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अपनी पहचान तलाशते राबर्ट वाड्रा

दिक्कत तो यह है कि उन्हें सोनिया गांधी का दामाद या फिर प्रियंका गांधी का पति ही कहा जाता है, इससे कम या ज्यादा कोई पहचान अगर राबर्ट वाड्रा की है तो वह चर्चित और संदिग्ध डीएलएफ जमीन सौदे की है. बीते दिनों वे दिल्ली के गोल्फ क्लब में पत्रकारों से जो कुछ बोले उसे कांग्रेस का बुद्धिजीवी वर्ग पहले से बोलते खासा बवंडर मचा चुका है, मसलन कोई भी देश विरोधी होने के लिए नहीं कहता लेकिन सबका अपना सोचने का नजरिया है, हम किसी पर अपने विचार थोप नहीं सकते. थोड़ा और कुरेदने पर राबर्ट का कहना था कि वे परेशान होकर देश छोडऩे वाले नहीं हैं और जब इच्छा होगी तब राजनीति में आ जाएंगे.

यहां तक बात सधी हुई थी लेकिन जल्द ही राबर्ट वाड्रा पत्रकारों के सामने लडख़ड़ा गए और फिर जो बोले वह जरूर काबिल गौर और उनके दिल का दर्द बयां करता हुआ था बकौल राबर्ट उनके माता-पिता ने उन्हें बहुत सी सम्पत्ति दी हुई है इसलिए उन्हें आगे बढऩे या जीवन सुधारने के लिए प्रियंका की मदद की जरूरत नहीं है.

राजनीति का यह वह दौर है जिसमें प्रियंका गांधी के सक्रिय होने की संभावनाएं और जरूरतें दोनों बढ़ते जा रहे हैं. ऐसे में उनके पति राबर्ट वाड्रा की यह खीझ इस बात की पुष्टि ही करती नजर आती है.

लब्बोलुवाव यह कि कल तक जिस घराने का दामाद होने पर राबर्ट को फख्र होता था अब उस पर वे कुंठित होने लगे हैं और पैसे व जायदाद की बातें करते यह भी जता रहे हैं कि वे कोई घरजमाई नहीं है जो पत्नी या ससुराल वालों के पैसों पर गुजर बसर करता है इसीलिए अपने परिवार की गुणात्मक सम्पन्नता उन्होंने बताई. अभी तक परिवार और पत्नी प्रियंका के बारे में धैर्यपूर्वक बोलते रहने वाले राबर्ट वाड्रा की परेशानी वाकई यह है कि उनकी अपनी अलग पहचान नहीं है और यह स्वाभाविक बात भी है.

ऐसा ही कभी इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी के साथ हुआ था, नतीजतन दाम्पत्य में खटास और दरार आई लेकिन इंदिरा को जो चाहिए था वह उन्होंने हासिल करके छोड़ा. गलत नहीं कहा जाता कि इतिहास अपने आप को दोहराता है इंदिरा और फिरोज के बीच खाई खोदने का जिम्मेदार जवाहरलाल नेहरू को माना जाता है पर अब राबर्ट प्रियंका के बीच कौन आ रहा है जो राबर्ट इस हद तक भड़भड़ा रहे है इसे कोई समझ नहीं पा रहा कि वह परेशान क्यों है.

कोई भी स्वाभिमानी पति नहीं चाहता कि वह पत्नि या ससुराल वालों के नाम से जाना पहचाना जाये लेकिन राबर्ट कैसे अपनी अलग पहचान बनाएँ इसका जवाब यह हल शायद ही किसी के पास हो. वैसे भी यह एक गैर जरूरी बात है लेकिन एक पति की पीड़ा भी है.

पिछले चुनाव प्रचार के वक्त नरेन्द्र मोदी ने कई सार्वजनिक सभाओं में दामाद जी और उनकी जमीनों पर खूब चुटकियां ली थी और उन्हें जेल भेजने की बात भी कही थी. कुर्सी सम्हालने के कुछ दिनों बाद ही राबर्ट वाड्रा पर मोदी ने शिकंजा कसना शुरू किया और फिर ढील दे दी यह सिलसिला अभी तक चल रहा है जिससे संभव है कि राबर्ट वाड्रा डरे और घबराये हुये हों उनकी इस हालत की दूसरी वजह कांग्रेस का लगातार कमजोर होते जाना भी है.

प्रियंका के लिहाज से चिंता की बात यह है कि पहली दफा राबर्ट वाड्रा ने सार्वजनिक रूप से ऐसा कुछ कहा है जो उनके स्वभाव और इन दोनों की आपसी समझ से मेल खाता हुआ नहीं है अभी तक खुद प्रियंका भी बहुत सोच समझकर पति व ससुराल वालों के बारे में बोलती रही हैं क्योंकि उन्हें  मालूम है कि राजनीति हमेशा से ही बहुत बेरहम रही है. संभव है यह इनके दाम्पत्य के दरकने का संकेत हो और अगर बात गुस्से में कही गयी थी तो इसके जिम्मेदार तो खुद राबर्ट वाड्रा ही होते हैं.

जलन

पिछले कुछ दिनों से सरपंच का बिगड़ैल बेटा सुरेंद्र रमा के पीछे पड़ा हुआ था. जब वह खेत पर जाती, तब मुंडे़र पर बैठ कर उसे देखता रहता था. रमा को यह अच्छा लगता था और वह जानबूझ कर अपने कपड़े इस तरह ढीले छोड़ देती थी, जिस से उस के उभार दिखने लगते थे. लेकिन गांव और समाज की लाज के चलते वह उसे अनदेखा करती थी. सुरेंद्र को दीवाना करने के लिए इतना ही काफी था.  रातभर रमेश के साथ कमरे में रह कर रमा की बहू सुषमा जब बाहर निकलती, तब अपनी सास रमा को ऐसी निगाह से देखती थी, जैसे वह एक तरसती हुई औरत है.

रमा विधवा थी. उस की उम्र 40-42 साल की थी. उस का बदन सुडौल था. कभीकभी उस के दिल में भी एक कसक सी उठती थी कि किसी मर्द की मजबूत बांहें उसे जकड़ लें, जिस से उस के बदन का अंगअंग चटक जाए, इसी वजह से वह अपनी बहू सुषमा से जलती भी थी. शाम का समय था. हलकी फुहार शुरू हो गई थी. रमा सोच रही थी कि जमींदार के खेत की बोआई पूरी कर के ही वह घर जाए. उसे सुरेंद्र का इंतजार तो था ही. सुरेंद्र भी ऐसे ही मौके के इंतजार में था. उस ने पीछे से आ कर रमा को जकड़ लिया. रमा कसमसाई और उस ने चिल्लाने की भी कोशिश की, लेकिन फिर उस का बदन, जो लंबे समय से इस जकड़न का इंतजार कर रहा था, निढाल हो गया. सुरेंद्र जब उस से अलग हुआ, तब रमा को लोकलाज की चिंता हुई. उस ने जैसेतैसे अपने को समेटा और जोरजोर से रोते हुए सरपंच के घर पहुंच गई और आपबीती सुनाने लगी. लेकिन सुरेंद्र की दबंगई के आगे कोई मुंह नहीं खोल रहा था.

इधर बेटा रमेश और बहू सुषमा भी सरपंच के यहां पहुंच गए. रमा रो रही थी, लेकिन सुषमा से आंखें मिलाते ही एक कुटिल मुसकान उस के चेहरे पर फैल गई. गांव में चौपाल बैठ गई थी. सरपंच और 3 पंच इकट्ठा हो गए थे. एक तरफ रमा खड़ी थी, तो दूसरी तरफ सुरेंद्र था. गांव के और भी लोग वहां मौजूद थे.

रामू ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘जो हुआ सो हुआ. अब रमा  जो बोलेगी वही सब को मंजूर होगा.’’

तभी दीपू ने कहा, ‘‘हां, रमा बोल, कितना पैसा लेगी? बात को यहीं खत्म कर देते हैं.’’ पैसे की बात सुनते ही बहू सुषमा खुश हो गई कि सास 2-4 लाख रुपए मांग ले, तो घर की गरीबी दूर हो जाए. लेकिन रमा बिना कुछ बोले रोते ही जा रही थी.

जब सब ने जोर दिया, तब रमा ने कहा, ‘‘मेरी समझ में सरपंचजी सुरेंद्र का जल्दी से ब्याह रचा दें, जिस से यह इधरउधर मुंह मारना बंद कर दे.’’ रमा की बात पर सहमत तो सभी थे, पर सुरेंद्र की हरकतों और बदनामी को देखते हुए भला कौन इसे अपनी बेटी देगा. इस बात पर सरपंच भी चुप हो गए. सुरेंद्र भी अब 45 साल के आसपास हो चला था, इसलिए चाहता था कि घरवाली मिल जाए, तो जिंदगी सुकून से कट जाए.

रामू ने कहा, ‘‘रमा, तुम्हारी बात सही है, लेकिन इसे कौन देगा अपनी बेटी?’’

कांटा फंसता जा रहा था और चौपाल किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही थी. इस का सीधा मतलब होता कि सुरेंद्र को या तो गांव से निकाले जाने की सजा होती या उस के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज होती. मामले की गंभीरता को देखते हुए अब सुरेंद्र ने ही कहा, ‘‘मैं यह मानता हूं कि मुझ से गलती हुई है और मैं शर्मिंदा भी हूं. अगर रमा चाहे, तो मैं इस से ब्याह रचाने को तैयार हूं.’’ रमा को तो मनमानी मुराद मिल गई थी, लेकिन तभी बहू सुषमा ने कहा, ‘‘सरपंचजी, यह कैसे हो सकता है? आप के बेटे की सजा मेरी सासू मां क्यों भुगतें? आप तो बस पैसा लेदे कर मामले को सुलझाएं.’’

तब दीपू ने कहा, ‘‘हम रमा की बात सुन कर ही अपनी बात कहेंगे.’’

रमा ने कहा, ‘‘गांव की बात गांव में ही रहे, इसलिए मैं दिल से तो नहीं लेकिन गांव की खातिर सुरेंद्र का हाथ थामने को तैयार हूं.’’ सरपंच और चौपाल ने चैन की सांस ली. बहू सुषमा अपना सिर पकड़ कर वहीं बैठ गई. वहीं बेटा रमेश खुश था, क्योंकि उस की मां को सहारा मिल गया था. अब मां का अकेलापन दूर हो जाएगा. थोड़े दिनों के बाद ही उन दोनों की चुपचाप शादी करा दी गई. पहली रात रमा सुरेंद्र के सीने से लगते हुए कह रही थी, ‘‘विधवा होते ही औरत को अधूरी बना दिया जाता है. वह घुटघुट कर जीने को मजबूर होती है. अरे, अरमान तो उस के भी होते हैं.

‘‘और फिर मेरी बहू सुषमा की निगाहों ने हमेशा मेरी बेइज्जती की है. उस के लिए मेरी जलन ने ही हम दोनों को एक करने का काम किया है.’’ खुशी में सराबोर सुरेंद्र की मजबूत होती पकड़ रमा को जीने का संबल दे रही थी. जो खेत में हुआ वही अब हुआ, पर अब दोनों को चिंता नहीं थी, क्योंकि रमा सुरेंद्र की ब्याहता जो थी

संस्कृति के नाम पर तमाशा

इस देश में गरीबी इसलिए नहीं हैं कि यहां के लोग आलसी हैं या यहां का मौसम खराब है. यहां गरीबी, भुखमरी या बीमारी इसलिए है कि यहां के राजा सदा जनता को बहकाते बहलाते रहे हैं और उस से मोटी रकम वसूल कर उसे भूखानंगा रखते रहे हैं. तानाशाही से आजादी के बाद उम्मीद जगी थी कि इस देश में बदलाव देखने को मिलेगा, पर 1947 के बाद से ही शासकों की ऐसी झड़ी लगी है, जिस ने लूट को पहले की तरह जारी रखा. हां, तकनीक की वजह से पैदावार ज्यादा हो रही है, पर लूट की मात्रा बढ़ गई है. जो चमकधमक दिख रही है, वह तकनीक का कमाल है. शासक तो पहले की तरह या तो मौजमस्ती में डूबे रहते हैं या पूजापाठ में. यमुना के किनारे, दिल्ली के बीच रविशंकर के तमाशे ने फिर जता दिया है कि इस देश की सरकारों को झूठे बहलाने वाले यज्ञहवनों की फिक्र ही ज्यादा है. कहीं कुंभ हो रहा है. कहीं मंदिरों के लिए एकड़ों जमीनें दी जा रही हैं, तो कहीं सेना को देश की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि पूजापाठ की सुरक्षा के लिए लगाया जा रहा है.

इस से गरीबभूखे बीमारों को क्या मिलेगा? आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री ने विशाल यज्ञ किया तो केंद्र सरकार क्यों पीछे रहती. उस ने अपनी ‘दुश्मन’ दिल्ली सरकार के साथ मिल कर दिल्ली में हवनों की झड़ी लगा दी और मनोरंजन का चसका देने के लिए रंगबिरंगे नाच पेश कर दिए. पहले के राजा भी घरघर से सालाना जलसे के लिए पैसे वसूल करते थे. सब को राजा के दरबार में झुकने के लिए मजबूर करते थे. इस बार भी सारे मंत्री कामकाज छोड़ कर यमुना तट पर चरण छूने पहुंच गए–राजा के गुरु के. करोड़ों रुपया, पुलिस का तामझाम, नदी का बहाव रोकने वाले पुल वगैरह जो बने ओलिंपिक खेलों से भी गएबीते हैं, जहां आदमी की ताकत की आजमाइश होती है. विकास का नारा लगाने वाली सरकारें 2000 साल तक गुलामी में झोंकने वाली सोच के जिम्मेदार पुराणों, ग्रंथों, पाखंडों, हवनों से किसे बहला रही हैं? इन प्रपंचों से कपड़े नहीं बनेंगे, मकान नहीं बनेंगे, काम नहीं मिलेगा, पढ़ाई पूरी नहीं होगी, बीमारियां दूर नहीं होंगी. यह तमाशा और इस तरह के देशभर में तमाशे कहीं न कहीं होते रहते हैं. यह सब केवल दिमागी बीमारी पैदा करने वाला है और अफसोस है कि यह सरकारों के खुले समर्थन पर हुआ.

शिक्षा व्यवस्था पर करारा प्रहार है ‘निल बटे सन्नाटा’

सिनेमा समाज का दर्पण होता है. यही वजह है कि इन दिनों शिक्षा जगत व शिक्षा की खामियों को उजागर करने वाली फिल्में बन रही है. कुछ माह पहले जयंत गिलाटकर शिक्षा जगत पर व्यंग प्रधान फिल्म ‘‘चाक एन डस्टर’’ लेकर आए थे. अब अश्विनी अय्यर तिवारी शिक्षा जगत पर व्यंग कसने के अलावा दर्शकों को इंस्पायर करने वाली फिल्म ‘‘निल बटे सन्नाटा’’ लेकर आ रही हैं. 22 अप्रैल को रिलीज होने वाली फिल्म ‘‘निल बटे सन्नाटा’’ में लोगों के घरों में काम करने वाली बाई चंदा (स्वरा भास्कर) और उनकी बेटी की कहानी है. जो कि एक मोड़ पर एक ही सरकारी स्कूल में पढ़ने जाती हैं. इस स्कूल के प्रिंसिंपल और गणित के शिक्षक (पंकज त्रिपाठी) अपने हर विद्यार्थी को लंबी रेस का घोड़ा बनाना चाहते हैं. वह बिना ट्यूशसन लिए बच्चों को पढ़ाते हें. पर क्या वास्तव में आज की शिक्षा पद्धति सही है?

फिल्म ‘‘निल बटे सन्नाटा’’ में प्रिंसिपल का किरदार निभाने वाले अभिनेता पंकज त्रिपाठी वर्तमान समय में शिक्षा की जो स्थिति या जो समस्याएं हैं, उनको लेकर अपनी निजी समझ या सोच के बारे में बताते हुए कहते हैं-‘‘देखिए,मैं फिल्म ‘निल बटे सन्नाटा’की बात नहीं कर रहा हूं. निजी जीवन में शिक्षा को लेकर मेरी दो समझ है. मेरी पहली समझ यह कहती है कि हमारी सरकार नहीं चाहती कि सभी लोग अच्छी शिक्षा ग्रहण करें. यदि सभी लोग अच्छी तरह से पढ़ लिख गए, तो सभी राजनैतिक पार्टियों और नेताओं का बुरा हाल हो जाएगा. इसीलिए सभी सरकारें शिक्षा का ढोंग चलाती हैं.

सरकारें चाहती हैं कि शिक्षा का बजट 500 से 1000 करोड़ हो जाए, नए स्कूल बने. आंगनबाड़ी हो. पर वास्तविक पढ़ाई ना हो. यदि इंसान वास्तव में सही शिक्षा पा गया,तो उसे पास सही और गलत की परख हो जाएगी. फिर वह जाति धर्म आदि के चक्कर में नहीं फंसेगा. तब राजनीतिज्ञ पार्टियों की शामत आ जाएगी. कोई भी नेता अपनी शामत नहीं बुलाना चाहता. दूसरी समझ यह है कि जो वास्तव में पढ़ना चाहते हैं, उनके लिए निजी स्कूल खुल गए हैं. जहां शिक्षा का पूरी तरह से व्यवसायीकरण हो गया है. ऐसे निजी स्कूलों में पढ़ाई हो रही है. मगर फायदा किसी एक बड़ी कंपनी या इंसान को हो रहा है. यह निजी स्कूल या कालेज भी हमारे देश के नेताओं के हैं.’’

शिक्षा को लेकर पंकज त्रिपाठी की जो निजी सोच हैं, वह फिल्म ‘निल बटे सन्नाटा’ में कहीं पूरी करेगी. वह कहते हैं- ‘‘जरूर करेगी. सच कहूं तो मुझे नहीं पता कि सिनेमा कितना प्रभाव डालता है. पर लोग इस फिल्म से इंस्पायर होंगे. मेरी राय में यह फिल्म लोगों में जागरूकता लाएगी. मेरी राय में सिनेमा की जिम्मेदारी है कि वह मनोरंजन देने के साथ साथ लोगों को जागरूक करे. इसलिए समाज में जो कुछ हो रहा हो, उसको लेकर फिल्म के अंदर टीखा व्यंग्य जरूर किया जाना चाहिए.एक कलाकार होने के नाते मैं चाहता हूं कि दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ वह कुछ सीखे.

‘निल बटे सन्नाटा’ देखकर दर्शकों को अहसास होगा कि आज भी सरकारी स्कूल में कुछ शिक्षक ऐसे हैं, जो कि लोगों को शिक्षा देने में अहम भूमिका निभाते हैं. हमारी फिल्म का शिक्षक अपने विद्यार्थियों से कहता है कि ,‘यदि समझ में नहीं आ रहा है, तो मैं दोबारा समझाउंगा.’ यह शिक्षक अपने हर बच्चे को लंबी रेस का घोड़ा बनाना चाहता है. तो यह संदेश सशक्त तरीके से फिल्म के अंत में आता है. फिल्म में मां यानी कि चंदा का किरदार निभा रही स्वरा भास्कर कहती हैं-‘‘कोई भी इंसान चाहे जितने निचले स्तर का हो, यदि वह कुछ अच्छा करना चाहे,तो उसे दो चार लोग मदद करने के लिए जरुर मिल जाएंगे. कुछ लोग उसके सपनों को पंख लगाने में मददगार साबित होंगे. इस फिल्म में मेरा किरदार मां व बेटी के सपनों में पंख लगाने का काम करता है.’’

पर वर्तमान समय में शिक्षा जगत में बच्चों के सपनों को पूरा करने के लिए निःस्वार्थ भाव से पंख लगाने वाले शिक्षकों की संख्या ‘न’ के बराबर है? इस सवाल के जवाब में पंकज त्रिपाठी ने कहा-‘‘न के बराबर नही होंगी. क्योंकि हमारे पास उन्ही शिक्षकों की खबरे आती हैं, जो कि व्यवसायी हो गए हैं. जो निःस्वार्थ भाव से शिक्षा के प्रचार प्रसार में लगे हुए हैं, उनकी खबरें नहीं आती हैं. मगर यदि दुनिया चल रही है. एक संतुलन बना हुआ है, तो इसके मायने यह है कि कुछ अच्छे लोग अभी हैं. मैं या आप अच्छी बातें कर रहे हैं, तो इसके मायने यह हुए कि हमारा और आपका शिक्षक अच्छा ही रहा होगा.’’

मीनाक्षी दीक्षित ने क्यों चुनी फिल्म ‘‘लाल रंग’’…?

उत्तर भारत में बाह्मण परिवार में जन्मी व पली बढ़ी मीनाक्षी दीक्षित ने नृत्य के क्षेत्र में कुछ करने के मकसद से मुंबई में कदम रखा था. पर उन्हे मुंबई पहुंचते ही नृत्य के रियलिटी शो ‘‘डांस विद सरोज’’ के साथ जुड़ने का मौका मिला, जिसने उन्हे दक्षिण भारतीय फिल्मों में हीरोईन बनने का मौका दे दिया. लगभग छह साल तक दक्षिण भारतीय फिल्में कर जबरदस्त शोहरत बटोरने के बाद मीनाक्षी दीक्षित अपने करियर को लेकर खुश थी. पर तभी उन्हे उस वक्त कुंदन शाह की हिंदी फिल्म ‘‘पी से पी एम तक’’ में हीरोईन बनने का मौका मिला, जब इस फिल्म में वेश्या कस्तूरी का किरदार निभाने से माधुरी दीक्षित ने मना कर दिया था. यह एक अलग बात है कि फिल्म ‘‘पी से पी एम तक’’ को बाक्स आफिस पर सफलता नहीं मिली. और अब मीनाक्षी दीक्षित शीघ्र रिलीज हो रही नए निर्देशक सैय्यद अहमद अफजाल की फिल्म ‘‘लाल रंग’’ में रणदीप हुडा के साथ नजर आने वाली हैं. बौलीवुड पंडित इसे मीनाक्षी दीक्षित की तरफ से उठाया गया रिस्की कदम बता रहे हैं. लोगों की राय में कुंदन शाह जैसे निर्देशक के साथ असफल फिल्म करने के बाद मीनाक्षी दीक्षित को काफी सोचकर स्थापित निर्देशक की ही फिल्म करनी चाहिए थी.

मगर खुद मीनाक्षी दीक्षित अपने निर्णय को सही ठहराते हुए कहती हैं-‘‘बौलीवुड में सफलता का कोई तयशुदा फार्मूला नहीं है. किसी भी निर्देशक व कलाकार को आप महज उसकी एक फिल्म के आधार पर जज नहीं कर सकते. एक फिल्म की असफलता से यह कहना गलत होगा कि उस फिल्म के निर्देशक या कलाकार में प्रतिभा की कमी है. फिल्म ‘लाल रंग’ के निर्देशक सैय्याद अहमद अफजाल इससे पहले ‘यंगिस्तान’ जैसी फिल्म निर्देशित कर चुके हैं. पर मैंने फिल्म ‘लाल रंग’ स्क्रिप्ट के आधार पर चुनी. हमने ‘यंगिस्तान’ से पहले भी इन्ही निर्देशक के साथ एक फिल्म का आडीशन दिया था, पर बाद में वह फिल्म नही बन पायी थी. पर यह तय था कि हम दोनों भविष्य में काम करेंगे.

‘पी से पीएम तक’ के बाद वह मेरे पास इस फिल्म का आफर लेकर आए. मुझे स्क्रिप्ट पसंद आयी. इसके अलावा इसमें रणदीप हुड्डा जैसे बेहतरीन अभिनेता काम कर रहे थे. यह जगजाहिर है कि रणदीप हुड्डा ऐसी वैसी फिल्म नहीं करते हैं. देखिए, मेरे पास सलमान खान या किसी बड़े कलाकार के साथ वाली तीन चार फिल्में नही हैं कि मैं यह दावा करूं कि मैं बहुत चुनकर फिल्में करती हूं. मेरे पास जो आफर आए, उन्ही में से मैंने फिल्में की. फिल्म ‘पी से पीएम तक’ में मैंने बहुत लाउड किरदार निभाया था. जबकि ‘लाल रंग’ का किरदार बहुत सटल है.दोनों किरदारों में बहुत जबरदस्त विरोधाभास है. तो मुझे लगा कि एक कलाकार के रूप में यह एक यात्रा ही है. इसे करना चाहिए.’’

पर आपको नही लगता कि कलाकार की प्रतिभा को निखारने का काम निर्देशक का ही होता है? इस सवाल पर वह कहती हैं-‘‘यह सच है. हम कलाकार तो निर्देशक के हाथ की कठपुतली होते हैं. मैं तो नेचुरल कलाकार हूं. मैने कभी भी थिएटर नहीं किया. मैने अभिनय की कोई ट्रेनिंग नहीं ली है. ऐसे में हमारे लिए निर्देशक का इशारा काफी मायने रखता है. मैं तो खुद को निर्देशक को कलाकार मानती हूं.’’

मोबाइल यूजर्स के लिए नए अंदाज में ट्विटर

सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर को अब एक नए अंदाज में मोबाइल यूजर्स के लिए पेश किया गया है. ट्विटर का यह नया डिजाइन फिलहाल केवल एंड्रॉयड स्मार्टफोन यूजर्स के लिए लॉन्च किया गया है. ट्विटर ने ऐसा इसलिए किया है ताकि यूजर्स को ट्विटर चलाने मे आसानी हो. इसके नए एप का परीक्षण किया जा रहा है.

आपको बता दें कि ट्विटर के इस नए एप का इस्तेमाल केवल वही लोग कर सकते हैं जो इसके अल्फा और बीटा एप को इस्तेमाल करते हैं. इसमें ट्विटर के चार नए प्रमुख क्षेत्र मेन फीड, मोमेंट्स, नॉटिफिकेशन, डायरेक्ट मेसेज स्क्रीन के उपर नजर आएंगे.

इस नए वर्जन में यूजर्स टैप और स्वाइप करके ट्विटर को खोल सकते हैं. ट्विटर का यह नया वर्जन पुराने वर्जन से ज्यादा आसान होगा. ये चारों फीचर फोन में ऊपर की ओर एक बटन के रूप में दिखाई देंगी.

आपको बता दें कि ट्विटर ने अपने इस नए वर्जन में से कुछ गैर जरूरी फोल्टिंग और ट्वीट बटनों को भी हटा दिया गया है. जिससे ट्विटर को इस्तेमाल करते हुए यूजर्स को ज्यादा स्पेस मिलेगा.

और अब रियो में दीपा कर्माकर ने जीता गोल्ड मेडल

रियो ओलंपिक में इस बार एक भारतीय महिला जिम्नास्ट नजर आएगी. ऐसा इतिहास में पहली बार है कि कोई भारतीय महिला जिम्नास्ट ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कर पाई है. दीपा कर्माकर ने इतिहास रचने के कुछ घंटे बाद ही गोल्ड मेडल भी जीत लिया.

दीपा ने रियो ओलंपिक खेलों की परीक्षण प्रतियोगिता में वाल्टस फाइनल में गोल्ड मेडल जीता. 22 साल की दीपा 14.833 प्वॉइंट के अपने बेस्ट प्रदर्शन के साथ महिला वाल्टस फाइनल में टॉप पर रहीं और इस वैश्विक प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीता जो भारतीय जिम्नास्ट के लिए बड़ी उपलब्धि है.

दीपा ने पहले प्रयास में ही 14.833 प्वॉइंट जुटाए. उन्होंने अपने दूसरे और अंतिम प्रयास में 14.566 प्वॉइंट जुटाए. वाल्टस में दीपा के इस गोल्ड मेडल का हालांकि उनके ओलंपिक क्वालीफिकेशन से कोई लेना देना नहीं है.

भारतीय जिम्नास्टिक अधिकारियों ने बताया कि पहली बार किसी भारतीय महिला ने वैश्विक जिम्नास्टिक प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीता है.

‘खोटा सोना’ न बन जाए ‘सफेद सोना’

कपास यानी नरमा को भारत में ‘सफेद सोना’ भी कहा जाता है. लेकिन पिछले साल हरियाणा और पंजाब राज्यों में इस सफेद सोने पर सफेद मक्खी ने जम कर कहर बरपाया था. जिस से यह ‘सफेद सोना’ न रह कर ‘खोटा सोना’ बन गई थी और किसानों को हजारों लाखों रुपए की चपत लगी थी. सरकार को करोड़ों रुपए मुआवजे के तौर पर जारी करने पड़े थे. पिछली बार अनेक बीज कंपनियों व कीटनाशक कंपनियों के सारे दावे धरे रह गए और नरमा फसल पर सफेद मक्खी के प्रकोप को अनेक तरह के कीटनाशक भी नहीं रोक पाए.

इस बार इन्हीं सब बातों को ध्यान में रख कर पंजाब सरकार ने सफेद मक्खी के काले साए से नरमा फसल को बचाने के लिए ‘वार प्लान’ तैयार किया है. इस योजना के तहत कपास की खेती में माहिर लोग और कृषि वैज्ञानिकों और अधिकारियों की टीमें तैनात की जाएगी. उस टीम में 200 से ज्यादा जानकार लोग होंगे और समयसमय पर नरमा फसल का मुआयना करेंगे. हरियाणा सरकार ने पिछले साल सफेद मक्खी से हुए नुकसान की भरपाई के लिए अब आ कर 967 करोड़ रुपए का मुआवजा जारी किया है, जो किसानों के बैंक खातों में सीधा जाएगा.

दूसरी तरफ धोखा खा चुके किसानों ने भी कमर कस ली है. कपास बोने वाले किसानों का कहना है कि हम नरमा फसल में उत्पादन के लिए बीज की अच्छी किस्म से ले कर बीजाई के खास तरीके अपनाएंगे और समयमसय पर जानकारों से सलाहमशवरा भी करेंगे. कृषि जानकारों का मानना है कि नरमा की अच्छी पैदावार के लिए सब से पहले खेत में नरमा पौधों की सही संख्या होना और पानी भी सिंचाई का साधन होना चाहिए. नरमा पौधों की सही संख्या के बाद पौधों के लए सही मात्रा में खाद व पानी की जरूरत होती है. उस के अलावा खास बात लंबी अवधि तक फल देने वाले बीज का चुनाव करना चाहिए.

प्रगतिशील किसानों का कहना है कि एक एकड़ में नरमा के 4 हजार से 4800 तकपौधे होने चाहिए. पौधों के बीच में 3 से सवा 3 फुट तक का फासला होना चाहिए. ताकि पौधों को बढ़ने के लिए सही जगह मिले और पौधों के बीच में सही फासला होने पर पौधों को हवा धूप ठीक से मिलेगी, जिस से उन में फुटाव ठीक होगा. माहिरों का कहना है मौसम के मिजाज का कुछ पता नहीं चलता, इसलिए हमें नरमा की बोआई सीधी न कर के डोलियों (मेंड़)पर करें. अगर किसान हाथ से बोआई करते हैं, तो बीज के साथ गोबर की खाद जरूर डालें.

आज ज्यादातर किसान देशी कपास न बो कर बीटी कपास की ही बीजाई करते हैं. बीटी कपास के लिए किसान को यह भी जानना जरूरी है कि उस के लिए ज्यादा खुराक चाहिए. कुछ क्षेत्रों में जहां खारा पानी है, वहां एक एकड़ में कम से कम 8 से 10 ट्राली प्रति एकड़ गोबर की खाद खेत तैयार करते समय जरूर डालें, क्योंकि नरमा में पौधे ज्यादा नमक सहन नहीं कर पाते और गोबर खाद डालने से उन्हें ताकत मिलेगी. अंगरेजी में एक कहावत है ‘वैल बिगेन इज हाफ डन’ यानी किसी काम की अगर शुरुआत अच्छी हो तो समझ लो कि आधा काम निबट गया. यह बात खेती में भी लागू होती है. खेती की शुरुआत बीज से होती है. बीज ही खेती का मुख्य आधार है. बीज पर ही फसलों का उत्पादन टिका होता है. अच्छे बीज जहां औसतन 20 से 30 फीसदी ज्यादा पैदावार देते हैं. वहीं खराब बीजों से मेहनत, पैसा और समय दोनों बदबाद हो जाते हैं.

इस महान क्रिकेटर ने कहा, ‘भारतीय क्रिकेट से निराश हूं’

टी20 क्रिकेट की चमक धमक से खुद को दूर रखने वाले इयान बाथम का मानना है कि भारत को समझना होगा कि खेल के इस सबसे छोटे प्रारूप के अलावा भी क्रिकेट है.

लारेस विश्व खेल पुरस्कारों के इतर इस महान ऑलराउंडर ने भारतीय पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा, ‘फिलहाल मैं भारतीय क्रिकेट से निराश हूं. क्रिकेट 20 ओवर के मैचों से कहीं अधिक है, उन्हें यह समझने की जरूरत है. भारत के खिलाफ इंग्लैंड के मुकाबले मुझे हमेशा रोमांचित करते हैं लेकिन फिलहाल मुझे नहीं पता कि क्या कहना है.’ बाथम के निराश होने के पीछे ठोस वजह है. भारत ने इंग्लैंड के दौरे पर पिछली दो सीरीज 0-4 और 1-3 के अंतर से गंवाई जबकि 2012 में इंग्लैंड से घरेलू सीरीज में भी हार गया.

बाथम ने कहा, ‘भारत टेस्ट क्रिकेट में कहां जा रहा है. टीम के साथ ऐसा क्यों हो रहा है. क्या यह ट्वेंटी20 से संतुष्टता है. भारत को पता लगाना होगा.’ भारत भले ही आईसीसी टेस्ट रैंकिंग में तीसरे स्थान पर हो लेकिन बाथम इससे सहमत नहीं हैं. उन्होंने कहा, ‘देखिये मुझे रैंकिंग समझ में नहीं आती. मेरे हिसाब से इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया सर्वश्रेष्ठ टेस्ट क्रिकेट खेल रहे हैं.’

VIDEO: जानिए विराट कोहली के टैटू और उनकी पूरी कहानी

भारतीय क्रिकेट की दुनिया के चमकते सितारे विराट कोहली जितनी अपनी कलात्मक बैटिंग स्टाइल के लिए जाने जाते हैं उतने ही अपने डैशिंक लुक के लिए भी मशहूर हैं.अक्सर लोग खासकर लड़कियां इस 27 साल के नौजवान के टैटू पर फिदा हो जाती हैं.

हो भी क्यों ना.. क्योंकि कोहली के पूरे हाथ में एक-दो नहीं बल्कि बहुत सारे बड़े-बड़े टैटू हैं जिनके बारे में लोग अक्सर जानने के लिए बेचैन रहते हैं. इसी कारण कोहली ने अब खुद ही अपने फैंस की इस बैचेनी को दूर करने का फैसला कर लिया है और उन्होंने एक वीडियो के जरिये अपने टैटू के राज को दुनिया से शेयर किया है.

ये खूबसूरत वीडियो अनस्क्रिप्टेड पर शेयर किया गया है, जिसे आप भी जरूर सुनिए, दावा है कि मतलब जानकर आप भी हैरान रह जायेंगे..

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