्याय राष्ट्रीय पाप के समान है.’

पुलिस भरती परीक्षा को सही तरह से आयोजित कराने के लिए योगी सरकार ने बड़ेबड़े दावे किए थे. इस के बाद भी पेपर लीक हो गया. सरकार ने पहले तो पेपर लीक की बात मानी नहीं. पेपर लीक के प्रमाण सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे और प्रयागराज व लखनऊ में अभ्यर्थियों ने धरना देना शुरू किया. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपनी भारत जोड़ो न्याय यात्रा में पेपर लीक का सवाल उठा दिया.

गए थे सिपाही बनने, जाना पड़ा जेल

युवाओं को उन का समर्थन मिलते देख सरकार ने पूरे मामले की लीपापोती शुरू कर दी. सिपाही परीक्षा को रद्द कर दिया. जांच में अभ्यर्थी सत्य अमन कुमार ने पुलिस से पूछताछ में कबूला कि उस के दोस्त नीरज ने व्हाट्सऐप पर उसे परीक्षा से पहले ही पेपर भेज दिया था जिस की पर्ची उस ने तैयार की थी. पुलिस ने पूछताछ के बाद अभ्यर्थी को गिरफ्तार कर जेल भेजा दिया है.

लखनऊ में पकड़े गए एक अभ्यर्थी से बरामद नकल की पर्ची के आधार पर उत्तर प्रदेश पुलिस के इंस्पैक्टर रैंक के अधिकारी ने एफआईआर दर्ज करवाई. खास बात यह है कि दर्ज कराई गई तहरीर में लिखा गया कि सुनियोजित ढंग से पेपर लीक किया गया जो अपराध की श्रेणी में आता है.

भरती परीक्षा में 17 और 18 फरवरी की दूसरी शिफ्ट का पेपर लीक हुआ था. 18 फरवरी की शाम 3 से 5 की पाली में हुए प्रश्नपत्र तमाम अभ्यर्थियों के पास और कोचिंग टीचर्स के पास पहले ही पहुंच गए थे, जिसे ले कर शिक्षकों ने सोशल मीडिया पर उसी समय पोस्ट भी लिखी कि पेपर लीक होने की बातें सामने आ रही हैं.

लखनऊ में सिटी मौडर्न एकेडमी अलीपुर में परीक्षा दे रहे अभ्यर्थी सत्य अमन कुमार के पास से हाथ से लिखी हुई नकल की पर्ची मिली थी. ड्यूटी के ल करदौरान नकते पकड़े गए अमन कुमार से हाथ से लिखे सवाल की पर्ची बरामद हुई तो ड्यूटी पर तैनात पुलिस टीम को बुलाया गया. उस के बाद मोहनलालगंज मे तैनात इंस्पैक्टर रामबाबू सिंह ने परीक्षा अधिनियम में केस दर्ज करवा दिया. इंस्पैक्टर ने अपनी तहरीर में अभ्यर्थी अमन कुमार से मिली हरेक पर्ची का जिक्र किया है. हाथ से लिखी पर्ची और उन पर लिखे सवालों के जवाब को तहरीर में बताया गया.

दर्ज कराई गई एफआईआर की तहरीर में यूपी पुलिस के इंस्पैक्टर ने लिखा कि हस्तलिखित प्रश्नपत्र, जो परीक्षार्थी के मोबाइल पर आया है, का मिलान परीक्षार्थी के ओरिजिनल क्वेश्चन पेपर से किया गया तो प्रश्न संख्या अलगअलग पाई गईं लेकिन प्रश्न सभी मैच कर रहे हैं. इस प्रकार सुनियोजित तरीके से प्रश्न लीक किया गया जो अपराध की श्रेणी में आता है. अब सैकड़ों लोग जांच व मुकदमे के दायरे में आएंगे. जो सिपाही बनने गए थे, वे अब जेल भेजे जा सकते हैं.

रोब और ऊपरी कमाई

आज भी गांव और कसबों के रहने वालों में पुलिस और सिपाही का बड़ा क्रेज है. भले ही ऊपरी कमाई हर सिपाही न कर पता हो पर रोब और दंबग छवि तो उस की रहती ही है. गांव और कसबे के रहने वाले युवा लड़केलड़कियां शारीरिक रूप से मजबूत होते हैं. वे शिक्षक भरती में भले ही नियुक्त न हो पाएं पर सिपाही भरती में नौकरी पा जाते हैं. ऐसे में करीब 21 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन वाली इस नौकरी के लिए युवाओं का क्रेज देखने वाला होता है.

इस भरती में खुद को बेहतर साबित कर नौकरी हासिल करने लिए लिखित परीक्षा के बाद शारीरिक योग्यता को देखा जाता है. इस का मतलब यह है कि युवाओं को सिपाही में भरती के लिए 2 तरह की तैयारी करनी पड़ती है. पहले तो लिखित परीक्षा को पास करने की चुनौती, उस के बाद शारीरिक योग्यता के लिए फिटनैस की तैयारी. इन दोनों ही तरह की तैयारी के लिए कोचिग संस्थाएं खुली हुई हैं, जो सिपाही-दरोगा की भरती की तैयारी कराने का दावा करती हैं.

तमाम युवा लड़केलड़कियां अब पुलिस में भरती को प्राथमिकता देने लगे हैं. इस की वजह यह है कि सब से अधिक सरकारी नौकरियां 2 ही क्षेत्रों- शिक्षक और पुलिस- में हैं. आईएएस और पीसीएस के बाद सब से अधिक कोचिंग संस्थाएं पुलिस और शिक्षा विभाग की नौकरियों के लिए चल रही हैं. उत्तर प्रदेश में डेढ़ लाख से अधिक को पुलिस में नौकरी दी गई है. शिक्षा विभाग में 69 हजार शिक्षकों की भरती हो चुकी है. अभी 2 लाख भरती होने वाली है. यह बात और है कि सरकारी नौकरी पाने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं. तैयारी से ले कर भरती तक 4 से 5 साल का इंतजार करना पड़ता है.

बढ़ती बेरोजगारी

युवा लड़केलड़कियां कम वेतन में भी काम करने को तैयार हैं. इस की सब से बड़ी वजह प्रदेश में बढ़ती बेरोजगारी है. योगी सरकार 2017 से लगातार उत्तर प्रदेश में निवेश की बात करती रही है. कई ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी हो चुकी हैं. इन के आयोजन पर करोड़ों रुपए करोड़ खर्च किए गए हैं. इन आयोजन के बाद प्रदेश में एक भी बड़ी कंपनी नहीं आई जिस ने युवाओं को नौकरी दी हो. यह बात और है कि प्रदेश में राममंदिर बन गया. सरकार को पता है कि वोट बेरोजगारी दूर करने से नहीं, राममंदिर बनवाने से मिलेंगे, इसलिए वह फैक्ट्री लगवाने की जगह मंदिर बनाने का काम कर रही है. ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी जैसे आयोजन जनता को भरमाने के लिए हैं कि सरकार उन को रोजगार देने के लिए काम कर रही है.

अगर युवाओं को रोजगार मिल रहा होता तो सिपाही जैसी परीक्षा में इतनी बड़ी संख्या में युवा हिस्सा न लेते. सिपाही ही नहीं, जब 10वीं पास चपरासी की नौकरी के लिए आवेदन मांगे गए तो पीएचडी डिग्री वालों ने भी आवेदन किया था. सरकार ने चपरासी के 62 पदों के लिए आवेदन मांगे तो 50 हजार ग्रेजुएट, 28 हजार पोस्टग्रेजुएट, 37 सौ पीएचडीधारक युवकों ने आवेदन किए थे. कुल आवेदन करने वालों की संख्या 93 हजार थी. इन में चपरासी की योग्यता रखने वाले 5 वीं से 12 वीं पास करने वालों की संख्या केवल 7,400 थी.

अगर चपरासी के लिए इतनी योग्यता रखने वालों ने आवेदन किया तो मामला साफ है कि बेरोजगारी चरम पर है. सरकार केवल मंदिर बनवा कर वोट लेने के काम कर रही है. मंदिर में हर किसी को पुजारी की नौकरी नहीं मिलती. ऐसे में बेरोजगार मंदिर के बाहर भीख मांग कर ही अपनी बेरोजगारी दूर कर सकते हैं या रिकशा चला कर काम कर सकते हैं या फिर चायपकौड़ा बेच सकते हैं. चपरासी या सिपाही की सरकारी नौकरी का सपना युवा इसलिए देखते हैं क्योंकि इस से बेहतर उन के पास कुछ है नहीं.

न नौकरी न वेतन तो क्या करें युवा

पहले जिन युवाओं को सरकारी नौकरी नहीं मिलती थी, वे प्राइवेट नौकरी कर लेते थे. अब कुछ सालों में सरकारी और प्राइवेट नौकरी के वेतन में जमीनआसमान का फर्क आ गया है. सिपाही को जहां 21 हजार रुपए प्रतिमाह और समाज पर रोब गांठने को मिलता है वहीं नौर्मल सिक्योरिटी के रूप में काम करने वाले को 8 से 10 हजार रुपए ही मिलते हैं. इस में भी केवल 11 माह का मिलता है. दूसरों को सिक्योरिटी देने वाले की जौब सिक्योर नहीं होती है.

सरकारी टीचर को 40 हजार रुपए शुरुआत मे वेतन मिलता है. प्राइवेट स्कूलों में टीचर का वेतन 12 से 15 हजार रुपए ही होता है. जौब सिक्योरिटी, प्रमोशन और वेतन में वृद्धि सपना जैसा होता है. कोविड जैसी महामारी का प्रभाव सब से अधिक प्राइवेट जौब करने वालों पर पड़ा. प्राइवेट सैक्टर समाज से कमाता है लेकिन जब मुसीबत आई तो सब से पहले हाथ खड़े कर के लोगों को जौब से निकाल दिया. वेतन में कटौती की. कई हजार शिक्षक स्कूलों से बाहर हो गए थे.

वेतन असमानता बड़ा कारण

सरकारी नौकरी में वेतन कमज्यादा जो भी है, जौब सिक्योरिटी रहती है. प्रमोशन भी मिल जाता है. ऐसे में युवा छोटी से छोटी नौकरी करने को तैयार रहते हैं. भले ही इस के लिए उन को रिश्वत देनी पड़े या परीक्षा की तैयारी में लाखों खर्च करने पड़ें. बड़ी संख्या में युवा डिलीवरी बौय के रूप में काम करते हैं. उन की जिदंगी सड़क पर चाय बेचने वाले से बुरी है. सरकार केवल रामधुन गा कर वोट ले रही है उसे बेरोजगारों की चिंता नहीं है. किस तरह से महंगी शिक्षा दिला कर पेरैंट्स बच्चों को पढ़ाते हैं, उस के बाद भी जब उन को अपना भविष्य नहीं दिखता, तो डिप्रैशन में आ कर वे आत्महत्या कर लेते हैं.

सरकार और निजी क्षेत्र दोनों ही अपने मुनाफे की देखते हैं. नौकरी करने वाले के भविष्य की चिंता किसी को नहीं होती. नौकरियों के वेतन में असमानता के कारण ही सिपाही और चपरासी जैसी नौकरियों के लिए योग्यता से अधिक वाले उम्मीदवार लाइन में खड़े होते हैं. जैसे समाज में अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती जा रही है वैसे ही वेतन की असमानता भी है जो युवाओं के सपनों पर कुठाराघात करती है.

World Protein Day 2024: आप भी लेते हैं ज्यादा प्रोटीन पाउडर, तो हो सकते हैं कई बड़े नुकसान

World Protein Day 2024: फिट रहना कितना जरूरी है, कोरोना ने यह सबक बखूबी समझाया है. अब लोग फिटनैस को ले कर बहुत ज्यादा जागरूक हो गए हैं. हैल्दी लाइफस्टाइल, हैल्दी डाइट, जिम जाना जैसी चीज़ों को युवा लड़केलडकियां सीरियसली फौलो कर रहे हैं. अधेड़ उम्र के लोग भी अब पार्कों के ओपन जिम में नज़र आने लगे हैं. फिटनैस के प्रति युवाओं की बढ़ती रुचि के चलते ही शहरों में जिम की संख्या स्कूलकालेजों की संख्या से अधिक हो गई है. अनेक शहरों में हर गलीमोहल्ले में जिम खुले हुए हैं, जहां बड़ी संख्या में युवा वर्जिश के लिए आ रहे हैं. इन में से मात्र 25 फ़ीसदी जिम ही रजिस्टर्ड होते हैं. ज्यादातर में अनट्रेंड कोच भरे हुए हैं. वही आप को वर्जिश का अधकचरा तरीका सिखा रहे हैं और वही जल्दी से जल्दी मसल्स बनाने के लिए विभिन्न प्रकार की दवाएं व पाउडर का घोल पीने की सलाह दे रहे हैं.

मसल्स बनाने के लिए आजकल युवाओं में होड़ मची हुई है. मसल्स बनाने के लिए जब युवा जिम जाता है तो जिम ट्रेनर सब से पहले प्रोटीन रिच डाइट लेने की सलाह देते हैं और प्रोटीन पाउडर का डब्बा उन्हें पकड़ा देते हैं. पहले कोई 4 या 5 कंपनियां प्रोटीन पाउडर बेचती थीं. यह पाउडर डाक्टर की सलाह पर कैमिस्ट शौप से खरीदे जाते थे, मगर आज बाज़ार में 20 से अधिक कंपनियों के प्रोटीन पाउडर बिक रहे हैं और इन के सेल्स मैनेजर जिम और योगा इंस्टिटूट्स तक पूरा जाल बिछा चुके हैं. देशभर के जिमों में आज प्रोटीन पाउडर बिक रहे हैं जो युवाओं की सेहत बनाने की जगह बिगाड़ रहे हैं. इंदौर जैसे शहर में 500 से अधिक जिम और 20 से ज्यादा दुकानों से प्रतिदिन 4 लाख रुपए का प्रोटीन पाउडर बेचा जा रहा है. 6 साल में इस की बिक्री 25 प्रतिशत बढ़ गई है. दाम भी तीनगुना अधिक हो गए हैं. 5 किलो प्रोटीन पाउडर के डब्बे का दाम करीब 14,500 रुपए है.

प्रोटीन पाउडर पीपी कर आज बड़ी संख्या में युवा किडनी की बीमारी और हाई ब्लडप्रैशर का शिकार हो रहे हैं. कम उम्र में ही दिल की बीमारी और अन्य साइड इफैक्ट भी सामने आ रहे हैं और इस की वजह है वह प्रोटीन शेक, जो बिना डाक्टरी सलाह के लिया जा रहा है. 80 प्रतिशत से ज्यादा जिम ट्रेनर सुडौल शरीर बनाने के नाम पर लोगों को बिना डाक्टरी सलाह के प्रोटीन पाउडर पिला रहे हैं. इस के साइड इफैक्ट के रूप में कई गंभीर बीमारियां हो रही हैं. किडनी रोग विशेषज्ञ डा. राजेश भराणी के मुताबिक, प्रोटीन व अन्य फूड सप्लीमैंट का ज्यादा उपयोग करने से लोगों में किडनी से संबंधित परेशानियां हो रही हैं. किडनी से संबंधित मरीजों में 2 से 3 प्रतिशत जिम जाने वाले हैं. कई मामलों में 8 से 10 साल बाद जब दुष्परिणाम सामने आते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. इस के अलावा प्रोटीन पाउडर के ज्यादा सेवन से थकान, सिरदर्द, जी मिचलाना जैसे साइड इफैक्ट्स देखने को मिल रहे हैं. आर्टिफिशियल प्रोटीन लेने से ब्लडप्रैशर लैवल एकदम से बढ़ जाता है जिस की वजह से कार्डियक अरेस्ट, हार्ट पल्पिटेशंस की समस्या भी सामने आ रही है.

आजकल हर युवा मसल्स बनाने में लगा हुआ है. इस के लिए वह हैल्दी और नेचुरल प्रोटीन का सेवन करने से ज्यादा प्रोटीन पाउडर पर भरोसा कर रहा है. ज्यादातर प्रोटीन पाउडर को दूध से तैयार किया जाता है. दूध में लैक्टोज होता है, जो एक नेचुरल शुगर का प्रकार है. जो लोग लैक्टोज को नहीं पचा पाते हैं उन का पाचनतंत्र प्रोटीन को भी नहीं पचा पाता. इस से गैस और ब्लौटिंग की प्रौब्लम होती है. ऐसे ही अगर सोया पर आधारित प्रोटीन का सेवन ज्यादा दिन तक करते रहें तो हार्मोन प्रभावित हो जाते हैं क्योंकि सोया में फाइटोएस्ट्रोजन होते हैं. यह शरीर में एस्ट्रोजन रिलीज करता है, जिस से हार्मोन असंतुलित होते हैं. फाइटोएस्ट्रोजन ब्रेस्ट कैंसर के ट्यूमर का विकास करता है. वर्कआउट के बाद प्रोटीन पाउडर लेने से इंसुलिन में बढ़ोतरी होती है. इस तरह नियमित रूप से इंसुलिन में होने वाली यह एकाएक बढ़ोतरी आगे के लिए नुकसानदायक हो सकती है.

बाजार में कई प्रकार के प्रोटीन पाउडर बिक रहे हैं. कैसीन, व्हे प्रोटीन जैसे प्रोटीन पाउडर में चीनी, आर्टिफिशियल स्वीटनर, विटामिन, मिनरल आदि मिलाए जाते हैं. मार्केट में मिलने वाले प्रोटीन पाउडर के एक स्कूप में 10 से 30 ग्राम तक प्रोटीन हो सकता है. कुछ पाउडर में घातक धातुएं भी मिलाई जाती हैं. क्लीन लेबल प्रोजैक्ट नामक एक नौनप्रोफिट ग्रुप ने प्रोटीन पाउडर में विषैले पदार्थ के बारे में 3 साल पहले एक रिपोर्ट जारी की थी. रिसर्चर्स ने 134 प्रोटीन पाउडर प्रोडक्ट की जांच की थी और पाया कि उन प्रोडक्ट्स में 130 प्रकार के विषैले पदार्थ थे. इस रिपोर्ट के मुताबिक, कई प्रोटीन पाउडर में भारी मात्रा में धातु (सीसा, आर्सेनिक, कैडमियम और पारा), बिस्फेनौल ए (इस का प्रयोग प्लास्टिक बनाने के लिए किया जाता है), कीटनाशक और अन्य खतरनाक कैमिकल होते हैं. इन कैमिकल्स से कैंसर और अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. प्रोटीन पाउडर में कुछ विषैले पदार्थ काफी मात्रा में मौजूद थे. उदाहरण के लिए एक प्रोटीन पाउडर में बीपीए की सीमा बताई गई सीमा से 25 गुना अधिक थी. हालांकि, सभी प्रोटीन पाउडर में विषैले पदार्थ की अधिक मात्रा नहीं थी.

न्यूट्रिशनिस्ट डा. नीना बहल कहती हैं कि जिम जाने वाले युवाओं को हमेशा कैमिकल-फ्री प्रोटीन पाउडर ही लेना चाहिए. लेकिन इस बात का खास ध्यान रखें कि डाक्टर या एक्सपर्ट की सलाह के बिना कोई भी सप्लीमैंट यूज न करें. लेकिन फिर भी मेरी सलाह यही है कि प्रोटीन सप्लीमैंट की अपेक्षा प्रोटीन वाले फूड अंडा, नट्स, मीट, दही, दाल, बीन्स, मछली, पनीर आदि का सेवन ज़्यादा ठीक है बजाय प्रोटीन पाउडर के. इन खाद्य पदार्थों से शरीर अपनी आवश्यकतानुसार प्रोटीन एब्जौर्ब कर लेता है. शरीर में प्रोटीन की अधिक मात्रा यूरिक एसिड की समस्या पैदा करती है जो आगे जा कर किडनी खराब कर देता है, साथ ही, आर्थराइटिस की ऐसी समस्या पैदा हो जाती है कि दर्द के कारण इंसान का चलनाफिरना भी बंद हो जाता है.

मेरे बौयफ्रैंड का भाई मुझसे प्यार करता है, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं 18 वर्षीय युवती हूं और अपने बौयफ्रैंड से बहुत प्यार करती हूं. वह भी मुझे प्यार करता है. हम ने एक मुंहबोला भाई बना रखा है जिस से बौयफ्रैंड को लगा कि हम उसे धोखा दे रहे हैं अत: हमारा ब्रेकअप हो गया. भाई मेरी हैल्प भी करता है, लेकिन अब यह बात हो रही है कि बौयफ्रैंड का भाई भी मुझ से प्यार करने लगा है. मैं क्या करूं?

जवाब

भई, आप अपने बौयफ्रैंड से ब्रेकअप के बाद उस के भाई के प्यार में पड़ी हैं या अपने खोए प्यार को वापस पाना चाहती हैं. खैर, अगर आप का बौयफ्रैंड से मुंहबोले भाई के कारण रिश्ता टूटा तो गलती आप की भी है. आप को अपने मुंहबोले भाई और बौयफ्रैंड को आपस में मिलाना चाहिए था ताकि ऐसी गलतफहमी पैदा ही न हो. उधर आप के बौयफ्रैंड को भी शक नहीं करना चाहिए. जब आप एकदूसरे से प्रेम करते हैं तो दुनिया थोड़ा छोड़ देते हैं, सब से मिलतेजुलते भी हैं.

खैर, अभी भी देर नहीं हुई. अपने बौयफ्रैंड से मिल कर सब सचसच बताइए और अपने मुंहबोले भाई से भी मिलवाइए. आप का भाई भी उसे बताए कि मैं भाई हूं इस का, गलत मतलब न समझें. इस से आप के बौयफ्रैंड का शक दूर हो जाएगा.

हां, इस के चलते कहीं बौयफ्रैंड के भाई से भी नयनमटक्का न शुरू कर दीजिएगा, कहीं प्रेम का एक नया त्रिकोण ही न खड़ा हो जाए.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

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सेहत की अनदेखी न करें महिलाएं

23 साल की क्षितिजा को कई दिनों से यूरिन में जलन जैसा अनुभव हो रहा था. कमर के निचले हिस्से में भी काफी दर्द रहने लगा तो उसे लगा, हो सकता है ज्यादा देर तक बैठे रहने के कारण ऐसा हो रहा हो. सोचा, दवाई खाएगी तो ठीक हो जाएगी. मगर दवाई खाने से भी कोई फायदा न हुआ. बल्कि, दर्द और बढ़ता चला गया. अपनी मां को फोन कर बताया, उन्होंने उसे एक बार जा कर डाक्टर से दिखा आने को कहा. लेकिन वह बेकार में डाक्टर के चक्करों में नहीं पड़ना चाहती थी. जब बुखार और उलटियां शुरू हो गईं तो वह अपने एक दोस्त के साथ डाक्टर को दिखाने चली गई.

जहां जांचने के बाद डाक्टर ने उसे कई तरह के टैस्ट बताए. टैस्ट करा कर घर तो आ गई लेकिन एक अनजाने डर को ले कर उस के हाथपांव फूलने लगे कि आखिर डाक्टर ने इतने सारे टैस्ट क्यों बता दिए.

इस से पहले वह कभी डाक्टर के पास नहीं गई थी क्योंकि जरूरत ही नहीं पड़ी. थोड़ीबहुत सर्दीखांसी या सिरदर्द होता तो दवाई खा कर ठीक हो जाती थी. इस बार भी उसे ऐसा ही लगा कि दवाई खा कर ठीक हो जाएगी. मगर जब तबीयत ज्यादा खराब हो गई तो उसे डाक्टर के पास जाना ही पड़ा.

रिपोर्ट देख कर डाक्टर ने बताया कि उसे (यूटीआई) यूरिन इन्फैक्शन हुआ है और मर्ज को टालते रहने के कारण इन्फैक्शन किडनी तक पहुंच चुका है. इसलिए उसे पानी चढ़ाना पड़ेगा. अस्पताल में कम से कम उसे 7 दिन भरती रहना पड़ेगा. यह सुन कर क्षितिजा के पेरैंट्स भी परेशान हो गए क्योंकि यहां वह अकेली रहती है. कौन देखभाल करेगा उस की. क्षितिजा भी बस रोए जा रही थी कि अब क्या होगा उस का. यहां तो कोई देखभाल भी नहीं करने वाला और खुद से उठ कर वह एक गिलास पानी पीने की भी स्थिति में नहीं है. उस के पेरैंट्स करीब 400 किलोमीटर दूर रहते हैं. ऐसे में उन का यहां तुरंत आना संभव न था.

क्षितिजा अहमदाबाद में रह कर प्राइवेट जौब के साथसाथ सरकारी नौकरी की तैयारी भी कर रही है. उस के पेरैंट्स भुज में रहते हैं. क्षितिजा के पापा बैंक अधिकारी हैं. हर दोतीन साल में उन का तबादला एक शहर से दूसरे शहर होता रहता है. ऐसे में पढ़ाई और कैरियर के कारण उसे अपने पेरैंट्स से दूर रहना पड़ता है. लेकिन ऐसे समय में उसे नहीं पता कि कब क्या करना चाहिए या खुद का सही से ध्यान कैसे रखा जाए.

खैर, उस के पेरैंट्स गाड़ी से आ कर उसे घर ले आए, जहां उस का इलाज चला. तीनचार दिन अस्पताल में भरती रहने के बाद उस की तबीयत में धीरेधीरे सुधार होने लगा. क्षितिजा के इलाज में करीब 10 से 12 हजार रुपए का खर्च आया. डाक्टर आनंद चौधरी, जिन्होंने क्षितिजा का इलाज किया, का कहना है कि वैसे तो यूरिन इन्फैक्शन किसी को भी हो सकता है लेकिन टीनएज के बाद से ही लड़कियों में यूरिन इन्फैक्शन का खतरा अधिक बढ़ जाता है.

यूरिन इन्फैक्शन होने के कई कारण हैं जैसे-

सैक्स के दौरान जब कीटाणु युरेथ्रा में चला जाए.

पब्लिक या गंदा टौयलेट इस्तेमाल करने से भी इस इन्फैक्शन का खतरा हो सकता है.

जेनिटल्स को गंदे हाथों से छूने या फिर ज्यादा देर तक यूरिन को रोके रखने पर भी यूरिन इन्फैक्शन होने का खतरा हो सकता है.

मासिकधर्म के दौरान पैड को जल्दी न बदलना या उस का गीलापन भी यूरिन इन्फैक्शन बढ़ा सकता है.

32 साल की शिखा चौथे स्टेज के ‘एंडोमिट्रियोसिस’ से जू?ा रही है. यह ऐसी बीमारी है जिस के बारे में महिलाओं को बहुत कम जानकारी है और इस बारे में बात भी बहुत कम होती है. टीवी के पौपुलर फेसेस में से एक सुमोना चक्रवर्ती के एक खुलासे से लोगों को इस बीमारी के बारे में पता चला तो इस की चर्चा होने लगी. इस से पहले पुरुषप्रधान भारत देश में महिलाओं की समस्याओं के बारे में कम ही खुल कर बात की जाती थी.

एंडोमिट्रियोसिस सोसायटी औफ इंडिया के मुताबिक, देश में 3 करोड़ से अधिक महिलाएं एंडोमिट्रियोसिस से पीडि़त हैं. पीरियड के दौरान महिलाएं भयंकर दर्द से पीडि़त होती हैं. लेकिन वे चुपचाप यह दर्द सह रही होती हैं. अमेरिका में भी हर 10वीं महिला एंडोमिट्रियोसिस से पीडि़त है.

देशदुनिया में इन दिनों पीरियड्स लीव का मुद्दा जोर पकड़ रहा है. देशभर में माहवारी छुट्टी लागू करने को ले कर यह बहस छिड़ी हुई है कि क्या ऐसी छुट्टी देना सभी संस्थानों, प्रतिष्ठानों, कंपनियों को मंजूर होगा. देश में महिला सशक्तीकरण की बातें करने वालों का बड़ा तबका भी ऐसी छुट्टी का विरोध कर रहा है.

बता दें कि दुनियाभर में अकेले एशिया महाद्वीप के करीब 60 फीसदी देशों में कामकाजी महिलाओं को एक से तीन दिन की सवैतनिक पीरियड्स लीव दी जाती है. यूरोप में इटली पहला ऐसा देश है जहां माहवारी में पेड लीव का नियम है. आस्ट्रेलिया की कुछ कंपनियां भी पेड लीव दे रही हैं.

क्या है एंडोमिट्रियोसिस बीमारी

एंडोमिट्रियोसिस गर्भाशय में होने वाली ऐसी बीमारी है जो महिलाओं की प्रजनन क्षमता को प्रभावित करती है. इस बीमारी में गर्भाशय के आसपास की कोशिकाएं और ऊत्तक (टिशू) शरीर के दूसरे हिस्सों में फैल जाते हैं, जो सामान्य नहीं है. यह बीमारी आमतौर पर किशोर और युवा महिलाओं में ज्यादा देखने को मिलती है.

शिखा 25 की उम्र में अपनी बीमारी को ले कर डाक्टर के पास पहुंची तो डाक्टर ने उसे पहले स्टेज का एंडोमिट्रियोसिस बताते हुए कहा कि उसे शादी और बच्चे में देर नहीं करनी चाहिए.

दरअसल, एंडोमिट्रियोसिस के मरीज को जब पीरियड्स होते हैं तो खून गर्भाशय के बाहर गिर कर इकट्ठा होने लगता है. इस खून की वजह से सिस्ट या गांठें बढ़ने लगती हैं. साथ ही, तकलीफें भी बढ़ने लगती है. चूंकि गर्भावस्था के दौरान 9 महीने तक महिला को मासिकधर्म नहीं आता, इसलिए खून न मिलने की वजह से गांठें बढ़नी बंद हो जाती हैं. इस स्थिति में औपरेशन कर के इन्हें निकाला जा सकता है.

यह जरूरी नहीं है कि मां बनने के बाद इस तकलीफ से नजात मिल जाए बल्कि कई बार परेशानी जस की तस बनी रहती है या बढ़ भी जाती है. शिखा का हार्मोनल ट्रीटमैंट चल रहा है. लेकिन भारतीय डाक्टर को भी औरतों के मां बनने की चिंता पहले होती है और उन की तकलीफों की बाद में.

भारतीय समाज में औरतों के स्वास्थ्य को गंभीरता से नहीं लिया जाता. उन से उम्मीद की जाती है कि वे दर्द को बरदाश्त करें. लड़की पीरियड्स के दर्द से कराह रही होती है तो कहा जाता है कि यह दर्द तो कुछ भी नहीं, अभी तो उसे मां बनना है. लेकिन अफसोस तो इस बात का है कि खुद महिलाएं भी अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देतीं और अपनी बीमारी को टालती रहती हैं.

52 साल की सुमन एक स्कूल टीचर हैं. उन का मीनोपोज हुए 2 साल से ऊपर हो चुका है. लेकिन इधर कई दिनों से उन के यूरिन से ब्लड आने लगा तो वे सम?ा नहीं पाईं कि ऐसा क्यों हो रहा है क्योंकि मासिकधर्म छूटे तो सालों हो गए. ?ि?ाकते हुए उन्होंने यह बात अपनी एक दोस्त, जोकि उसी स्कूल में टीचर हैं, को बताई. वह हैरान रह गई. उस ने तुरंत उसे डाक्टर के पास जा कर दिखाने की सलाह दी और कहा कि सेहत के प्रति इतनी लापरवाही ठीक नहीं. घरबाहर की जिम्मेदारियों के चलते उसे डाक्टर से दिखाने का समय ही नहीं मिला.

यूरिन से ब्लड आना रुक गया तो लगा अब सब ठीक है. यह भी लगा कि शायद ज्यादा गरमी की वजह से या तलाभुना खाने के कारण ऐसा हुआ होगा. इसलिए डाक्टर को दिखाने की कोई जरूरत नहीं है. बेकार में 10 तरह के टैस्ट बता कर और परेशान कर देंगे वे. घरपरिवार और नौकरी में अपनी सेहत को सब से पीछे रखने वाली सुमन की समस्या तब बढ़ गई जब फिर से उसे यूरिन से ब्लड आने लगा.

डाक्टरी जांच से पता चला कि सुमन के यूरिनरी पैसेज के रास्ते में पथरी हो गई है. शुक्र था कि सुमन को कोई बड़ी समस्या नहीं निकली और इलाज के बाद वह ठीक हो गई. इलाज में यही कोई 6-7 हजार रुपए लगे. लेकिन डाक्टर का कहना था कि यूरिन से ब्लड आना खतरे का संकेत भी हो सकता है.

जब कभी ऐसे लक्षण दिखाई पड़ें तो डाक्टर से जांच करवाना जरूरी इसलिए है ताकि आगे चल कर कोई बड़ी समस्या न खड़ी हो जाए. पढ़ीलिखी एजुकेटेड होने के बाद भी उसे यह सम?ा में नहीं आया कि पहले सेहत, बाद में काम आता है. जब सेहत ही ठीक नहीं रहेगी फिर कैसे घरपरिवार और नौकरी देख पाएगी.

आमतौर पर महिलाएं अपनी पर्सनल प्रौब्लम के बारे में बताने से ?ि?ाकती हैं. कई बार वे इन बीमारियों का सामना लंबे समय तक करती हैं. लेकिन फिर भी सब से छिपा कर रखती हैं और इलाज नहीं कराती हैं. इस के कारण हैल्थ प्रौब्लम की समस्या और बढ़ती चली जाती है.

आज के दौर में कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत बढ़ रहा है. वे आत्मनिर्भर हो रही हैं. लेकिन कहीं न कहीं कुछ छूट भी रहा है. इन सब में महिलाएं अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह हो रही हैं या कह सकते हैं कि परिवार, बच्चे, नौकरी के बीच उन्हें खुद पर ध्यान रखने का वक्त ही नहीं मिल पाता है.

समय के साथ युवाओं की सोच बदली. उन के विचारों में खुलापन आया, साथ ही मानसिकता भी बदली. अब भारतीय युवाओं को नैतिक या सामाजिक बंधन से बांधना आसान नहीं क्योंकि वे अपने अच्छेबुरे की सम?ा रखते हैं.

विवाहपूर्व सैक्स संबंध को ले कर युवाओं को अधिक सोचविचार की आवश्यकता नहीं है. एक समय था जब विवाहपूर्व सैक्स पाप सम?ा जाता था. लेकिन आज तमाम सर्वे पर नजर डालें

तो न सिर्फ युवा, बल्कि किशोर लड़केलड़कियों को भी कम उम्र में सैक्स करने से कोई परहेज नहीं है. लेकिन विवाहपूर्व सैक्स के कुछ फायदे हैं तो नुकसान भी कम नहीं हैं. विवाहपूर्व सैक्स संबंध कई यौन संबंधी बीमारियों, जैसे एचआईवी एड्स या किसी प्रकार के संक्रमण को न्योता दे सकता है. ऐसे संबंधों में सावधानी न बरती जाए तो गर्भ ठहरने का खतरा भी बराबर बना रहता है. इस से मानसिक तनाव बढ़ सकता है. ब्रिटेन में कच्ची उम्र में लापरवाही से सैक्स करने के कारण महिलाओं में सर्विकल कैंसर के मामले बढ़े.

84 फीसदी कामकाजी महिलाओं ने बताया कि पीरियड्स में पूजा स्थलों, रसोई व पवित्र स्थानों पर जाने से मना किया जाता है. 66 फीसदी महिलाओं ने कहा कि गर्भाशय से जुड़ी समस्याओं के कारण महिलाओं को शादी के योग्य नहीं माना जाता.

आज बड़ा परिवार न्यूक्लियर फैमिली में सिमट कर रह गया है. विवाहेतर संबंधों के कारण अब यह भी टूटबिखर रहा है. महिलाएं भी अब सैक्स को ले कर मुखर होने लगी हैं. सैक्स को ले कर वे ज्यादा प्रयोग करने लगी हैं. जैसे,

युवा लड़कों के प्रति आकर्षित होना, बाइसैक्सुअलिटी और अन्य प्रयोगों को आजमाना आदि.

आर्थिकतौर पर स्वतंत्र होने की स्थिति में वे बैडरूम और किचन की शोपीस बन कर नहीं रह गईं, बल्कि खुलेतौर पर अंतरंग पलों की मांग कर रही हैं और पुरुषों के समान अपने कामुक व्यवहार का प्रदर्शन कर रही हैं. अब उन में पहले जैसा संकोच या अपराधबोध नहीं रहा. अब आप किसे चाहते हैं, कब चाहते हैं, और किस के साथ चाहते हैं, वाली स्वतंत्रता पर बातें हो रही हैं.

किंतु मौजमस्ती के लिए बना यह संबंध अकसर अपराध, शर्म और डरा देने वाली भावनाओं को जन्म देता है. एक दोहरी जिंदगी जीने से मानसिक असंतोष, थकावट और जलन पैदा हो सकती है. इसलिए उत्तेजना के कुछ क्षणों के लिए अपनी शादी और सेहत को खतरे में डालना बुद्धिमानीभरा निर्णय नहीं है.

दिल्ली, मुंबई समेत 7 शहरों में स्टडी के अनुसार, देश में कामकाजी महिलाओं की सेहत ठीक नहीं है. आधे से अधिक महिलाओं को काम के साथ स्वयं को स्वस्थ रखना चुनौती साबित हो रहा है. 67 फीसदी महिलाएं अपनी सेहत से जुड़ी समस्याओं के बारे में बात करने से हिचकती हैं. घुटघुट कर अपना दर्द अपने अंदर ही समेटे रहती हैं क्योंकि उन का कहना है कि हमारे स्वास्थ्य के बारे में बात करना समाज में वर्जित माना जाता है.

एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में महिलाएं कार्यस्थल पर सेहत से जुड़ी समस्याओं पीरियड्स, ब्रैस्ट कैंसर, गर्भाशय समेत तमाम समस्याओं पर बात करने से हिचकती हैं. महिलाओं का कहना है कि जब हमारी सेहत की बात आती है तो 80 फीसदी पुरुष सहयोगी संवेदनशील नहीं होते हैं.

59 फीसदी महिलाएं स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण नौकरी छोड़ देती हैं. 22 से 55 वर्ष की उम्र की कामकाजी 59 फीसदी महिलाएं सेहत संबंधी समस्याओं से नौकरी छोड़ देती हैं. दूसरा कारण बौस का अच्छा व्यवहार न होना. 90 फीसदी महिलाओं को पारिवारिक दायित्वों के कारण दिक्कतें होती हैं. 52 फीसदी महिलाओं के पास नौकरी पारिवारिक दायित्वों के साथ स्वयं को स्वस्थ रखने के लिए समय नहीं है.

हाउसवाइफ की स्थिति तो और भी खराब है. उन्हें अपने घर में ही बुरे बरतावों का सामना करना पड़ता है. उन की सेहत के बारे में भी देश, समाज, परिवार ज्यादा नहीं सोचते और न ही वे खुद अपने ऊपर ध्यान रख पाती हैं.

कहने वाले कहते हैं कि ‘उन्हें काम ही क्या होता है, बस घर में आराम से खाना, सोना और टीवी देखना ही तो होता है. गधा मजूरी तो बस हम पुरुषों के ही खाते में है.’ जबकि घर संभालने वाली महिला सब से ज्यादा मेहनत करती है. घर के कामों से ले कर पूरे परिवार का ध्यान रखती है. लेकिन फिर भी उस के कामों को महत्त्व नहीं दिया जाता है. महिला की पहचान तो चिंटूपिंकी की मम्मी या फलाने की पत्नी के रूप में ही होती है. सब को लगता है यह कौन सा बड़ा पापड़ बेल रही है जो इस की तबीयत खराब होगी. आराम से घर में रहती है.

महिलाएं सेहत को ले कर लापरवाह

एक सशक्त परिवार के लिए जरूरी है एक सशक्त और स्वस्थ महिला का होना. महिला घर की चीजों के साथ हर किसी का पूरा ध्यान रखती है. लेकिन बात जब खुद का खयाल रखने, खुद को निखारने और बेहतर बनाने की आती है तो उन के बहानों की ?ाड़ी लग जाती है कि टाइम ही नहीं मिलता क्या करें. इन्हें हम डिफैंस मेकैनिजम या आम भाषा में सुरक्षात्मक युक्ति कहते हैं. लेकिन इस से सुरक्षा तो नहीं मिलती, उलटे लंबे समय में नुकसान ही होता है.

हमारे पड़ोस की ही एक महिला को बुखार के साथ असहनीय सिरदर्द होने लगा. उसे लगा, थकावट की वजह से ऐसा हुआ हो या बदलते मौसम का असर होगा, दवाई खा लेगी तो ठीक हो जाएगी. मगर रात होतेहोते उस का बुखार सिर पर चढ़ गया जिस से उस की मौत हो गई. अगर समय रहते वह डाक्टर के पास चली गई होती तो आज वह जिंदा होती.

हाउसवाइफ की यह आदत होती है कि घर में सब को खिला कर ही खाती है. रात का बचा हुआ खाना फेंकना न पड़े, इसलिए खुद ही खा लेती हैं. इस से अकसर उन में गैस या उलटी की शिकायत हो जाती है. तथ्य यह है कि भोजन को बनने के 2 घंटे के अंदर ही खा लेना चाहिए क्योंकि उस के बाद वह अपने पौष्टिक तत्त्व खोने लगता है. बासी भोजन अपच का कारण बनता है और कई तरह के नुकसान भी पहुंचाता है.

वहीं, वर्किंग वुमन काम के चक्कर में न तो सही से नाश्ता कर पाती है और न खाना खा पाती है, जिस का सीधा असर उस की सेहत पर पड़ता है. सेहत खराब होने पर वह जल्दी डाक्टर के पास भी नहीं जाती, बल्कि घरेलू उपचार से खुद को ठीक करने की कोशिश करती हैं.

डाक्टर्स का कहना है कि अकसर यह देखा गया है कि जब महिलाएं घरपरिवार और कार्यस्थल हर जगह अपना दायित्व का पालन करती हैं, उस वक्त वे सेहत पर बिलकुल भी ध्यान नहीं दे पातीं. जब परेशानी हद से ज्यादा बढ़ जाती है तब अपनी सेहत की जांच करवाती हैं.

महिलाएं भी समाज का एक अभिन्न अंग हैं, इसलिए महिलाओं की चिंता सभी को होनी चाहिए, पर अकसर देखा गया है कि घर और औफिस के बीच महिलाएं अपने स्वास्थ्य को नजरअंदाज कर देती हैं. जबकि पुरुषों की तुलना में महिलाओं की स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियां काफी जटिल होती हैं. महिलाओं की स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों की बात करें तो पुरुषों की तुलना में ये काफी भिन्न हैं.

दिल की बीमारी :  लोगों का मानना है कि दिल की बीमारी सिर्फ पुरुषों को ज्यादा होती है तो ऐसा नहीं है. यह स्थिति पुरुषों और महिलाओं को लगभग समानरूप से प्रभावित करती है. 54 प्रतिशत महिलाओं में दिल से जुड़ी बीमारियों के लक्षण देखे जा सकते हैं. इन में हाई ब्लडप्रैशर, हाई कोलैस्ट्रौल या धुएं के कारण होने वाली दिल से जुड़ी बीमारियां शामिल हैं. साथ ही, पीरियड्स के खत्म हो जाने के बाद यानी कि मीनोपोज में भी महिलाओं को दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा होता है.

यूटरस कैंसर : यूटरस कैंसर निचले गर्भाशय में होता है और इस की शुरुआत फैलोपियन ट्यूब से होती है. इस के कारण महिलाओं को अनियमित ब्लीडिंग और डिस्चार्ज के साथ पेड़ू में दर्द हो सकता है.

स्तन कैंसर : स्तन कैंसर महिलाओं में बड़ी तेजी से फैल रहा है. यह एक पूरी वैश्विक महिला आबादी को प्रभावित कर रहा है और स्थिति दिनबदिन और खराब होती जा रही है. कई महिलाओं में इसे ले कर जागरूकता की कमी होती है. ऐसे में जरूरी है कि महिलाओं को ब्रैस्ट कैंसर के लक्षणों से वाकिफ कराया जाए ताकि समय रहते उस का इलाज हो सके.

पीरियड्स और मीनोपोज : पीरियड्स और मीनोपोज दोनों ही महिलाओं के स्वास्थ्य का सब से गंभीर मुद्दा हैं. लेकिन देखा गया है कि महिलाओं को जब भी कभी पीरियड्स या मीनोपोज से जुड़ी कोई समस्या होती है तो वे इसे बताने में हिचकती हैं, जो उन की सेहत के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है. कई ऐसी हैल्थ प्रौब्ल्म्स होती हैं जिन्हें महिलाएं छिपा लेती हैं, किसी से बता नहीं पातीं और न ही परिवार या पति उन की सेहत को ले कर चिंतित दिखाई देते हैं.

पेशे से बैंक कर्मचारी मनीषा का कहना है, ‘‘बच्चे छोटे थे, तब स्कूल टिफिन सब मु?ो ही करना पड़ता था. सुबह उठ कर मैं घर के सारे काम निबटा कर औफिस के लिए निकलती थी. औफिस से आतेआते मैं काफी थक चुकी होती हूं, ऊपर से घर में बिखरा काम मु?ो आराम करने की इजाजत नहीं देता. घरबाहर पिसती मैं अपना जरा भी खयाल नहीं रख पाती. कमाऊ स्त्री की मदद कोई नहीं करता पर सुविधाएं लेने सब आ जाते हैं.

‘‘आज मैं हाई बीपी और अनिद्रा से गुजर रही हूं. काम की टैंशन की वजह से जल्दी नींद न आने की बीमारी परमानैंट हो गई है. अब सुबह जल्दी उठा नहीं जाता. बेटी बड़ी हो रही है तो घर के कामों में वह कुछ हैल्प कर देती है, वरना किसी को मेरी नहीं पड़ी.’’

मनीषा का कहना है, ‘‘वर्किंग वूमन ऐसी मोमबत्ती है जो दोनों सिरों से जलती है. 95 फीसदी वर्किंग वूमन की यही हालत है कि उन्हें अपने लिए वक्त नहीं मिल पाता. हर काम परफैक्ट करने के चक्कर में वे खुद के स्वास्थ्य से सम?ाता करती रहती हैं. हाउसवाइफ घर संभालती है, तभी पुरुष प्रगति कर पाते हैं, पर यह बात कितने पुरुष सम?ाते हैं?

आंकड़ों के मुताबिक, 15 से 44 साल के बीच की एकतिहाई महिलाएं रिप्रोडक्टिव हैल्थ यानी यौन सेहत से जुड़ी समस्याओं से परेशान रहती हैं. इस के लिए मुख्य रूप से असुरक्षित यौन संबंध जिम्मेदार होता है. लेकिन यह बात वे जल्दी किसी से बता नहीं पातीं.

एड्स : करीब 3 दशक से महिलाएं एचआईवी इन्फैक्शन का शिकार होती चली आ रही हैं. आज भी कई महिलाएं एचआईवी के सैक्सुअल ट्रांसमिशन से खुद को बचाने की कोशिश करती

हैं. इस की वजह से महिलाएं ट्यूबरक्लोसिस की चपेट में आ जाती हैं. कम आय वाले देशों में 20-59 साल की महिलाओं में सब से ज्यादा मौतें इसी की वजह से होती हैं.

सैक्सुअल ट्रांसमिटेड इन्फैक्शन : एचआईवी के अलावा गोनोरिया, क्लैमाइडिया और सिफलिस जैसी यौन संचारित बीमारियों के प्रति महिलाओं को जागरूक करने और इन की रोकथाम की जरूरत है. सिफलिस जैसी बीमारी का इलाज न होने पर आज भी हर साल

2 लाख बच्चे पैदा होने से पहले ही मां की कोख में मर जाते हैं.

मानसिक सेहत : बीमारियों के अलावा, महिलाओं के खिलाफ हिंसा उन की मानसिक सेहत पर बहुत बुरा असर डालती है. आज भी महिलाएं अपने घर में शारीरिक और यौन हिंसा की शिकार होती हैं पर किसी से कह नहीं पातीं और अंदर ही अंदर घुटती रहती हैं. लेकिन शारीरिक और मानसिक रूप से इस का असर उन पर लंबे समय तक बना रहता है.

डिप्रैशन : आंकड़े बताते हैं कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं चिंता, तनाव और कुछ खास शारीरिक परेशानियों की ज्यादा शिकार होती हैं लेकिन किसी से कह नहीं पातीं. तनाव तो सब से आम समस्या है. 60 से कम उम्र की महिलाएं डिप्रैशन के चलते खुदकुशी करने जैसा बड़ा कदम उठा लेती हैं.

जब एक महिला स्वस्थ और प्रसन्न होगी तभी वह परिवार और समाज में निर्धारित अपनी अनेक भूमिकाओं को निभा पाएगी तथा दूसरों के साथ संतोषजनक संबंध बना सकेगी. महिला का स्वास्थ्य उस के जीवन के हर पहलू पर प्रभाव डालता है. फिर भी अनेक वर्षों तक और आज भी, महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सेवा का मतलब सिर्फ गर्भाशय तथा प्रसव में दी जाने वाली मातृ स्वास्थ्य सेवाओं से अधिक कुछ नहीं रहा है. ये सेवाएं आवश्यक हैं. लेकिन ये केवल महिलाओं की, मां की भूमिका का ही ध्यान करती हैं. केवल बच्चे पैदा करने की क्षमता को छोड़ कर महिलाओं का स्वास्थ्य तथा उन से संबधित अन्य आवश्यकताओं को पुरुषों की तुलना में कम महत्त्व दिया जाता है.

महिलाओं की सेहत को ले कर परिवार वालों को भी इस का दायित्व लेने की जरूरत है, साथ ही, कार्यस्थल पर समयसमय पर फिजिकल और मैंटल हैल्थ के लिए सैशन करवाना चाहिए. सजगता और जागरूकता से सेहत की समस्याएं कम की जा सकती हैं. इस के अलावा महिलाएं भी खुद के स्वस्थ्य को इगनोर न करें. खुद के लिए समय जरूर निकालें.

उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं के शरीर में कई तरह की समस्याएं होने लगती हैं. महिलाओं को स्वस्थ रहने के लिए विटामिन, मिनरल्स और पोषक तत्त्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए. इस के अलावा पर्याप्त नींद लेना, तनाव रहित रहना, इमोशनल ईटिंग से बचना, जरूरत से ज्यादा डाइटिंग, ड्रिंक से दूरी, गलत साइज की ब्रा, हाई हील वाले फुटवियर्स पहनने से दूरी बनाए रखना भी जरूरी है.

अकसर महिलाओं का हैवी बैग का इस्तेमाल भी पीठ, गरदन और कंधे के दर्द का कारण बनता है. इसलिए उन्हें प्लस साइज के बजाय छोटे साइज का हैंडबैग इस्तेमाल करना चाहिए.

आज के दौर में हाई बीपी, शुगर, कोलैस्ट्रौल जैसी बीमारियां कौमन समस्या बन गई हैं. लेकिन इन्हें समय रहते कंट्रोल कर लिया जाए तो आप स्वस्थ बने रह सकते हैं. वक्त पर इन की जांच करते रहने से आप इस बात से निश्ंिचत रहते हैं कि आप का बीपी, शुगर लैवल सही है. लेकिन काम की व्यस्तता के चलते हमेशा डाक्टर के पास जाना भी संभव नहीं हो पाता तो हम आप को कुछ ऐसे मैडिकल इक्विपमैंट्स के बारे में बता रहे हैं जिन की मदद से आप घरबैठे अपनी जांच कर सकते हैं.

पल्स औक्सीमीटर : कोरोनाकाल में इस की डिमांड काफी बढ़ गई थी. पल्स औक्सीमीटर की मदद से आप घरबैठे ही अपने औक्सीजन लैवल की जांच कर सकते हैं. कई अच्छेअच्छे ब्रैंड के लेटेस्ट पल्स औक्सीमीटर बाजार में उपलब्ध हैं, जिन्हें आप औनलाइन या औफलाइन खरीद सकते हैं.

ब्लडप्रैशर का भी रखें ध्यान : औटोमेटिक ब्लडप्रैशर मौनिटर एक आवश्यक गैजेट है. गौर करने वाली बात यह है कि ऐसे डिवाइस खरीदें जो पल्स रेट को दिखाए, साथ में दिल की धड़कन के बारे में भी जानकारी दे. बाजार में कई लेटेस्ट ब्रैंड के डिजिटल प्रैशर मौनिटर उपलब्ध हैं. इन की कीमत 2 हजार से ले कर 3 हजार रुपए तक है. औनलाइन खरीदारी पर डिस्काउंट भी मिलता है.

हार्ट हैल्थ को करें ट्रैक :  घरबैठे ही पोर्टेबल पर्सनल ईसीजी मौनिटर से बिना परेशानी के डेली ईसीजी रिकौर्ड करने में आप की मदद करेगा और साथ में आप के दिल के स्वास्थ्य को भी मौनिटर करेगा. यह स्मार्टफोन कंपैनियन ऐप के साथ आते हैं जिन पर आप अपना हैल्थ रिकौर्ड देख सकते हैं.

ग्लूकोमीटर :  यह मशीन हाईलैवल शुगर वालों के लिए बेहद जरूरी है. इस की मदद से आप कुछ सैकंड में ही अपने शुगर लैवल की जांच कर सकते हैं. इस की कीमत 1,000 से 15,000 रुपए तक होती है.

पेन रिलीफ डिवाइस :  बता दें कि दर्द को दूर भगाने के लिए मार्केट में कुछ पेन रिलीफ डिवाइस भी मौजूद हैं. अपनी आवश्यकता के अनुसार आप अच्छे ब्रैंड्स के डिवाइस खरीद सकते हैं. इस के अलावा औक्सीजन कौंसंट्रेटर, इमरजैंसी डिवाइस, मैडिकल अलर्ट सिस्टम, कौंटैक्टलैस थर्मामीटर, पोर्टेबल औक्सीजन सिलिंडर, नेब्यूलाइजर, स्टीमर, रेस्पिरेटरी ऐक्सरसाइजर जैसे मैडिकल गैजेट्स भी हैं जिन की मदद से आप घरबैठे ही अपने स्वास्थ्य का ध्यान रख सकते हैं. मैडिकल प्रोफैशनल से पूछें कि कौन सा मैडिकल डिवाइस आप के लिए सही रहेगा.

Holi Special: हक ही नहीं कुछ फर्ज भी- भाग 1

बेटा बेटी को बराबर मानने वाले सुकांत और निधि दंपती ने अपने तीनों बच्चों उन्नति, काव्या और सुरम्य में कभी कोई फर्क नहीं रखा. एकसमान परवरिश की. यही कारण था जब बड़ी बेटी उन्नति ने डैंटल कालेज में प्रवेश लेने की इच्छा जाहिर की तो…

‘‘पापा ऐश्वर्या डैंटल कोर्स करने के लिए चीन जा रही है. मैं भी जाना चाहती हूं. मुझे भी डैंटिस्ट ही बनना है.’’

‘‘तो बाहर जाने की क्या जरूरत है? डैंटल कोर्स भारत में भी तो होते हैं.’’

‘‘पापा, वहां डाइरैक्ट ऐडमिशन दे रहे हैं 12वीं कक्षा के मार्क्स पर… यहां कोचिंग लूं, फिर टैस्ट दूं. 1-2 साल यों ही चले जाएंगे,’’ उन्नति बोली.

‘‘पर बेटा…’’

‘‘परवर कुछ नहीं पापा. आप ऐश्वर्या के पापा से बात कर लीजिए. मैं उन का नंबर मिला देती हूं… उन्हें सब पता है… वे अपने काम के सिलसिले में अकसर वहां जाते रहते हैं.’’

सुकांत ने बात की. फीस बहुत ज्यादा थी. अत: वे सोच में पड़ गए.

‘‘ऐजुकेशन लोन भी मिलता है जी आजकल बच्चों को विदेश में पढ़ने के लिए… पढ़ने में भी ठीकठाक है… पढ़ लेगी तो दांतों की डाक्टर बन जाएगी,’’ निधि भी किचन से हाथ पोंछते हुए उन के पास आ गई थीं.

‘‘पर पहले पता करने दो ठीक से कि वह मान्यताप्राप्त है भी या नहीं.’’

‘‘है न मां. बस वापस आ कर यहां एक परीक्षा देनी पड़ती है एमसीआई की और प्रमाणपत्र मिल जाता है. पापा, अगर मेरी जगह सुरम्य होता तो आप जरूर भेज देते.’’

‘‘नहीं ऐसा बिलकुल नहीं है. तुम ने ऐसा क्यों सोचा? क्या तुम भाईबहनों में मैं ने कभी कोई फर्क किया?’’ सुकांत ने उस के गालों पर प्यार से थपकी दी.

बैंक में कैशियर ही तो थे सुकांत. निधि स्कूल में टीचर थीं. दोनों के वेतन से घर बस ठीकठाक चल रहा था. कुछ ज्यादा जमा नहीं कर सके थे दोनों. सुकांत की पैतृक संपत्ति भी झगड़े में फंसी थी. बरसों से मुकदमे में पैसा अलग लग रहा था. हां, निधि को मायके से जरूर कुछ संपत्ति का अपना हिस्सा मिला था, जिस से भविष्य में बच्चों की शादी और अपना मकान बनाने की सोच रहे थे.

‘‘मकान तो बनता रहेगा निधि, शादियां भी होती रहेंगी… पहले बच्चे लायक बन जाएं तो यह सब से बड़ी बात होगी… है न?’’ कह सुकांत ने सहमति चाही थी, फिर खुद ही बोले, ‘‘हो सकता है हम मुकदमा जीत जाएं… तब तो पैसों की कोई कमी नहीं रहेगी.’’

‘‘हां, ठीक तो कह रहे हैं. आजकल बहुएं भी लोग कामकाजी ही लाना ज्यादा पसंद करने लगे हैं. बढि़या प्रोफैशनल कोर्स कर लेगी तो घरवर भी बहुत अच्छा व आसानी से मिल जाएगा,’’ निधि ने अपनी सहमति जताई.

‘‘जमा राशि आड़े वक्त के लिए पड़ी रहेगी… कोई ऐजुकेशन लोन ही ले लेते हैं. वही ठीक रहेगा… पता करता हूं डिटेल… इस के जौब में आने के बाद ही किस्तें जानी शुरू होंगी.’’

सुकांत ने पता किया और फिर सारी प्रक्रिया शुरू हो गई. उन्नति पढ़ाई के लिए विदेश चली गई. दूसरी बेटी काव्या के अंदर भी विदेश में पढ़ाई करने की चाह पैदा हो गई. 12वीं कक्षा के बाद उस ने लंदन से बीबीए करने की जिद पकड़ ली.

‘‘पापा, दीदी को तो आप ने विदेश भेज दिया मुझे भी लंदन से पढ़ाई करनी है… पापा प्लीज पता कीजिए न.’’

सुकांत और निधि ने सारी तहकीकात कर काव्या को भी पढ़ाई के लिए लंदन भेज दिया.

अब रह गया था सब से छोटा बेटा सुरम्य. पढ़ने में वह भी अच्छा था. वह भी डाक्टर बनना चाहता था. मगर घर का खर्च देख कर उस का खयाल बदलने लगा कि मातापिता कहां तक करेंगे… साल 6 महीने बाद पीएमटी परीक्षा में सफल भी हुआ तो 4 साल एमबीबीएस की पढ़ाई. फिर इंटर्नशिप. उस के बाद एमडी या एमएस उस के बिना तो डाक्टरी का कोई मतलब ही नहीं. फिर अब मम्मीपापा रिटायर भी होने वाले हैं… कब कमा पाऊंगा, कब उन की मदद कर पाऊंगा… 2 लोन पहले ही उन के सिर पर हैं.

मुझे कुछ जल्दी पढ़ाई कर के पैसा कमाना है. फिर उस ने अपना स्ट्रीम ही कौमर्स कर लिया. 12वीं कक्षा के बाद उस ने सीए की प्रवेश परीक्षा पास कर ली. स्टूडैंट लोन ले कर उस ने अपनी सीए की पढ़ाई शुरू कर दी. दिन में पढ़ाई करना और रात में काल सैंटर में जौब करने लगा. सुकांत और निधि थोड़े परेशान अवश्य थे, पर मन में कहीं यह संतोष था कि बच्चे काबिल बन कर अपने पैरों पर खड़े हो इज्जत और शान की जिंदगी जीएंगे, इस से बड़ी और क्या बात होगी उन के लिए.

सुकांत रिटायर हो कर किराए के मकान में आ गए थे.

‘‘और क्या जी हम नहीं बनवा सके घर तो क्या बच्चे तो अपना घर बना कर ठाठ से रहेंगे,’’ एक दिन निधि बोलीं.

लेखक- Dr. Neerja Srivastava

2 हिस्से: जब खुशहाल शादी पहुंची तलाक तक

‘‘कहां थीं तुम? 2 घंटे से फोन कर रहा हूं… मायके पहुंच कर बौरा जाती हो,’’ बड़ी देर के बाद जब मोनी ने फोन रिसीव किया तो मीत बरस पड़ा.

‘‘अरे, वह… मोबाइल… इधरउधर रहता है तो रिंग सुनाईर् ही नहीं पड़ी… सुबह ही तो बात हुई थी तुम से… अच्छा क्या हुआ किसलिए फोन किया? कोई खास बात?’’ मोनी ने उस की झल्लाहट पर कोई विशेष ध्यान न देते हुए कहा.

‘‘मतलब अब तुम से बात करने के लिए कोई खास बात होनी चाहिए मेरे पास… क्यों ऐसे मैं बात नहीं कर सकता? तुम्हारा और बच्चों का हाल जानने का हक नहीं है क्या मुझे? हां, अब नानामामा का ज्यादा हक हो गया होगा,’’ मीत मोनी के सपाट उत्तर से और चिढ़ गया. उसे उम्मीद थी कि वह अपनी गलती मानते हुए विनम्रता से बात करेगी.

उधर मोनी का भी सब्र तुरंत टूट गया. बोली, ‘‘तुम ने लड़ने के लिए फोन किया है तो मुझे फालतू की कोई बात नहीं करनी है. एक तो वैसे ही यहां कितनी भीड़ है और ऊपर से मान्या की तबीयत…’’ कहतेकहते उस ने अपनी जीभ काट ली.

‘‘क्या हुआ मान्या को? तुम से बच्चे नहीं संभलते तो ले क्यों जाती हो… अपने भाईबहनों के साथ मगन हो गई होगी… ऐसा है कल का ही तत्काल का टिकट बुक करा रहा हूं तुम्हारा… वापस आ जाओ तुम… मायके जा कर बहुत पर निकल आते हैं तुम्हारे. मेरी बेटी की तबीयत खराब है और तुम वहां सैरसपाटा कर रही हो… नालायकी की हद है… लापरवाह हो तुम…’’ हालचाल लेने को किया गया फोन अब गृहयुद्ध में बदल रहा था. मीत अपना आपा खो बैठा था.

‘‘जरा सा बुखार हुआ है उसे… अब वह ठीक है… और सुनो, मुझे धमकी मत दो. मैं 10 दिन के लिए आई हूं. पूरे 10 दिन रह कर ही आऊंगी… मैं अच्छी तरह जानती हूं कि मेरे मायके आने से सांप लोटने लगा है तुम्हारे सीने पर… अभी तुम्हारे गांव जाती जहां 12-12 घंटे लाइट नहीं आती… बच्चे वहां बीमार होते तो तुम्हें कुछ नहीं होता… पूरा साल तुम्हारी चाकरी करने के बाद 10 दिन को मायके क्या आ जाऊं तुम्हारी यही नौटंकी हर बार शुरू हो जाती है,’’ मोनी भी बिफर गई. उस की आवाज भर्रा गई पर वह अपने मोरचे पर डटी रही.

‘‘अच्छा मैं नौटंकी कर रहा हूं… बहुत शह मिल रही है तुम्हें वहां…

अब तुम वहीं रहो. कोई जरूरत नहीं वापस आने की… 10 दिन नहीं अब पूरा साल रहो… खबरदार जो वापस आईं,’’ गुस्से से चीखते हुए मीत ने उस की बात आगे सुने बिना ही फोन काट दिया.

मोनी ने भी मोबाइल पटक दिया और सोफे पर बैठ कर रोने लगी. उस की मां पास बैठी सब सुन रही थीं. वे बोलीं, ‘‘बेटी, वह हालचाल पूछने के लिए फोन कर रहा था. देर से फोन उठाने पर अगर नाराज हो रहा था तो तुम्हें प्यार से उसे हैंडल करना था. खैर, चलो अब रोओ नहीं. कल सुबह तक उस का भी गुस्सा उतर जाएगा.’’

मोनी अपना मुंह छिपाए रोते हुए बोली, ‘‘मम्मी, सिर्फ 10 दिन के लिए आई हूं. जरा सी मेरी खुशी देखी नहीं जाती इन से… पतियों का स्वभाव ऐसा क्यों होता है कि जब भी हमें मिस करेंगे, हमारे बिना काम भी नहीं चलेगा तब प्यार जताने के बदले, हमारी कदर करने के बदले हमीं पर झलाएंगे, गुस्सा दिखाएंगे… हम से जुड़ी हर चीज से बैर पाल लेंगे. यह क्या तरीका है जिंदगी जीने का?’’

‘‘बेटी, ये पुरुष होते ही ऐसे हैं… ये बीवी से प्यार तो करते हैं पर उस से भी ज्यादा अधिकार जमाते हैं. बीवी के मायके जाने पर इन को लगता है कि इन का अधिकार कुछ कम हो रहा है, तो अपनेआप अंदर ही अंदर परेशान होते हैं. ऐसी झल्लाहट में जब बीवी जरा सा कुछ उलटा बोल दे तो इन के अहं पर चोट लग जाती है और बेबात का झगड़ा होने लगता है… तेरे पापा का भी यही हाल रहता था,’’ मां ने मोनी के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे चुप कराया.

‘‘पर मम्मी औरत को 2 भागों में आखिर बांटते ही क्यों हैं ये पुरुष? मैं पूरी ससुराल की भी हूं और मायके की भी… मायके में आते ही ससुराल की उपेक्षा का आरोप क्यों लगता है हम पर? यह 2 जगह का होने का भार हमें ही क्यों ढोना पड़ता है?’’ मोनी ने मानो यह प्रश्न मां से ही नहीं, बल्कि सब से किया हो.

मां उसे अपने सीने से लगा कर चुप कराते हुए बोलीं, ‘‘इन के अहं और ससुराल में छत्तीस का आंकड़ा रहता ही है… मोनी मैं ने कहा न कि पुरुष होते ही ऐसे हैं. यह इन की स्वाभाविक प्रवृत्ति है… और पुरुष का काम ही है स्त्री को 2 भागों में बांट देना, जिन में एक हिस्सा मायके का और दूसरा ससुराल का बनता है… जैसे 2 अर्ध गोलाकार से एक गोलाकार पूरा होता है वैसे ही एक औरत भी इन 2 हिस्सों से पूर्ण होती है.’’

मोनी मूक बनी सब सुन रही थी. कुछ समझ रही थी और कुछ नहीं समझने की कोशिश कर रही थी. शायद यही औरत का सच है.

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