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व्हाट्सऐप कौलिंग की शिकार लड़कियां

रीता दिल्ली से सटे गाजियाबाद के एक पब्लिक स्कूल में 9वीं कक्षा की छात्रा थी. 9वीं में अच्छे अंक आने पर उस ने पिता से जिद कर के एक नया ऐंड्रौयड मोबाइल फोन ले लिया. मोबाइल में इंटरनैट पैक न लिया जाए आजकल ऐसा नहीं होता, क्योंकि स्मार्टफोन के अधिकांश फीचर्स इंटरनैट बेस ही होते हैं.

रीता ने बहुचर्चित सोशल मैसेंजर व्हाट्सऐप भी अपने फोन में डाउनलोड कर लिया. कुछ दिन बाद ही उसे व्हाट्सऐप के जरिए एक कौल आई. रीता ने कौल अटैंड की, तो दूसरी तरफ कोई युवक  था, ‘‘हाय, आप की प्रोफाइल पिक्चर बहुत प्यारी है.’’

रीता सकपका गई, ‘‘आप कौन?’’

‘‘एक ऐसा साथी जो आप को चाहता है और हां, एक बात तो कहना भूल ही गया आप की आवाज भी बहुत प्यारी है.’’

रीता कोई जवाब देती उस से पहले ही कौल डिस्कनैक्ट हो गई. रीता को पता नहीं था कि वह कौन था. उस ने कोई बदतमीजी भी नहीं की थी. उस की बातों से उस के मन में गुदगुदी पैदा हो गई. जिज्ञासावश उस ने कौलिंग नंबर को सेव कर के व्हाट्सऐप पर उस का प्रोफाइल फोटो देखा तो वह एक मौडल की तरह दिखने वाला खूबसूरत युवक था.

नाजुक उम्र के दौर में रीता को यह अच्छा लगा. इस के बाद वह रीता को गुडमौर्निंग मैसेज के साथ खूबसूरत ग्रीटिंग पिक्चर्स भेजने लगा. शुरू में तो रीता ने इस का जवाब नहीं दिया, लेकिन उसे लगा कि जो भी हो वह उस की तारीफ करता है. नए मोबाइल के साथ उसे यह बात भी अच्छी लग रही थी कि अन्य यूथ की तरह वह भी व्हाट्सऐप का इस्तेमाल कर रही है.

रीता ने जब जवाब देने शुरू किए तो वह धीरेधीरे उस में इतना डूब गई कि उस ने एक रैस्टोरैंट में उस से मिलने का प्रोग्राम भी बना लिया. रीता विश्वास कर के उस से मिलने भी चली गई. युवक उसे घुमाने के बहाने कार में बैठा कर दिल्ली ले गया. उस के जाल में फंस कर रीता को एहसास हुआ कि वह किसी गैंग के चंगुल में फंस गई है. टौयलेट जाने के बहाने रीता ड्राइंगरूम से निकली और फ्लैट का दरवाजा खोल कर वहां से भाग निकली और अपने परिजनों को फोन कर सूचित किया.

सूचना मिलने पर परिजन वहां पहुंचे और उसे वहां से वापस ले कर आए. परिजनों को जब पूरा किस्सा पता चला तो उन्हें बेटी को मोबाइल दिलाने के अपने निर्णय पर पछतावा हुआ.

मामला पुलिस तक पहुंचा, लेकिन बदनामी के डर से परिजन खामोश रह गए. पुलिस ने उन से कहा कि अगर कोई उन्हें परेशान करे तो चुप न रहें. पुलिस ने गोपनीय ढंग से गैंग की पड़ताल शुरू कर दी. रीता के परिवार को खुशी थी कि उन की बेटी सुरक्षित बच गई थी, लेकिन सभी ऐसे खुशनसीब हों यह जरूरी नहीं.

रश्मि 7वीं क्लास की छात्रा थी. उस के परिजनों ने उसे ऐंड्रौयड मोबाइल दिला दिया. एक लड़के ने व्हाट्सऐप के जरिए उस से दोस्ती कर ली. उस ने दोस्ती की आड़ में उस की मासूमियत का फायदा उठा कर उस से मुलाकातें शुरू कर दीं. रश्मि नाजुक उम्र के दौर में थी और वह युवक की चाल को समझ नहीं पाई. एक दिन मौका पा कर उस ने रश्मि का शारीरिक शोषण किया. इस के बाद तो उस का लगातार शोषण किया जाने लगा. जब रश्मि के परिजनों को शक हुआ, तब जा कर मामला खुला. उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. पुलिस ने युवक को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया.

उत्तर प्रदेश के एक गांव की रहने वाली किशोरी को व्हाट्सऐप के जरिए एक युवक ने अपने प्रेमजाल में फंसा लिया. किशोरी जब उस के जाल में फंस गई, तो उस युवक ने उस के साथ दुराचार किया. साथ ही उस ने इस दुराचार की वीडियो फिल्म भी बना ली. इस के बाद उसे ब्लैकमेल किया जाने लगा. युवक ने वीडियो के बल पर किशोरी के संबंध अपने दोस्तों के साथ भी बनवाए. जब मामला खुला तो हर कोई दंग रह गया.

कुछ समय पहले ही व्हाट्सऐप मैसेंजर ने नया फीचर जोड़ते हुए मुफ्त कौलिंग की सुविधा भी प्रदान की. इस में इंटरनैट के जरिए ही बात हो जाती है. लाखों यूजर्स इस का फायदा उठा रहे हैं. खासकर इस का जादू यूथ के तो सिर चढ़ कर बोल रहा है, क्योंकि वहाट्सऐप ही एक ऐसा मैसेंजर है जिस के जरिए मैसेज, औडियो, वीडियो व फोटो फाइलें सैकंडों में एकदूसरे के मोबाइल में पहुंच जाती हैं.

लड़कियों को शिकार बनाने वाला गैंग अनजान नंबरों को पहले अपने मोबाइल या कंप्यूटर पर सेव करता है, फिर व्हाट्सऐप पर उन का प्रोफाइल देखता है. यदि लड़की या महिला का फोटो होता है, तो उस से व्हाट्सऐप कौलिंग की जाती है. दूसरी तरफ से यदि किसी लड़की या महिला की आवाज आती है तो उस से लच्छेदार बातें करना शुरू कर देते हैं. यदि कोई पुरुष हुआ तो सौरी कह कर कौल कट कर देते हैं.

शिकार यदि उन के जाल में फंसने लगता है तो धीरेधीरे उस से रोमांचक चैटिंग शुरू करते हैं. फिर कौलिंग करते हैं और बातोंबातों में उस का फैमिली प्रोफाइल भी पता करते हैं? इस के बाद उसे अपना टारगेट बनाते हैं. जो लड़कियां इन के जाल में फंस जाती हैं उन का जम कर शारीरिक शोषण किया जाता है. चोरीछिपे उन की वीडियो क्लिपिंग बनाई जाती हैं और फिर ब्लैकमेलिंग का सिलसिला शुरू हो जाता है. इस तरह ये गैंग लड़कियों को देह व्यापार के धंधे में धकेलने से भी नहीं हिचकते.

अधिकतर ग्रामीण लड़कियां ही उन का शिकार होती हैं. शहरों में वे छात्राएं इन के निशाने पर होती हैं जो अकसर इंटरनैट के जरिए मैसेंजर आदि पर ऐक्टिव रहती हैं. व्हाट्सऐप कौलिंग में गैंग के पकड़े जाने का खतरा न के बराबर रहता है. अभी तक ऐसी कोई सुविधा नहीं है जिस से इंटरनैट कौल को रिकौर्ड किया जा सके या यह पता लगाया जा सके कि वह किस स्थान से की जा रही है. नंबर की जांच की जाए तो वह फर्जी पतों पर आधारित होते हैं. केवल नंबर से यह साबित करना मुश्किल हो जाता है कि कौन किस से क्या बात कर रहा है.

पेरैंट्स रहें सावधान

यदि पेरैंट्स बच्चों को ऐंड्रौयड मोबाइल देते हैं तो उन्हें सावधान रहने की जरूरत है. मोबाइल दे कर यह न सोचें कि लड़कियां सेफ हैं. इंटरनैट के जरिए मोबाइल पर पूरी दुनिया मौजूद है. बेटी कब किस का शिकार बन जाए, कोई नहीं जानता. ऐसे गैंग घात लगा कर सक्रिय रहते हैं जो लड़कियों को फेसबुक और व्हाट्सऐप के जरिए फंसाने का काम करते हैं. उन का मकसद लड़कियों को अपने जाल में उलझा कर उन का इस्तेमाल कर ब्लैकमेल करना व कभीकभी देह व्यापार के धंधे में उतारना भी होता है, क्योंकि यूथ के सिर पर मोबाइल इंटरनैट का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है, वे इसी का फायदा उठाते हैं.

–       पेरैंट्स देखें कि बच्चे मोबाइल की जिद क्यों कर रहे हैं.

–       यह ध्यान दें कि क्या बच्चे को वास्तव में मोबाइल की जरूरत है.

–       व्हाट्सऐप कितना इस्तेमाल होता है इस पर भी नजर रखें.

–       बच्चा यदि छिप कर बात या चैटिंग करता है तो भी ध्यान दें.

–       बच्चे को आजादी की सीमा के दायरे में रखें.

–       बच्चों से उन के दोस्तों के बारे में भी पूछताछ करें.

–       बच्चों को समझाएं कि अनजान लोगों से बात न करें.

–       उन्हें समझाएं कि अपना फैमिली प्रोफाइल किसी को न दें.

–       बच्चों से पूछें कि कोई उन्हें परेशान तो नहीं कर रहा है.

–       यदि कोई परेशान करता है तो उस की सूचना पुलिस को दें.

व्हाट्सऐप कौलिंग : पुलिस के लिए चुनौती

व्हाट्सऐप द्वारा शुरू की गई मुफ्त कौलिंग की सुविधा पुलिस के होश उड़ा रही है. टैक्नोलौजी के दौर में पुलिस व अपराधियों के बीच शहमात का खेल चलता रहता है. इस तकनीक का इस्तेमाल यदि अपराधियों ने किया, तो पुलिस के लिए यह बहुत बड़ी मुसीबत होगा. इस नई तकनीक पर पुलिस किसी तरह अंकुश लगा पाएगी यह भी समझ से परे है. इस को ले कर पुलिस अधिकारी चिंतित हैं. ऐसी कोई तकनीक नहीं निकली तो भारत में इस तरह की सुविधा को सुरक्षा कारणों से बंद भी किया जा सकता है.

व्हाट्सऐप कौलिंग सभी स्मार्टफोन पर उपलब्ध है. इंटरनैट के जरिए यूजर्स एकदूसरे से बात कर सकते हैं. इंटरनैट इस्तेमाल करने वालों का सिर्फ आईपी एड्रैस होता है. ऐसी बातचीत को किसी भी सूरत में नहीं सुना जा सकता. अब यदि कोई अपराध होता है, तो पुलिस सर्विलांस व कौल रिकौर्ड के जरिए ही अपराधों का खुलासा करती है. बड़ेछोटे मामलों में यह तकनीक बेहद कारगर साबित होती है. इतना ही नहीं पुलिस लोकेशन को ट्रेस करने के साथ ही बातचीत भी सुन लेती है. परंतु व्हाट्सऐप में ऐसा कुछ नहीं है. पुलिस सीडीआर से पता नहीं लगा सकती कि अपराधी ने किसकिस को कौल की. सिर्फ यह पता चल सकता है कि नंबर कहां इस्तेमाल हो रहा है और किस के नाम रजिस्टर्ड है? इस से भी बड़ी मुसीबत यह है कि व्हाट्सऐप का सर्वर भारत में नहीं है? न सिर्फ आईपी एड्रैस ट्रेस करना मुश्किल है बल्कि डिटेल भी आसानी से उपलब्ध नहीं होगी.

अमीरजादे भी होते हैं शिकार

व्हाट्सऐप के माध्यम से कुछ गिरोह अमीरजादों को फंसा कर उन्हें ब्लैकमेल करने का भी काम कर रहे हैं. प्रोफाइल पर आकर्षक फोटो लगाया जाता है. मजेदार चैटिंग की जाती है. जब शिकार जाल में फंस जाता है, तो उस से वूसली की जाती है. हरियाणा के यमुना नगर निवासी एक व्यापारी का बेटा राहुल ऐसे ही गिरोह का शिकार हो गया. उसे व्हाट्सऐप के जरिए एक युवती ने अपने प्रेमजाल में फंसा लिया. लड़की ने उसे मिलने के लिए बुलाया और फिर अपने साथियों के साथ उस का अपहरण कर के एक कमरे में बंद कर दिया? राहुल के साथ मारपीट की गई और फिर उस के परिजनों से 10 लाख रुपए की फिरौती मांगी गई. मामला पुलिस में पहुंचा तो पुलिस ने राहुल को सकुशल बरामद कर लिया.

पिछले दिनों हरियाणा की रोहतक पुलिस ने ऐसे ही एक गिरोह का भंडाफोड़ किया था जो अमीर लड़कों को युवतियों के जरिए फंसाता था. जनता कालोनी निवासी शिवम ने व्हाट्सऐप पर मैसेज के आने के बाद एक युवती से दोस्ती कर ली. बाद में वह युवती से मिलने होटल भी चला गया. इस के बाद युवती उस से रुपए की मांग करने लगी. शिवम ने रुपए नहीं दिए तो युवती ने केस दर्ज कराया कि शिवम नामक युवक ने उसे झांसा दे कर उस के साथ दुराचार किया. पुलिस ने मामले की जांच की तो चौंक गई, क्योंकि लड़की की चैटिंग और उस के भेजे गए फोटो कुछ दूसरी कहानी बता रहे थे. लड़की समझौते के नाम पर 2 करोड़ रुपए मांगने लगी. इस पर पुलिस ने लड़की व उस के साथियों को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस जांच में सामने आया कि वह 5 लोगों का गिरोह था, जिस में 3 युवक और 2 युवतियां थीं. गिरोह ने फर्जी पते के आधार पर सिमकार्ड ले रखे थे. वे अमीरजादों की सूची बनाते थे और युवतियां व्हाट्सऐप के जरिए उन्हें फंसा कर ब्लैकमेल करती थीं

महिलाएं संभाल रही यूपी का उन्नाव जिला

उत्तर प्रदेश का उन्नाव जिला देश का पहला ऐसा जिला बन गया है जहां सभी प्रमुख प्रशासनिक पदों पर महिलाओ की नियुक्ति हुई है. प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 60 किलोमीटर दूर उन्नाव जिला 35 लाख जनसंख्या वाला जिला है. करीब 4558 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले इस जिले में 16 विकास खंड है. करीब 68 फीसदी जनसंख्या वाले 5 तहसील हैं. कानपुर और लखनऊ जैसे 2 बडे शहरों के बीच स्थित यह जिला कानपुर के पडोस में गंगा किनारे बसा है. 6 विधानसभा बंगरमऊ, सफीपुर, मोहान, उन्नाव, भगवंतनगर और पुरवा है. उन्नाव लोकसभा क्षेत्र भी है. कानपुर के करीब होने से यहां चमडा उद्योग से जुडी कई फैक्ट्री हैं. रोजगार की नजर से उन्नाव बहुत पिछडा जिला है. यहां अपराध के मामले भी अधिक प्रकाश में आते है. पिछले कुछ सालों से अपराध के मामलों में कमी देखी जा रही है. उन्नाव कुछ समय पहले डौंडियाखेडा को लेकर चर्चा में आया था. जहां सोने की खजाना गडा होने की अफवाह फैली थी.

उन्नाव जिले की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था इस समय पूरी तरह से महिलाओं के हाथ में है. यहां जिला अधिकारी डीएम के रूप में सौम्या अग्रवाल, मुख्य विकास अधिकारी सीडीओ संदीप कौर, पुलिस अधीक्षक एसपी नेहा पांडेय, एसडीएम जसजीत कौर, एआरटीओ माला वाजपेई, उपजिलाधिकारी अर्पणा द्विवेदी, सीएमओ गीता यादव, नगरपालिका अधिकारी रोली गुप्ता, जिला कार्यक्रम अधिकारी के रूप में शिरीं मसूद और जिला पंचायत अध्यक्ष के रूप में संगीता सिंह सेंगर यहां काम कर रही हैं.

इस तरह से उन्नाव जिले की पूरी व्यवस्था महिला अधिकारियों के हाथ में है. डीएम सौम्या अग्रवाल यहां लंबे समय से कार्यरत है. कई बार मुश्किल भरे हालात यहां आये पर अपने कौशल से सौम्या अग्रवाल ने संभाल लिया. बिना किसी विवाद के सौम्या अग्रवाल ने जिले की कमान संभाल रखी है. अब दूसरी महिला अधिकारियों का भी उनको पूरा सहयोग मिल रहा है.

वीडियो: ‘6 पैक’ बैंड के लिए सोनू निगम ने गाया गाना

जाने-माने सिंगर सोनू निगम ने ट्रांसजेंडर बैंड '6 पैक' के एक गाने के लिए अपनी आवाज दी है, जो इन दिनों काफी चर्चा में है. इस गाने को लेकर सोनू ने कहा कि अब भारत में भी ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रति लोगों की सोच बदल रही है. आपको बता दें कि सोनू के गाए गाने 'सब रब दे बंदे' को यूट्यूब पर अब तक 19 लाख से ज्यादा लोगों ने देखा है. इस एलबम में कुल छह गाने हैं.

सोनू ने बताया कि लोग इस एलबम के गानों को पसंद कर रहे हैं, जिससे ये साबित होता है कि भारत के लोग अब बदलाव के लिए तैयार हैं. अभी तक किसी ने इस गाने का विरोध नहीं किया है. सभी लोग चाहते हैं कि ट्रांसजेंडर्स के साथ अच्छा बर्ताव किया जाए.

जब 6 पैक बैंड ने अपना पहला गाना 'हम हैं हैप्पी' लॉन्च किया था तब सोनू निगम ने उन्हें पूरा सहयोग दिया था. एलबम का दूसरा गाना 'सब रब दे बंदे' सोनू ने गाया है. ये गाना ज्यादा गंभीर है जो इस समाज से हो रहे भेदभाव के बारे में है.

6 पैक बैंड बनाने की योजना यशराज फिल्म्स के आशीष पाटिल और म्यूजिक कम्पोजर शमीर टंडन की थी. इन दोनों ने काफी जद्दोजहद के बाद 6 ट्रांसजेंडर गायक ढूंढ़ निकाले. इस बैंड को यशराज फिल्म्स की यूथ विंग वाई फिल्म्स ने ब्रुक बॉन्ड रेड लेबल के साथ मिलकर लॉन्च किया है.

ये है 6 पैक बैंड के मेंबर्स…
आशा जगताप, भाविका पाटिल, चांदनी सुवर्णकर, फ़िदा खान, कोमल जगताप और रवीना जगताप, बैंड के ये मेंबर्स खुद को 6 पैक बुलाते हैं.

तो आप भी देखिए ये वीडियो… 

सिंगल पेरैंटिंग में ज्यादा समझदारी की जरूरत

आज के समय में सिंगल पेरैंटिंग समाज के लिए अजूबा मुद्दा नहीं रह गया है. समाज भी सिंगल पेरैंट को सम्मान की नजर से देखता है. सिंगल पेरैंट में ज्यादातर महिलाएं ही होती हैं. यह बात जरूर है कि अब सिंगल पेरैंट को नई चुनौतियों से गुजरना पड़ रहा है. बच्चों के पालनपोषण से ले कर उन के कैरियर, शादी और बाद के जीवन का भी ध्यान रखना पड़ता है.

वैष्णवी को उन की मां ने सिंगल पेरैंट की तरह ही पाला था. 30-40 साल पहले सिंगल पेरैंट के सामने बहुत चुनौतियां थीं. वैष्णवी को सब याद है. अपनी मां के संघर्ष को देखते हुए आज वे उन का बहुत सम्मान करती हैं. वैष्णवी की अपनी 12 साल की बेटी माग्रेट है. उस के पिता लिसले मैकडोनाल्ड अपनी बेटी को बहुत प्यार करते हैं. वैष्णवी को लगता है कि आज के दौर में बच्चों को संभालना ज्यादा मुश्किल काम हो गया है.

वैष्णवी को लोग ‘शक्तिमान’ की गीता विश्वास के रूप में पहचानते हैं. ‘वीराना’, ‘सपने सुहाने लड़कपन के’ और ‘मिले जब हमतुम’ वैष्णवी के चर्चित सीरियल हैं. वैष्णवी ने ‘बंबई का बाबू’, ‘लाडला’ और ‘बाबुल’ जैसी तमाम फिल्में भी कीं. इन दिनों वे जी टीवी के शो ‘टशन ए इश्क’ में लीला तनेजा का किरदार निभा रही हैं. वैष्णवी से घर, परिवार और कैरियर पर लंबी बातचीत हुई. पेश हैं, उस के कुछ खास अंश:

24 साल के करीब आप का फिल्मी कैरियर हो गया है. अब टीवी शो में मां का किरदार निभाना कैसा लग रहा है?

देखिए, उम्र का अपना असर होता है. अब मुझे मां वाले रोल ही मिलेंगे. इन्हें स्वीकार करने में कोई हरज नहीं है. ‘टशन ए इश्क’ में लीला तनेजा का रोल करने से पहले जब मैं ने इस की कहानी सुनी तो मुझे अपना बचपन और अपनी मां के संघर्ष के दिन याद आ गए. मेरी मां जौब करती थीं. जब सिंगल पेरैंट के रूप में मेरे पालनपोषण की जिम्मेदारी उन पर आई तो उन्होंने जौब छोड़ दी. मुझे उस समय की याद आई और मैं ने यह किरदार करने का फैसला कर लिया. मैं अपनी मां से बहुत प्यार करती हूं. वे आज भी मेरे साथ रहती हैं. मुझे लगता है कि नए दौर में सिंगल पेरैंटिंग में जो परेशानियां आ रही हैं उन का समाधान लोगों को समझा कर किया जा सकता है.

जब आप छोटी थीं और आप की मां आप का पालनपोषण कर रही थीं और अब जब आप अपनी बेटी का पालनपोषण कर रही हैं, तो दोनों में क्या अंतर देखती हैं?

मेरी मां ने मुझे सिंगल पेरैंट की तरह पाला था जबकि मेरे साथ मेरे पति भी बेटी की देखभाल करते हैं. मेरे से ज्यादा वे बेटी की केयर करते हैं. ऐसे में मुझे मां जैसे हालात का सामना नहीं करना पड़ रहा. इस के बाद भी मुझे लगता है कि पहले के मुकाबले बच्चों को अब पालना मुश्किल हो गया है. आज बच्चों को बड़ी ही समझदारी से समझाना पड़ता है. वे पहले के बच्चों से अधिक जागरूक हैं. सवाल ज्यादा करते हैं. कई बार मनमानी भी ज्यादा करने की कोशिश करते हैं. अगर पेरैंट्स ने बहुत चालाकी से उन्हें हैंडल नहीं किया तो बच्चे दूर हो जाते हैं. आज के बच्चों के शौक भी बदल गए हैं.

आप का बचपन कैसा था?

मैं पढ़ाई में काफी होशियार थी. मुझे साइंस पसंद थी. मनोविज्ञान मेरा पसंदीदा विषय था. मेरा सपना था कि मैं मनोविज्ञानी बनूं. 10वीं कक्षा के बाद मैं पढ़ाई जारी नहीं रख सकी. बाद में कई बार सोचा कि पढ़ाई पूरी कर लूं पर नहीं कर पाई. मुझे पढ़ने का बचपन में बहुत शौक था. मैं जहां भी किताब देखती थी पढ़ने लगती थी.

बचपन में ‘चंपक’ पत्रिका बहुत पढ़ी. हमारे घर के पास एक दुकान होती थी, जिस में किताबें पढ़ने के लिए किराए पर मिलती थीं. हमें जो जेबखर्च मिलता था उस से हम ‘चंपक’ खरीद कर पढ़ते थे. बाद में ‘गृहशोभा’ भी पढ़ी. गृहशोभा के लेख मुझे बहुत पसंद आते हैं. इस पत्रिका ने हमेशा ही महिलाओं को नई राह दिखाने का काम किया है. सच, किताबों से अच्छा कोई दोस्त नहीं होता.

आप ने क्रिश्चियन धर्म अपनाया. कोई परेशानी नहीं आई?

मेरा पहले का नाम वैष्णवी महंत था. जब मेरे नाम के साथ मैकडोनाल्ड लगा तो लोगों को लगा कि मैकडोनाल्ड कंपनी मेरी है. यह भ्रम हर जगह दूर करना पड़ता है. क्रिश्चियन धर्म स्वीकार करने के बाद कोई परेशानी नहीं हुई. पतिपत्नी के बीच रिश्ता हमेशा आपसी सहयोग और प्यार पर निर्भर करता है. इस का जाति और धर्म से कोई लेनादेना नहीं होता. अब समाज का बड़ा हिस्सा ऐसी बातों को महत्त्व नहीं देता. अब लोगों की दूसरों के जीवन में ताकझांक करने की आदत कम हो गई है.

पहले और अब के कलाकारों में क्या फर्क देखती हैं?

हम लोग जब फिल्मी दुनिया में आए थे तो किसी तरह का कोई ज्ञान नहीं था. रोल करते समय डायरैक्टर के समझाने पर सीखते गए. अब के युवा फिल्मी लाइन में आने से पहले पूरी तैयारी कर के आते हैं. इसे फिल्मी बोली में गू्रमिंग कहते हैं.

कहानी की सफलता में क्या बातें माने रखती हैं?

हर कहानी की सफलता में 5 तत्त्व ही होते हैं- लव, लव ट्राइऐंगल, जैलसी, ऐक्शन और सस्पैंस. हर कहानी इन्हीं के आसपास घूमती है.

जानिए आखिर कैसे बनता है पोर्सिलेन

पोर्सिलेन एक पारभासक (ट्रांसल्यूसेंट) रंघ्रहीन (नानपोरस) पदार्थ है जिस का उपयोग मृत्तिका शिल्प में होता है. पोर्सिलेन यानी चीनीमिट्टी से बनी चीजें घरों, प्रयोगशालाओं और उद्योगों (ज्यादातर बिजली के उद्योग) में खूब काम आती हैं. पोर्सिलेन के बरतन तरल व गैसीय पदार्थों के लिए अभेद्य व अपारगम्य हैं तथा परिवर्तित होने वाले तापमान से काफी हद तक अप्रभावी रहते हैं.

पोर्सिलेन को काओलिन (पोर्सिलेन मिट्टी), क्वार्ट्ज (स्फटिक) व फेलस्पार के मिश्रण को आग में जला कर बनाया जाता है. सख्त पोर्सिलेन ज्यादातर 50% काओलिनाइट, 25% क्वार्ट्ज व 25% फेलस्पार के मिश्रण से बनाया जाता है. नर्म पोर्सिलेन में इन का अनुपात क्रमश: 25% 45%, तथा 30% होता है. नर्म पोर्सिलेन को कम ताप पर जलाया जा सकता है, अत: इस से चीजें बनाना सस्ता पड़ता है.

निर्माण की प्रक्रिया : चीनीमिट्टी के बरतन व अन्य चीजें बनाने की प्रक्रिया बहुत लंबी व जटिल है. काओलिनाइट एक तरह का मिट्टी खनिज (क्ले मिनरल) है, जो काओलिन में मौजूद होता है. काओलिन को धोने के बाद छाना जाता है और अच्छी तरह बारीक किए स्फटिक व फेलस्पार में पानी के साथ पूरी तरह मिलाया जाता है. इस मिश्रण में सोडा व अन्य चीजें भी मिलाई जाती हैं.

इस प्लास्टिक पोर्सिलेन के मिश्रण को अच्छी तरह साना व गूंधा जाता है और प्लास्टर के सांचों में ढाला जाता है. जब यह सूख जाता है तो इसे करीब 900 डिगरी सेंटिग्रेड ताप पर भट्ठी में पकाया जाता है. तब यह पोर्सिलेन सख्त व जलरोधी हो जाता है.

इस अवस्था में यह दिखने में चिकना व सुंदर नहीं होता. इसे चमकदार बनाने के लिए इस की ‘ग्लेजिंग‘ की जाती है.

पोर्सिलेन से बनी इन चीजों को फिर एक ऐसे तरल में डुबोया जाता है जिस में ये सब पदार्थ तो होते हैं पर स्फटिक व फेलस्पार की प्रधानता रहती है. तब इन्हें करीब 1400 डिगरी सेंटिग्रेड ताप पर पकाया जाता है. इस से इस की चमक पक्की हो जाती है. पकाने की यह प्रक्रिया 20 से 30 घंटे तक चलती है. इस से पोर्सिलेन के कण आपस में मिल कर एक हो जाते हैं या अच्छी तरह जुड़ जाते हैं.

चमकदार पोर्सिलेन पर रंगों के द्वारा पेंटिंग कर के सुंदरसुंदर रंगीन नमूने बनाए जा सकते हैं. ग्लेजिंग के साथ इन्हें पिघला कर टिकाऊ बनाने के लिए पेंटिंग की हुई चीजों को ‘इनेमलिंग फरनेस’ में 800 डिगरी सेंटिग्रेड पर पकाया जाता है. आधुनिक तकनीक में कभीकभी ग्लेजिंग के पहले ही पेंटिंग कर दी जाती है. इस लंबी प्रक्रिया के बाद पोर्सिलेन की चीजें बाजार में बिकने के लिए तैयार हो जाती हैं.   

परिवर्तन

टीचर सुनील कुमार सभी विद्यार्थियों के चहेते थे. अपनी पढ़ाने की रोचक शैली के साथसाथ वे समयसमय पर पाठ्यक्रम के अलावा अन्य उपयोगी बातों से भी छात्रों को अवगत कराते रहते थे जिस कारण सभी विद्यार्थी उन का खूब सम्मान करते थे. 10वीं कक्षा में उन का पीरियड चल रहा था. वे छात्रों से उन की भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछ रहे थे.

‘‘मोहन, तुम पढ़लिख कर क्या बनना चाहते हो?’’ उन्होंने पूछा.

मोहन खड़ा हो कर बोला, ‘‘सर, मैं डाक्टर बनना चाहता हूं.’’

इस पर सुनील कुमार मुसकरा कर बोले, ‘‘बहुत अच्छे.’’

फिर उन्होंने राजेश की ओर रुख किया, ‘‘तुम?’’

‘‘सर, मेरे पिताजी उद्योगपति हैं, पढ़लिख कर मैं उन के काम में हाथ बंटाऊंगा.’’

‘‘उत्तम विचार है तुम्हारा.’’

अब उन की निगाह अश्वनी पर जा टिकी.

वह खड़ा हो कर कुछ बताने जा ही रहा था कि पीछे से महेश की आवाज आई, ‘‘सर, इस के पिता मोची हैं. अपने पिता के साथ हाथ बंटाने में इसे भला पढ़ाई करने की क्या जरूरत है?’’ इस पर सारे लड़के ठहाका लगा कर हंस पड़े परंतु सुनील कुमार के जोर से डांटने पर सब लड़के एकदम चुप हो गए.

‘‘महेश, खड़े हो जाओ,’’ सुनील सर ने गुस्से से कहा.

आदेश पा कर महेश खड़ा हो गया. उस के चेहरे पर अब भी मुसकराहट तैर रही थी.

‘‘बड़ी खुशी मिलती है तुम्हें इस तरह किसी का मजाक उड़ाने में,’‘ सुनील सर गंभीर थे, ‘‘तुम नहीं जानते कि तुम्हारे बाबा ने किन परिस्थितियों में संघर्ष कर के तुम्हारे पिता को पढ़ाया. तब जा कर वे इतने प्रसिद्ध डाक्टर बने.’’ महेश को टीचर की यह बात चुभ गई. वह अपने पिताजी से अपने बाबा के बारे में जानने के लिए बेचैन हो उठा. उस ने निश्चय किया कि वह घर जा कर अपने पिता से अपने बाबा के बारे में अवश्य पूछेगा.

रात के समय खाने की मेज पर महेश अपने पिताजी से पूछ बैठा, ‘‘पिताजी, मेरे बाबा क्या काम करते थे?’’

अचानक महेश के मुंह से बाबा का नाम सुन कर रवि बाबू चौंक गए. फिर कुछ देर के लिए वे अतीत की गहराइयों में डूबते चले गए.

पिता को मौन देख कर महेश ने अपना प्रश्न दोहराया, ‘‘बताइए न बाबा के बारे में?’’

रवि बाबू का मन अपने पिता के प्रति श्रद्धा से भर आया. वे बोले, ‘‘बेटा, वे महान थे. कठोर मेहनत कर के उन्होंने मुझे डाक्टरी की पढ़ाई करवाई. तुम जानना चाहते हो कि वे क्या थे?’’

महेश की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी.

उस के पिता बोले, ‘‘तुम्हारे बाबा रिकशा चलाया करते थे. अपने शरीर को तपा कर उन्होंने मेरे जीवन को शीतलता प्रदान की. उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि हर काम महान होता है. मुझे याद है, मेरे साथ अखिल नाम का एक लड़का भी पढ़ा करता था. उस के पिता धन्ना सेठ थे. वह लड़का हमेशा मेरा मजाक उड़ाया करता था. पढ़ने में तो उस की जरा भी रुचि नहीं थी.

‘‘मैं घर जा कर पिताजी से जब यह बात कहता तो वे जवाब देते कि क्या हुआ, अगर उस ने तुम्हेें रिकशा वाले का बेटा कह दिया? अपनी वास्तविकता से इंसान को कभी नहीं भागना चाहिए. झूठी शान में रहने वाले जिंदगी में कुछ नहीं कर पाते. कोई भी काम कभी छोटा नहीं होता.

‘‘पिताजी की यह बात मैं ने गांठ बांध ली. इस का परिणाम यह हुआ कि मुझे सफलता मिलती गई, लेकिन अखिल अपनी मौजमस्ती की आदतों में डूबा रहने के कारण बरबाद हो गया. जानते हो, आज वह कहां है?’’

महेश उत्सुकता से बोला, ‘‘कहां है पिताजी?’’

‘‘पिता की दौलत से आराम की जिंदगी गुजारने वाला अखिल आज बड़ी तंगहाली में जी रहा है. पिता के मरने के बाद उस ने उन की दौलत को मौजमस्ती व ऐयाशी में खर्च किया. आजकल वह पैसेपैसे को मुहताज है. अपनी बहन के यहां पड़ा हुआ उस की रहम की रोटी खा रहा है और उस का बहनोई उस के साथ नौकरों जैसा व्यवहार करता है.‘‘ महेश ने पिता की बातों को गौर से सुना. अब उसे एहसास हो रहा था कि अश्वनी के पिता उसे वैसा बना सकते हैं, जैसे वे स्वयं हैं लेकिन वे उसे पढ़ालिखा रहे हैं ताकि वह कुछ अच्छा बन सके. फिर यह सोच कर वह कांप उठा कि कहीं उसे अखिल कीतरह मुसीबतों भरी जिंदगी न गुजारनी पड़े.

दूसरे दिन जब वह स्कूल गया तो सब से पहले अश्वनी से ही मिला और बोला, ‘‘कल मैं ने तुम्हारा मजाक उड़ाया था, मैं बहुत शर्मिंदा हूं… मुझे माफ कर दो,’’ महेश का स्वर पश्चात्ताप में डूबा हुआ था.

अश्वनी हंस पड़ा, ‘‘अरे यार, ऐसा मत कहो. वह बात तो मैं ने उसी समय दिमाग से निकाल दी थी.’’

‘‘यह तो तुम्हारी महानता है अश्वनी… क्या तुम मुझे अपना मित्र बनाओगे?’’

यह सुन कर अश्वनी जोर से हंसा और उस ने अपना हाथ महेश की तरफ बढ़ा दिया. अश्वनी के हाथ में अपना हाथ दे कर महेश बहुत राहत महसूस कर रहा था. 

समझिए होंठों की भाषा

एक अबोध सी युवती ने हाल ही में एक समस्या भेजी कि उसे एक सहेली के साथ चुंबन करने में आनंद मिलता है. इस से कुछ होगा तो नहीं?

वैज्ञानिक कहते हैं कि चुंबन से बहुत कुछ होता है. चुंबन असल में रिश्तों को पक्का करते हैं और अगर पहला चुंबन अच्छा न रहे तो 60% पुरुष और 59% महिलाएं रिश्तों को आगे नहीं बढ़ातीं.

इस की वजह यह है कि शरीर के संवेदनशील हिस्सों में होंठ सब से ज्यादा संवेदन पाने के लिए सक्षम होते हैं. चुंबन से ही पता चल जाता है कि दूसरा मित्र है या दुश्मन. चुंबन होते ही शरीर के कैमिकल काम करना शुरू कर देते हैं. चुंबन होते ही होंठों में मौजूद स्पर्श ग्रंथियां संदेश देने लगती हैं और प्रेम के औक्सीटौसिन हारमोन कैमिकल को बनाना शुरू कर देती हैं. दिल की धड़कन बढ़ जाती है, तनाव कम हो जाता है, शरीर सुरक्षित महसूस करने लगता है, खून की नसें आराम से काम करना शुरू कर देती हैं, गाल लाल हो जाते हैं और नसें फड़फड़ाने लगती हैं.

इसी को तो प्रेम कहते हैं, जो 2 लड़कियों में हो सकता है, 2 लड़कों में हो सकता है, मांबच्चों में हो सकता है और प्रेमीप्रेमिका में तो होता ही है. इस पर न तो किसी तरह का ऐतराज होना चाहिए और न ही बंदिशें. कई समाज इस प्रकार के चुंबन को खुले में करने में हिचकिचाते हैं, जो गलत है. चुंबन प्रेम और सैक्स की शुरुआत हो सकता है पर यह शुभ शुरुआत है और इस पर किसी भी तरह की रोकटोक है, तो इस का अर्थ है कि समाज खुद पर ही भरोसा नहीं करता और उसे नागरिकों के विवेक पर संदेह है.

जो समाज खुद पर भरोसा नहीं करता वह कमजोर होता है, जानवरों की तरह होता है. वह एक हो कर शत्रुओं से रक्षा नहीं कर सकता, न ही वह प्रकृति से जूझ सकता. उस के लिए प्रेम, सैक्स, बच्चे सुख नहीं, शारीरिक जरूरत के कारण मिला दंड हैं. ऐसा असंतुष्ट समाज हमेशा तनाव में रहता है और सदा खुद से लड़ता रहता है. पतिपत्नी में, बच्चों में, मित्रोंसहेलियों में, अनजानों में अपनापन व विश्वास घोलना हो, आत्मविश्वास जगाना हो, आनंद की अनुभूति का लाभ उठाना हो तो होंठों की भाषा समझिए, जो बिना शब्दों के बहुत कुछ कहने की कला जानते हैं.

बौलीवुड के रोमांटिक डायलौग से बनाएं वैलेंटाइन खास

बौलीवुड और रोमांस का पुराना नाता है. जब भी हम बड़े परदे पर हीरोहीरोइन को रोमांस करते देखते हैं तो हमारे दिल में भी ‘कुछकुछ होता है’, दिल में घंटियां बजने लगती हैं, सांसें थम सी जाती हैं. हम जिस से प्यार करते हैं उस का चेहरा नजर आने लगता है. हम भी राज और सिमरन बनना चाहते हैं, प्रेम की तरह निशा को अपने दिल की बात बताना चाहते हैं. प्यार के मीठे पलों को जीना चाहते हैं. अगर आप भी किसी से प्यार करते हैं लेकिन इजहार करने से कतराते हैं तो इस वैलेंटाइन बौलीवुड के इन 10 रोमांटिक डायलौग से अपने प्यार का इजहार करिए और वैलेंटाइन को खास व यादगार बनाइए.

1. आप अपनी बैस्ट फ्रैंड से प्यार करते हैं, लेकिन इस डर से बताने से हिचकिचाते हैं कि अगर आप ने उसे अपने दिल की बात बताई तो कहीं आप की दोस्ती न टूट जाए, तो डरना छोडि़ए और इस वैलेंटाइन फिल्म ‘कुछकुछ होता है’ का यह डायलौग कह कर अपने दिल की बात उसे जरूर बताएं.

‘प्यार दोस्ती है, अगर वह मेरी सब से अच्छी दोस्त नहीं बन सकती तो मैं उस से कभी प्यार कर ही नहीं सकता, क्योंकि दोस्ती बिना तो प्यार होता ही नहीं, सिंपल प्यार दोस्ती है.’’

अगर वह भी आप से प्यार करती है तो इस का जवाब जरूर देगी. लेकिन अगर वह इस बात से नाराज हो जाए तो उस से यह कहिए कि अरे यार तुम मेरी सब से अच्छी फ्रैंड हो और शाहरूख मेरा फेवरेट. बस और क्या, तुम भी ना. हर रिश्ते में प्यार होता है, हमारा रिश्ता तो सब से खास है माई डियर फ्रैंड.

2. आप थोड़े कंफ्यूज हैं कि कैसे प्रपोज करें तो शाहरूख स्टाइल को कौपी कर सकते हैं. फोन पर बातचीत करते हुए बातोंबातों में बोल दें. ‘‘आई लव यू ककक किरण.’’ यकीन मानिए आप की फ्रैंड खुद से कहेगी किरण नहीं, मेरा नाम श्वेता है. बस फिर क्या कह डालिए. ‘‘हां आई लव यू श्वेता.’’

3. अगर काम की वजह से या किसी अन्य कारण से इस वैलेंटाइन आप अपने पार्टनर के साथ नहीं हैं और वह आप से रूठी है, आप से बात नहीं कर रही है, आप का फोन नहीं उठा रही है तो ‘फना’ फिल्म का यह डायलौग मैसज कर के अपने रूठे पार्टनर को आप मना सकते हैं.

‘‘हम से दूर जाओगे कैसे, दिल से हमें भुलाओगे कैसे, हम वो खुशबू हैं जो सांसों में बसते हैं, खुद की सांसों को रोक पाओगे कैसे?’’

4. आप से कोई लड़का बेइंतजा प्यार करता था, लेकिन आप ने कभी उस के प्यार का जवाब नहीं दिया या हमेशा उस के प्यार को ठुकराया है, पर अब कुछ दिनों से आप भी उस से प्यार करने लगी हैं तो ‘रब ने बना दी जोड़ी’ फिल्म का यह डायलौग कह कर प्यार को एक नया नाम दें ‘‘हर इश्क का एक वक्त होता है, वो हमारा वक्त नहीं था, पर इस का ये मतलब नहीं की वो इश्क नहीं था.’’

5. ना चाहते हुए भी आप दोनों को एकदूसरे से दूर जाना पड़ रहा हो तो फिल्म ‘हमारी अधूरी कहानी’ का यह डायलौग कह कर बताएं कि वह आप के लिए कितनी खास है और आप की लाइफ में कितनी अहमियत रखती है. ‘‘तुम भी मुझ से प्यार करती हो बहुत प्यार, लेकिन कहोगी नहीं. तड़पोगी मेरे बगैर लेकिन जताओगी नहीं. मेरे पास आना चाहती हो, सीने से लग के रोना चाहती हो, दिल में रहना चाहती हो, लेकिन ऐसा करोगी नहीं. लेकिन मैं तुम्हारी तरह नहीं हूं. मैं तो रह ही नहीं सकता ये कहे बिना कि मुझे तुम से इश्क है.’’ यकीन मानिए आप दोनों को हिम्मत मिलेगी, अपने प्यार को मंजिल तक पहुंचाने की.

6. आप जिस लड़की से प्यार करते हैं, वह हर बार आप का प्रपोजल ठुकरा रही है और आप फिर से उसे प्रपोज करना चाहते हैं तो इस बार अपने प्रपोज करने के स्टाइल में थोड़ा चेंज लाइए, उसे फिल्म ओम शांति ओम का यह डायलौग कह कर इंप्रैस करने की कोशिश करिए. ‘‘अगर किसी चीज को सच्चे दिल से चाहो, तो पूरी कायनात उसे तुम से मिलवाने की कोशिश में लग जाती है.’’ और मैं तुम्हें सच्चे दिल से चाहता हूं, मुझे पूरा यकीन है कि तुम मेरे प्यार को जरूर समझोगी.

7. कोई आप से प्यार करता है, आप को खुश रखता है, आप की केयर करता है, जाने अनजाने में आप से अपनी दिल की बात भी कह चुका है, लेकिन आप आज भी अपने अतीत को भुला नहीं पाईं हैं और आगे बढ़ने में आप को डर लग रहा है तो अतीत को भूल जाइए और अपने आज को ‘आशिकी-2’ फिल्म के इस डायलौग से खूबसूरत बनाइए, ‘‘ये जिंदगी चल तो रही थी, पर तेरे आने से मैं ने जीना शुरू किया.’’

8. ऐसा नहीं है कि वैलेंटाइन पर सिर्फ युवा ही अपने प्यार का इजहार कर सकते हैं, यह प्यार का दिन है, इस दिन हर कोई अपने दिल की बात बता सकता है. भले ही आप की शादी को कई साल हो गए हों, लेकिन इस दिन प्यार के तीन शब्द आप के रिश्ते में फिर से वैसी मिठास घोल देते हैं जैसा पहले हुआ करता था. इस दिन बागबान फिल्म का ‘‘प्यार ही तो वह जादू है, जो उम्र भर जवां बनाए रखता है,’’ यह डायलौग अपनी पत्नी से कह कर उन्हें जरूर बताएं कि वह आप के लिए कितनी खास है.

9. हम जिस से प्यार करते हैं, हम झगड़ते भी उसी से हैं. अगर आप ने किसी बात पर अपने पार्टनर को दुख पहुंचाया है तो इस दिन फिल्म मोहब्बतें का यह डायलौग कह कर उन्हें मनाएं ‘‘मोहब्बत बहुत खूबसूरत होती है तो क्या हुआ अगर वह अपने साथ थोड़ा दर्द लाती है.’’

10. आप जल्द ही शादी के बंधन में बंधने वाले हैं फोन पर बातें कर के एकदूसरे को जाननेसमझने, की कोशिश कर रहे हैं तो आप के लिए ‘विवाह’ फिल्म के इस डायलौग से बेहतर कुछ भी नहीं हो सकता. ‘‘ये जो सगाई और शादी के बीच का वक्त होता है ना बहुत ही अद्भुत होता

फरवरी के दौरान होने वाले खेती के खास काम

फरवरी में सर्दी के तेवर ढीले पड़ने से पिछले महीनों से ठंडाए किसान काफी राहत और सुकून महसूस करते हैं. फरवरी के मध्यम मौसम में किसानों को हर घड़ी बीमार पड़ जाने का खौफ नहीं रहता और वे खुल कर काम करने की हालत में रहते हैं. जनवरी में तो किसानों का ज्यादा वक्त आग तापते ही बीतता है. कंबल पर कंबल लादने के बाद भी बदन सर्दी से सुन्न बना रहता है, मगर फरवरी की फिजा और आबोहवा तनबदन में चुस्तीफुरती भरने वाली होती है. काम चाहे गन्ने की बोआई का हो या तेजी से तैयार हो रही गेहूं की फसल की देखभाल का, किसान पूरी शिद्दत से जुट जाते हैं. फरवरी में सुस्ती एकबारगी नौदोग्यारह हो चुकी होती है और खेतों में चहलपहल बढ़ जाती है.

आइए लेते हैं एक जायजा, फरवरी के दौरान खेतीजगत में होने वाले खास कामों का :

* शुरुआत मिठास से करें, तो 15 फरवरी के बाद गन्ने की बोआई का सिलसिला शुरू किया जा सकता है. बोआई के लिए गन्ने की ज्यादा पैदावार देने वाली किस्मों का चुनाव करना चाहिए. किस्मों के चयन में अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों से मदद ली जा सकती है.

* गन्ने का जो बीज इस्तेमाल करें वह पक्के तौर पर बीमारी रहित होना चाहिए. इस के बावजूद बोआई से पहले बीजों को अच्छे किस्म के फफूंदीनाशक से उपचारित कर लेना चाहिए. बोआई के लिए 3 पोरी व 3 आंख वाले गन्ने के स्वस्थ टुकड़े बेहतर होते हैं.

* गन्ने के जिन खेतों में रटून यानी पेड़ी की फसल रखनी हो, तो नौलख फसल यानी पौधा फसल की कटाई खेत की सतह से बिलकुल सटाते हुए बढि़या धारदार गंड़ासे से करें.

* सही समय से बोई गई गेहूं की फसल में फरवरी में फूल लगने लगते हैं. इस दौरान खेत की सिंचाई हर हालत में कर देना जरूरी है. सिंचाई करते वक्त इस बात का खयाल रखें कि ज्यादा तेज हवाएं न चल रही हों. हवा चल रही हो तो उस के थमने का इंतजार करें और मौसम ठीक होने पर ही खेत की सिंचाई करें. हवा के फर्राटे के बीच सिंचाई करने से पौधों के उखड़ने का पूरा खतरा रहता है.

* इस बीच चना, मटर व मसूर के खेतों का मुआयना कर लेना चाहिए. अगर फसल पर फलीछेदक कीट का हमला नजर आए, तो बगैर चूके मोनोक्रोटोफास दवा का इस्तेमाल करें.

* चूर्णी फफूंदी नामक बीमारी मटर की फसल को काफी नुकसान पहुंचाती है. इस का हमला होने पर बचाव के लिए कैराथेन दवा के 0.06 फीसदी घोल का छिड़काव करें. कैराथेन काफी कारगर दवा है, लिहाजा इस के इस्तेमाल के बाद फसल उम्दा होगी.

* साल का यह दूसरा महीना लोबिया, राजमा व भिंडी जैसी फसलों की बोआई के लिए मुफीद होता है. अगर इन चीजों की खेती का इरादा हो, तो इन की बोआई निबटा लेनी चाहिए.

* मध्य फरवरी यानी 15 फरवरी के बाद तेल की फसल सूरजमुखी की बोआई करना मुनासिब रहता है. अगर यह फसल लगानी हो तो 15 से 29 फरवरी के बीच इस की बोआई कर देनी चाहिए. बोआई के लिए अपने इलाके के मुताबिक किस्मों का चयन करें. इस के लिए कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक से भी बात कर सकते हैं. हां, सूरजमुखी के बीजों को बोने से पहले कार्बंडाजिम या थीरम से उपचारित करना न भूलें.

* यदि अभी तक टमाटर की गरमी वाली फसल की रोपाई का काम बाकी पड़ा है, तो उसे फटाफट निबटाएं.

* टमाटर के पौधों की रोपाई 45×60 सेंटीमीटर के फासले पर करें. रोपाई धूप ढलने के बाद यानी शाम के वक्त करें. रोपाई के बाद बगैर चूके हलकी सिंचाई करें.

* जनवरी के दौरान लगाए गए टमाटर के पौधों को नाइट्रोजन मुहैया कराने के लिए पर्याप्त मात्रा में यूरिया डालें. ऐसा करने से फसल उम्दा होगी.

* यह महीना बैगन की रोपाई के लिहाज से भी मुफीद होता है, लिहाजा उम्दा नस्ल का चयन कर के बैगन की रोपाई निबटा लें.

* बैगन की उम्दा फसल के लिए रोपाई से पहले खेत की कई बार जुताई कर के उस में खूब सड़ी हुई गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद भरपूर मात्रा में मिलाएं. इस के अलावा खेत में 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस व 80 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से डाल कर अच्छी तरह खेत की मिट्टी में मिला दें.

* बैगन के पौधों की रोपाई भी सूरज ढलने के बाद यानी शाम के वक्त ही करें, क्योंकि सुबह या दोपहर में रोपाई करने से धूप की वजह से पौधों के मुरझाने का डर रहता है. रोपाई करने के फौरन बाद पौधों की हलकी सिंचाई याद से करें.

* फरवरी में ही मैंथा की बोआई भी निबटा लेनी चाहिए. इस के लिए 400-500 किलोग्राम जड़ों का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. बोआई से पहले 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 75 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

* मैंथा की बोआई करने से पहले खेत के तमाम खरपतवार निकालना न भूलें, क्योंकि ये फसल की बढ़वार में रुकावट पैदा करते हैं. बोआई के बाद खेत की हलकी सिंचाई करना न भूलें.

* अपने आम के बगीचे का मुआयना करें. इन दिनों आम में चूर्णिल आसिता बीमारी का काफी अंदेशा रहता है, लिहाजा कैराथेन दवा का छिड़काव करें. श्यामवर्ण और छोटी पत्ती वाले रोग की रोकथाम के लिए ब्लाइटाक्स 50 और जिंक सल्फेट का छिड़काव करें. ऐसा करने से आम के पेड़ महफूज रहेंगे.

* बीमारियों के साथसाथ इन दिनों आम के पेड़ों को कुछ कीटों का भी खतरा रहता है. अगर कीटों का हमला नजर आए तो कृषि विज्ञान केंद्र के फल वैज्ञानिक की राय ले कर कीटों का निबटारा करें.

* आम के साथसाथ सदाबहार फल केले के बागों का खयाल रखना भी लाजिम है. बाग में फैली तमाम सूखी पत्तियां बटोर कर खाद के गड्ढे में डाल दें. बाग की बाकायदा सफाई के बाद 15 दिनों के फासले पर 2 दफे सिंचाई भी करें.

* केले की उम्दा फसल हासिल करने के लिए बाग की निराईगुड़ाई करने के बाद पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन व पोटाश वाली खादें डालें.

* केले के पेड़ों पर अगर किसी बीमारी या कीटों का हमला नजर आए तो तुरंत उस का इलाज फल वैज्ञानिक की राय के मुताबिक करें.

* इस महीने नीबू नस्ल के पौधों के लिए बोआई करना मुनासिब रहता है, लिहाजा नीबू, संतरा व मौसमी वगैरह के बीजों की बोआई पौधशाल में की जा सकती है. पौधशाला में कली बांधने का काम भी निबटाएं.

* पहले से लगे नीबू, संतरा व मौसमी वगैरह के पेड़ों में नाइट्रोजन व पोटाश वाली खादें माहिरों से राय ले कर डालें.

* आड़ू के पेड़ों का मुआयना करें. उन में पर्णकुंचन माहू कीट लगने पर पत्तियां सिकुड़ जाती हैं. अगर कीट का असर हो तो बचाव के लिए मेटासिस्टाक्स दवा का छिड़काव करें. एक बार का छिड़काव पूरी तरह कारगर न हो, तो 2 हफ्ते बाद दोबारा छिड़काव करें.

* आड़ू के पेड़ पूरी तरह स्वस्थ भी नजर आएं, तो भी उन में निराईगुड़ाई कर के जरूरी खादें डालना न भूलें.

* इस कम ठंडे महीने में अंगूर की कलमें लगाना सही रहता है. कलमों की रोपाई के लिए उम्दा नस्ल की कलमों का बंदोबस्त करें.

* अंगूर की कलमों की रोपाई के साथसाथ पहले से लगी बेलों की देखभाल भी जरूरी है. अकसर इस दौरान अंगूर की बेलों पर श्यामवर्ण रोग लग जाता है. ऐसी हालत में इलाज के लिए ब्लाइटाक्स 50 ईसी दवा का इस्तेमाल करें. इस कारगर दवा के छिड़काव से श्यामवर्ण बीमारी ठीक हो जाती है.

* आमतौर पर फरवरी तक ठंडक का मौसम काफी हद तक खत्म सा हो जाता है, लिहाजा कई पशुपालक लापरवाह हो जाते हैं और अपने मवेशियों को सर्दी से बचाने के उपाय बंद कर देते हैं. मगर ऐसा करना अकसर काफी घातक साबित होता है, लिहाजा सावधान रहें.

* हकीकत तो यह है कि जाती हुई सर्दी इनसानों के साथसाथ जानवरों को भी बीमार करने वाली होती है, इसलिए सर्दी से बचाव के उपाय एकदम से बंद न कर के धीरेधीरे बंद करें. बेहतर तो यह होगा कि मार्च की शुरुआत तक अपने जानवरों को गरम कपड़े ओढ़ा कर रखें.

* अपने मुरगामुरगियों के मामले में भी चौकन्ने रहें ताकि वे बीमार न होने पाएं.

* गाय या भैंस हीट में आए तो उसे पशु चिकित्सक के जरीए गाभिन कराने में लापरवाही न बरतें.

ठंडा तरबूज करेगा जेब गरम

गरमियों के तपिश भरे दिनों में अगर कुदरती तौर पर ठंडक पहुंचाने वाली चीज की बात की जाए तो तरबूज पहले नंबर पर आएगा.

इस की खेती ज्यादातर उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आसाम, तामिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, बिहार व पश्चिम बंगाल राज्यों में की जाती है. अगर उन्नत तरीके से इस की थोड़ी अगेती खेती कर ली जाए तो मार्केट में पहले पेश हो कर यह ठंडा फल किसानों की जेब भी खूब गरम कर सकता है.

बेबी वाटरमैलन की बढ़ रही है मांग : इस बारे में कृषि विज्ञान केंद्र, दरियापुर, रायबरेली (उत्तर प्रदेश) के उद्यान विशेषज्ञ डा. एसबी सिंह कहते हैं कि किसानों को अच्छा मुनाफा लेने के लिए बोआई से पहले यह तय कर लेना चाहिए कि तरबूज की बिक्री आसपास के बाजारों में करनी है या फिर उसे बड़े शहरों में भेजना है. आजकल महानगरों में छोटे परिवारों की संख्या ज्यादा होने से छोटे आकार के तरबूजों (2-3 किलोग्राम वजन वाले) की मांग ज्यादा बनी रहती है. ऐसे तरबूजों को बेबी वाटरमैलन (छोटा तरबूज) के नाम से जाना जाता है. बेबी वाटरमैलन को फ्रिज में भी आसानी से रख सकते हैं. वैसे देहातों में आज भी बड़े आकार के तरबूजों की ही मांग ज्यादा है.

जमीन : तरबूज की फसल के लिए बलुई दोमट जमीन बेहतर होती है. इसी वजह से नदियों के किनारे की दियारा जमीन इस के लिए सब से अच्छी मानी जाती है. जमीन में जलनिकासी और सिंचाई का अच्छा इंतजाम होना चाहिए. जलभराव से इस फसल को काफी नुकसान पहुंचता है. परीक्षणों के मुताबिक पाया गया है कि दोमट मिट्टी जिस का पीएच मान 6.5 से 7 के बीच हो तरबूज की खेती के लिए ज्यादा बढि़या होती है.

बोआई का समय : तरबूज के बीजों के जमाव के लिए 21 डिगरी सेंटीग्रेड से नीचे का तापमान सही नहीं होता है. यह पाले को बर्दाश्त नहीं कर पाता है. इस की बढ़वार के लिए ज्यादा तापमान की जरूरत होती है. इसी वजह से इस की बोआई देश में अलगअलग समय पर की जाती है. उत्तरी भारत के मैदानी भागों में तरबूज की बोआई जनवरी के शुरुआती दिनों से ले कर मार्च तक की जाती है. उत्तरीपूर्वी और पश्चिमी भारत में इस की बोआई नवंबर से जनवरी तक की जाती है. दक्षिणी भारत में इस की बोआई दिसंबर से जनवरी महीनों के दौरान की जाती है.

खेत की तैयारी : सब से पहले खेत की गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए. उस के बाद 3-4 जुताइयां कल्टीवेटर या देशी हल से कर के मिट्टी को खूब भुरभुरी बना लेना चाहिए. नमी की कमी होने पर पलेवा जरूर करना चाहिए.

प्रजातियां : बेहतर होगा कि आप इलाकाई विशेषज्ञ से राय ले कर अपने इलाके के लिहाज से मुनासिब प्रजातियां ही बोएं. आप की सुविधा के लिए यहां तरबूज की तमाम प्रजातियों की एक सूची दी जा रही है.

बीज दर : बोआई करने से पहले बढि़या अंकुरण के लिए बीजों को पानी में भिगो दें. इस के बाद किसी फफूंदीनाशक दवा जैसे कार्बेंडाजिम, मैंकोजेब या थीरम से बीजशोधन करें. आमतौर पर छोटे बीज वाली किस्मों के लिए प्रति हेक्टेयर 2-3 किलोग्राम बीज पर्याप्त होते हैं. बड़े बीजों वाली किस्मों के लिए प्रति हेक्टेयर 5 किलोग्राम बीज लगते हैं.

बोआई की विधि : तरबूज की फसल पानी नहीं बर्दाश्त कर पाती है, लिहाजा इसे थोड़ा ऊपर 1 मीटर लंबे और 1 मीटर चौड़े रिज बेड में बोना चाहिए. इस से भी अच्छा होगा कि बीजों को अलगअलग किसी बर्तन जैसे मिट्टी के प्याले वगैरह में रख कर तैयार करें, इस से पौधे ज्यादा तंदुरुस्त होंगे.

पौधों को लाइनों में ही लगाना चाहिए. लाइन से लाइन की दूरी पौधों की किस्म पर निर्भर करती है. सुगर बेबी किस्म के लिए लाइन से लाइन की दूरी 2 मीटर और पौधे से पौधे की दूरी 0.6 मीटर मुनासिब होती है.

खाद व उर्वरक : मिट्टी की जांच कराए बिना खाद व उर्वरकों की मात्रा तय नहीं की जा सकती है. मोटे तौर पर 200-300 क्विंटल खूब सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में डालनी चाहिए. 100-120 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से ले कर उस की आधी मात्रा शुरू में डालनी चाहिए और बाकी आधी मात्रा बोआई के लगभग 1 महीने बाद टापड्रेसिंग के रूप में देनी चाहिए. अगर बाद में नाइट्रोजन की कमी महसूस हो तो 2 फीसदी यूरिया के घोल का पर्णीय छिड़काव किया जा सकता है. बोआई के समय 50-60 किलोग्राम फास्फोरस और 50-60 किलोग्राम पोटाश भी प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में समान रूप से डालनी चाहिए. सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी पाए जाने पर 20-25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर के हिसाब से बोआई के समय ही प्रयोग करना चाहिए.

खरपतवार : खरपतवारों की रोकथाम के लिए बोआई के बाद व जमाव से पहले या नर्सरी में तैयार किया हुआ पौधा है, तो पौधरोपण के कुछ ही दिनों बाद पेंडीमेथलीन दवा की 3.5 लीटर मात्रा 800-1000 लीटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए. समयसमय पर निराईगुड़ाई भी करते रहना चाहिए.

सिंचाई : सिंचाई हमेशा हलकी होनी चाहिए और पानी का ठहराव कभी नहीं होने देना चाहिए. 6-7 दिनों में सिंचाई की जरूरत पड़ती रहती है. फल पकने के समय सिंचाई रोक देनी चाहिए, क्योंकि इस अवस्था में सिंचाई करने से फलों के फटने व मिठास घटने की संभावना बढ़ जाती है. फलों की तोड़ाई करने से 1 हफ्ते पहले सिंचाई जरूर बंद कर देनी चाहिए.

कीट व रोग : कद्दू वर्गीय होने के कारण लगभग वे सारी बीमारियां और कीट इस में भी लगते हैं, जो करेला, कद्दू व लौकी वगैरह में पाए जाते हैं. फफूंदजनित बीमारियों से बचाव के लिए मैंकोजेब जैसे किसी फफूंदीनाशी और कीटों की रोकथाम के लिए किसी हलके कीटनाशी जैसे मैलाथियान वगैरह का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

भंडारण : तोड़ाई करने के बाद तरबूज के फलों का भंडारण 1 हफ्ते से ले कर 3 हफ्ते तक 2.20 डिगरी सेंटीग्रेड से 4.40 डिगरी सेंटीग्रेड तापमान और वायुनमी 80-85 फीसदी होने पर किया जा सकता है.

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